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दारूल उलूम देवबन्द - महान इस्लामी विश्व विद्यालय

Written By Mohammed Umar Kairanvi on रविवार, 13 सितंबर 2009 | रविवार, सितंबर 13, 2009

इस्लामी दुनिया में दारूल उलूम देवबन्द का एक विशेष स्थान है जिसने पूरे क्षेत्र को ही नहीं, पूरी दुनिया क मुसलमानों को प्रभावित किया है। दारूल उलूम देवबन्द केवल इस्लामी विश्वविद्यालय ही नहीं एक विचाराधारा है, जो अंधविश्वास, कूरीतियों व आडम्बरों के विरूध इस्लाम को अपने मूल और शुदध रूप में प्रसारित करता है। इसलिए मुसलमानों में इस विखराधारा से प्रभावित मुसलमानों को ‘‘देवबन्दी‘‘ कहा जाता है।
देवबन्द उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण नगरों में गिना जाता है जो आबादी के लिहाज़ से तो एक लाख से कुछ ज्यादा आबादी का एक छोटा सा नगर है। लेकिन दारूल उलूम ने इस नगर को बडे-बडे नगरों से भरी व सम्मानजनक बना दिया है, जो ना केवल अपने गर्भ में एतिहासिक पृष्ठ भूमि रखता है, अपितु आज भी साम्प्रदायिक सौहार्दद धर्मनिरपेक्षता एवं देश प्रेम का एक अजीब नमूना प्रस्तुत करता है। 40 photo deoband madarsa
देवबन्द इस्लामी शिक्षा व दर्शन के प्रचार के व प्रसार के लिए संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध है। भारतीय संस्कृति व इस्लामी शिक्षा एवं संस्कृति में जो समन्वय आज हिन्दुस्तान में देखने को मिलता है उसका सीधा-साधा श्रेय देवबन्द दारूल उलूम को जाता है। यह मदरसा मुख्य रूप से उच्च अरबी व इस्लामी शिक्षा का केंद्र बिन्दु है। दारूल उलूम ने न केवल इस्लामिक शोध व साहित्य के संबंध में विशेष भूमिका निभायी है, बल्कि भारतीय पर्यावरण में इस्लामिक सोच व संस्कृति को नवीन आयाम तथा अनुकूलन दिया है।
दारूल उलूम देवबन्द की आधारशिला 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना कासिम नानोतवी द्वारा रखी गयी थी। वह समय भारतक के इतिहास में राजनैतिक उथल-पुथल व तनाव का समय था, उस समय अंग्रेजों के विरूद्ध लडे गये प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई.) की असफलता के बादल छंट भी ना पाये थे और अंग्रजों का भारतीयों के प्रति दमनचक्र तेज कर दिया गया था, चारों ओर हा-हा-कार मची थी। अंग्रजों ने अपने संपूर्ण शक्ति से स्वतंत्रता आंदोलन (1857) को कुचल कर रख दिया था। अधिकांश आंदोलनकारी शहीद कर दिये गये थे, (देवबन्द जैसी छोटी बस्ती में 44 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था) और शेष को गिरफ्तार कर लिया गया था, ऐसे सुलगते माहौल में देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानियों पर निराशाओं के पृहार होने लगे थे। चारों ओर खलबली मची हुई थी। एक प्रश्न चिन्ह सामने था कि किस प्रकार भारत के बिखरे हुए समुदायों को एकजुट किया जासे, किस प्रकार भारतीय संस्कृति और शिक्ष जो टूटती और बिखरती जा रही थी, की सुरक्ष की जाये। उस समय के नेतृत्व में यह अहसास जागा कि भारतीय जीर्ण व खंडित समाज एस समय तक विशाल एवं जालिम ब्रिटिश साम्राज्य के मुकाबले नहीं टिक सकता, जब तक सभी वर्गों, धर्मों व समुदायों के लोगों को देश प्रेम और देश भक्त के जल में स्नान कराकर एक सूत्र में न पिरो दिया जाये। इस कार्य के लिए न केवल कुशल व देशभक्त नेतृत्व की आवशयकता थी, बल्कि उन लोगों व संस्थाओं की आवशयकता थी जो धर्म व जाति से उपर उठकर देश के लिए बलिदान कर सकें।
इन्हीं उददेश्यों की पूर्ति के लिए जिन महान स्वतंत्रता सेनानियों व संस्थानों ने धर्मनिरपेक्षता व देशभक्ति का पाठ पढाया उनमें दारूल उलूम देवब्नद के कार्यों व सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता। स्वर्गीय मौलाना महमूद हसन (विख्यात अध्यापक व संरक्षक दारूल उलूम देवबन्द) उन सैनानियों में से एक थे जिनके कलम, ज्ञान, आचार व व्यवहार से एक बडा समुदाय प्रभावित था, इन्हीं विशेषताओं के कारण इन्हें शेखुल हिन्द (भारतीय विद्वान) की उपाधि से विभेषित किया गया था, उन्हों ने न केवल भारत में वरन विदेशों (अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, सउदी अरब व मिश्र) में जाकर भारत व ब्रिटिश साम्राज्य की भ्रत्‍सना की और भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों के विरूद्ध जी खोलकर अंग्रेजी शासक वर्ग की मुखालफत की। बल्कि शेखुल हिन्द ने अफगानिस्तान व ईरान की हकूमतों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रमों में सहयोग देने के लिए तैयार करने में एक विशेष भूमिका निभाई। उदाहरणतयः यह कि उन्होंने अफगानिस्तान व ईरान को इस बात पर राजी कर लिया कि यदि तुर्की की सेना भारत में ब्रिटिश साम्राजय के विरूद्ध लडने पर तैयार हो तो जमीन के रास्ते तुर्की की सेना को आक्रमण के लिए आने देंगे।
शेखुल हिन्द ने अपने सुप्रिम शिष्यों व प्रभावित व्यक्तियों के माध्यम से अंग्रेज के विरूद्ध प्रचार आरंभ किया और हजारों मुस्लिम आंदोलनकारियों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध चल रहे राष्टीय आंदोलन में शामिल कर दिया। इनके प्रमुख शिष्य मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उबैदुल्ला सिंधी थे जो जीवन पर्यन्त अपने गुरू की शिक्षाओं पर चलते रहे, और अपने देशप्रमी भावनाओं व नीतियों के कारण ही भारत के मुसलमान स्वतंत्रता सेनानियों व आंदोलनकारियों में एक भारी स्तम्भ के रूप में जाने जाते हैं।
Darul_Uloom_Deoband
सन 1914 ई. में मौलाना उबैदुल्ला सिंधी ने अफगानिस्तात जाकर अंग्रजों के विरूद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की सर्वप्रथम स्वतंत्रत सरकार स्थापित की जिसका राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप को बना दिया। यहीं पर रहकर उन्होंने इंडियन नेशनल कांगेस की एक शाखा कायम की जो बाद में (1922 ई.) में मूल कांग्रेस संगठन इंडियन नेशनल कांग्रेस में विलय कर दी गयी। शेखुल हिन्द 1915 ई. में हिजाज (सउदी अरब का पहला नाम था) चले गये, उन्होंने वहां रहते हुए अपने साथियों द्वारा तुर्की से संपर्क बना कर सैनिक सहायता की मांग की।
सन 1916 ई. में इसी संबंध में शेखुल हिन्द इस्तम्बूल जाना चाहते थे। मदीने में उस समय तुर्की का गवर्नर ग़ालिब तैनात था शेखुल हिन्द को इस्तम्बूल के बजाये तुर्की जाने के लिए कहा परन्तु उसी समय तुर्की के युद्ध मंत्री अनवर पाशा हिजाज पहुंच गये। शेखुल हिन्द ने उनसे मुलाकात की और अपने आंदोलन के बारे में बताया। अनवर पाशा ने भारतीयों के प्रति सहानुभूति प्रकट की और अंग्रेज साम्राज्य के विरूद्ध युद्ध करने की एक गुप्त योजना तैयार की। हिजाज से यह गुप्त योजना, गुप्त रूप से शेखुल हिन्द ने अपने शिष्य मौलाना उबैदुल्ला सिंधी को अफगानिसतान भेजा, मौलाना सिंधी ने इसका उत्तर एक रेशमी रूमाल पर लिखकर भेजा, इसी प्रकार रूमालों पर पत्र व्यवहार रहा। यह गुप्त सिलसिला ‘‘तहरीक ए रेशमी रूमाल‘‘ के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है। इसके सम्बंध में सर रोलेट ने लिखा है कि ‘‘ब्रिटिश सरकार इन गतिविधियों पर हक्का बक्‍का थी‘‘।
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सन 1916 ई. में अंगेजों ने किसी प्रकार शेखुल हिन्द को मदीने में गिरफ्तार कर लिया। हिजाज से उन्हें मिश्र लाया गया और फिर रोम सागर के एक टापू मालटा में उनके साथियों मौलान हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उजैर गुल हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद सहित जेल में डाल दिया था। इन सबको चार वर्ष की बामुशक्कत सजा दी गी। सन 1920 में इन महान सैनानियां की रिहाई हुई।
शेखुल हिन्द की अंगेजों के विरूद्ध तहरीके रेशमी रूमाल, मौलाना मदनी की सन 1936 से सन 1945 तक जेल यात्रा, मौलाना उजैरगुल, हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद का मालटा जेल की पीडा झेलना, मौलाना सिंधी की सेवायें इस तथ्य का स्पष्ट प्रमाण हैं कि दारूल उलूम ने स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाई है। इस संस्था ने ऐसे अनमोल रत्न पैदा किये जिन्होंने अपनी मातृ भूमि को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा दिया। ए. डब्लयू मायर सियर पुलिस अधीक्षक (सी. आई. डी. राजनैतिक) पंजाब ने अपनी रिपोर्ट न. 122 में लिखा था जो आज भी इंडियन आफिस लंदन में सुरक्षित है कि ‘‘मौलाना महमूद हसन (शेखुल हिन्द) जिन्हें रेशमी रूमाल पर पत्र लिखे गये, सन 1915 ई. को हिजरत करके हिजाज चले गये थे, रेशमी खतूत की साजिश में जो मोलवी सम्मिलित हैं, यह लगभग सभी देवब्नद स्कूल से संबंधित हैं।‘‘
गुलाम रसूल मेहर ने अपने पुस्तक ‘‘सरगुजस्त ए मुजाहिदीन‘‘ (उर्दू) के पृष्‍ठ न. 552 पर लिखा है कि ‘‘मेरे अध्ययन और विचार का सारांश यह है कि हजरत शेखुल हिन्द अपनी जिन्दगी के प्रारंभ में एक रणनीति का खाका तैयार कर चुके थे और इसे कार्यान्वित करने की कोशिश उन्होंने उस समय आरंभ कर दी थी जब हिन्दुस्तान के अंदर राजनीतिक गतिविधियां केवल नाम मात्र थी‘‘।
उडीसा के गवर्नर श्री बिशम्भर नाथ पाण्डे ने एक लेख में लिखा है कि दारूल उलूम देवबन्द भारत के स्वतंत्रता संग्राम में केंद्र बिन्दु जैसा ही था, जिसकी शाखायें दिल्ली, दीनापुर, अमरोहा, कारची, खेडा और चकवाल में स्थापित थी। भारत के बाहर उत्तर पश्चिमी सीमा पर छोटी सी सवतंत्र रियासत ‘‘यागिस्तान‘‘ भारत के स्वतंत्रता का केंद्र था, यह आंदोलन केवल मुसलमानों का ना था बल्कि पंजाब के सिक्खों व बंगाल की इंकलाबी पार्टी के सदस्यों को भी इसममें शामिल किया था।
इसी पकार असंख्यक तथ्य ऐसे हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि दारूल उलूम देवबन्द स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात भी देश प्रेम का पाढ पढता रहा है जैसे सन 1947 ईं. में भारत को आजादी तो मिली, परन्तु साथ साथ नफरतें आबादियों का स्थानंतरण व बंटवारा जैसे कटु अनुभव का समय भी आया, परन्तु दारूल उलूम की विचारधारा टस से मस ना हुई। इसने डट कर सबका विरोध किया और इंडियन नेशनल कांग्रस के संविधन में ही अपना विश्वास व्यक्त कर पाकिस्तान का विरोध किया तथा अपने देशप्रेम व धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण दिया। आज भी दारूल उलूम अपने देशप्रेम की विचार धारा के लिए संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है।
दारूल उलूम देवबन्द में पढने वाले विद्यार्थियों को मुफत शिक्षा, भोजन, आवास व पुस्तकों की सुविधा दी जाती है। दारूल उलूम देवब्नद ने अपनी स्थापतना से आज (हिजरी 1283 से 1424) सन 2002 तक लगभग 95 हजार महान विद्वान, लेखक आदि पैदा किये हैं। दारूल उलूम में इस्लामी दर्शन, अरबी, फारसी, उर्दू की शिक्षा के साथ साथ किताबत (हाथ से लिखने का कला), दर्जी का कार्य व किताबों पर जिल्दबन्दी, उर्दू, अरबी, अंगेजी, हिन्दी में कम्पयूटर तथा उर्दू पत्रकारिता का कोर्स भी कराया जाता है। दारूल उलूम में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा व साक्षात्कार से गुजरना पडता है। प्रवेश के बाद शिक्षा मुफत दी जाती है। दारूल उलूम देवबन्द ने अपने दार्शन व विचारधारा से मुसलमानों में एक नई चेतना पैदा की है जिस कारण देवबन्द स्कूल का प्रभाव भारतीय महाद्वीप पर गहरा है।
साभार http://www.darululoom-deoband.com/
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