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जहां बनता है ला ऑफ़ नेचर यानी कुदरत का कानून?

Written By Zeashan Zaidi on बुधवार, 11 अगस्त 2010 | बुधवार, अगस्त 11, 2010

कुदरत के कानूनों के बारे में हम बहुत कुछ जानते हैं। ज़मीन सूरज के गिर्द चक्कर लगा रही है, चाँद जमीन के गिर्द चक्कर लगा रहा है, यह कुदरत का कानून है। बकरी घास खाती है जबकि शेर गोश्त खाता है, यह भी कुदरत का कानून है। कुदरत के कानून पूरे यूनिवर्स में मौजूद हैं। इसी के नतीजे में बादल बनते हैं और उनसे पानी बरसता है। इसी के नतीजे में मुर्गी के अण्डों में से मुर्गी के ही बच्चे निकलते हैं और साँप के अण्डों में से संपोलिये निकलते हैं। डर और गुस्से में इंसान काँपने लगता है जबकि बहुत ज्यादा थक जाने पर उसमें आराम की ख्वाहिश जाग उठती है। यह भी कुदरत के ही कानून हैं।

खास बात ये है कि कोई भी कुदरत का कानून अपनी मर्जी का मालिक नहीं है। बल्कि हर कुदरत के कानून के पीछे मैथेमैटिक्स की बड़ी बड़ी समीकरणें छुपी हुई हैं। अगर हम ग्रैविटी की बात करें तो उसके पीछे मैथ का एक नियम ‘इनवर्स स्क्वायर ला’ मौजूद है। इसी तरह इंसान का बच्चा इंसान और जिराफ का बच्चा जिराफ हो इसके पीछे भी एक निहायत मुश्किल गणित डी-एन-ए- कोडिंग की शक्ल में मौजूद होती है। यानि कुदरत के कानूनों के पीछे एक पूरी मैथेमैटिक्स कुछ इस तरह मौजूद है जिसके बारे में जानने में साइंसदाँ अगर पूरी जिंदगी गुजार दें तब भी उसकी गहराई तक नहीं पहुंच सकते। 

अब सवाल पैदा होता है यूनिवर्स में वह कौन सी जगह है जहाँ ये निहायत मुश्किल व अहम कानून बनते हैं। वह कौन सी जगह है जहां वजूद में आने से पहले या वजूद में आने के बाद किसी चीज का पूरा ज्ञान मौजूद है?

उस जगह का नाम है अर्श । यहीं पर बनते हैं कुदरत के कानून और यहीं पर हर मखलूक की किस्मत का फैसला होता है। आईए समझते हैं अर्श को कुरआन और हदीस के जरिये।         

कुरआन में कई जगह पर अर्श और कुर्सी का जिक्र है। जैसे कि

सूरे बक़रा आयत 255 : अल्लाह ही वह ज़ाते पाक है कि उसके सिवा कोई माबूद नहीं। (वह) जिन्दा है और सारे जहान का संभालने वाला है। उसको न ऊंघ आती है न नींद। जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है उसी का है। कौन ऐसा है जो बगैर उसकी इजाज़त के उसके पास किसी की सिफारिश करे जो कुछ उनके सामने मौजूद है और जो कुछ उनके पीछे है जानता है और लोग उसके इल्म में से किसी चीज़ पर भी अहाता नहीं कर सकते मगर वह जिसे जितना चाहे। उसकी कुर्सी सब आसमानों व ज़मीनों को घेरे हुए है और उन दोनों की निगेहदाश्त उसपर कुछ भी मुश्किल नहीं और वह आलीशान बुजुर्ग व मरतबा है। 

सूरे हदीद आयत 4 : और वही तो है जिसने सारे आसमान व ज़मीन को छह दिन में पैदा किया फिर अर्श पर आमादा हुआ जो चीज़ ज़मीन में दाखिल होती है और जो उससे निकलती है और जो चीज़ आसमान से नाजिल होती है और जो उसकी तरफ चढ़ती है उसको मालूम है और तुम जहाँ कहीं रहो वह तुम्हारे साथ है और जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उसे देख रहा है।  

सूरे ताहा आयत 5 : वही रहमान है जो अर्श पर आमादा और मुस्तईद है

इन आयतों से कुछ ऐसा मालूम होता है कि अर्श कोई ऐसी जगह है जहाँ अल्लाह मौजूद है। और कुर्सी से उसे कुछ ऐसा लगता है जैसे यह अल्लाह के बैठने की गद्दी है जहाँ वह किसी दुनियावी बादशाह की तरह विराजमान है। लेकिन यह बात पूरी तरह गलत है। क्योंकि उसी ने (अल्लाह ने) जगह और मकान (स्पेस और डाइमेंशन) बनाये हैं। वह तो उस वक्त भी मौजूद था जब कि कोई जगह मौजूद न थी। इसलिये वह अर्श पर मौजूद है और कुर्सी पर बैठा है यह सोचना हरगिज जायज़ नहीं। 

तो फिर अर्श और कुर्सी की असलियत क्या है? इसको समझने के लिये गौर करते हैं इमाम जाफर सादिक (अ-स-) के कौल पर जो शेख सुद्दूक (र.) की किताब ‘अल तौहीद’ में मौजूद है। 

इमाम जाफर सादिक (अ-स-) ने फरमाया अर्श और कुर्सी दोनों गैब में हैं (यानि आँखों को दिखाई नहीं देते)। अर्श मुल्क पर हावी है और यह मुल्क अशिया में वाके (happen) होने वाले हालात व अहवालों का मुल्क है। फिर यह कि अर्श मुत्तसिल होने में कुर्सी से बिल्कुल बेनजीर व यगाना है। क्योंकि वह दोनों गय्यूब के दरबाये कबीरा से हैं और वह दोनों भी गैब हैं। गैब में दोनों साथ साथ हैं क्योंकि कुर्सी उस गैब का जाहिरी दरवाजा है जो मतला ईजाद व इब्तिदा है और जिससे तमाम अशिया मौजूद हुईं। और अर्श वह दरे बातिन है जिसमें हालत व कैफियत, वजूद, कद्र, हद और ऐन व मशीयत और सिफते इरादत का इल्म है और अलफाज़ व हरकात और तर्क का इल्म है और इख्तिताम और इब्तिदा का इल्म है पस ये दोनों इल्म के करीबी दरवाजे हैं क्योंकि मुल्के अर्श मुल्के कुर्सी से सिवा है और इस का इल्म कुर्सी के इल्म से ज्यादा गैब में (छुपा हुआ) है तो इसी वजह से कुरआन में कहा गया है रब्बिल अर्शिल अज़ीम (अल्लाह महान अर्श का रब है।) यानि इस की सिफत कुर्सी की सिफत से ज्यादा अज़ीम है। और वह दोनों इस वजह से एक साथ हैं। अर्श कुर्सी का हमसाया इस तरह हो गया कि उस में कैफियत व अहवाल का इल्म है। और उस में अबवाब बिदा व मुकामात व मवाज़ा जाहिर हैं। और उन की इस्लाह व दुरुस्ती की हद है। ये दोनों पड़ोसी हैं। इन दोनों में से एक ने अपने साथी को बतौर सिर्फ कलाम उठा रखा है।

आसान अलफाज़ में कहा जाये तो अर्श वह जगह है जहाँ चीजों की हालत, उनकी शुरुआत व खात्मा, उनका मशीनरी सिस्टम, यूनिवर्स की बनावट जैसी हर चीज़ का ज्ञान मौजूद है। यहीं पर शब्द पैदा होते हैं और यहीं मख्लूकात की किस्मत में तब्दीली होती है। यह चीज़ों की खिलकत का शुरूआती मरकज़ है और पूरे यूनिवर्स का कण्ट्रोल रूम है. 

दूसरी तरफ कुर्सी एक तरह का दरवाज़ा है जहाँ से यह ज्ञान निकलकर अपने वक्त पर सामने आता है। दुनिया में जो कुछ भी होता है चीजें और जानदार जिस तरह भी बिहेव करते हैं उसका इल्म इसी कुर्सी के जरिये अर्श से निकलकर जाहिर होता है। यहीं पर तमाम कुदरत के कानूनों का भी इल्म मौजूद है और यहीं पर ये कानून खल्क भी होते रहते हैं जो इस तमाम कायनात को चला रहे होते हैं। 

इन कानूनों का खालिक अल्लाह है। लेकिन ये सोचना गलत है कि अल्लाह अर्श पर बैठकर इन कानूनों की खिलकत करता रहता है। अल्लाह के वजूद से कोई जगह खाली नहीं। हकीकत ये है कि वह तमाम जगहों और वक्त का खालिक है।
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