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कितने अक्षर हो सकते हैं एक आदर्श भाषा में?

Written By Zeashan Zaidi on सोमवार, 26 जुलाई 2010 | सोमवार, जुलाई 26, 2010

अक्षर हमारी ज़बान और भाषा के मूल होते हैं। अक्षरों के बिना कोई भी भाषा शुरू नहीं होती। अलग अलग भाषाओं में अक्षरों की संख्या अलग अलग है। अगर अंग्रेजी में 26 अक्षर हैं तो उर्दू में 38। हिन्दी में 47 अक्षर हैं तो मराठी में 52। अगर म अक्षरों से निकलने वाली आवाजों की बात करें तो अलग अलग भाषाओं के अक्षरों को समरूपता के आधार पर एक मान सकते हैं। मिसाल के तौर पर अंग्रेजी का ‘ए’, हिन्दी का ‘अ’ और उर्दू का ‘अलिफ’ एक ही माने जायेंगे। इसी तरह अंग्रेजी का ‘डी’, हिन्दी का ‘ड’ और उर्दू का ‘डाल’ एक जैसी आवाज़ निकालते हैं। 

कुछ ऐसी भी आवाजें होती हैं जिनके एक भाषा में तो अक्षर मिलते हैं लेकिन दूसरी में नहीं। जैसे ‘प’ के लिये हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में तो अक्षर हैं लेकिन अरबी में नहीं। इसी तरह अंग्रेजी ‘ज़ेड’ के लिये हिन्दी में शुद्ध अक्षर नहीं है अत: उसे लिखने के लिये ज के नीचे बिन्दी लगानी पड़ती है। 

एक ही भाषा में कई ऐसे भी अक्षर हो सकते हैं जिनकी आवाज़ एक जैसी निकले। जैसे हिन्दी का ग और ज्ञ। या श और ष। अगर एक जैसी आवाजों वाले अक्षर कम कर दिये जायें, तो वर्णमाला में कम अक्षरों से काम चल सकता है। तो एक बड़ा सवाल ये पैदा होता है कि एक आदर्श वर्णमाला में कितने अक्षर कम से कम रखे जायें कि सारी आवाजें निकल आयें? 

अगर अंग्रेजी को आदर्श मानें तो उसमें द, त और श के लिये अक्षर नहीं हैं। यानि इनके लिये 26 से ज्यादा अक्षर होने चाहिए। इसी तरह अरबी को भी आदर्श नहीं मान सकते वरना ‘प’ के लिये कोई अक्षर नहीं मिलेगा। उर्दू और हिन्दी में ज़रूरत से ज्यादा अक्षर हैं।

इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिये आईए रुख करते हैं इस्लाम की तरफ।         

इस्लामी विद्वान शेख सुद्दूक (र.) की किताब ‘अय्यून अखबारुलरज़ा’ में इसके मुताल्लिक इमाम अली रज़ा (अ.स.) का कौल मौजूद है जो इस तरफ हमारी रहनुमाई करता है। इमाम अली रज़ा (अ-स-) खलीफा मामून रशीद के दौर की सबसे अहम शख्सियत थे, और पैगम्बर मोहम्मद (स.अ.) के सातवीं पीढ़ी के वंशज थे। उनके कौल के मुताबिक, ‘अल्लाह की पहली खिलक़त़ व इरादा और मशीयत हुरूफ अबजद (वर्णमाला या alphabet) हैं। जिन्हें अल्लाह ने हर चीज़ की बुनियाद और हर चीज़ की दलील और फैसला करने वाला बनाया। और इन्ही हुरूफ (अक्षरों) से हक़ व बातिल के तमाम नामों में जुदाई कायम की और इन्ही हुरूफ को फेअल व मफ़ऊल (एक्शन व रिएक्शन ), मतलब व गैर मतलब का जरिया बनाया और तमाम कामों का दारोमदार इन्ही हुरूफ पर रखा और अलग अलग हुरूफ की तखलीक से सिर्फ उन्ही हुरूफ के मतलब पेशे नज़र रखे गये।

और अल्लाह जो कि आसमानों और जमीन का नूर है, उस ने अपने नूर से ही अजीम (महान) हुरूफों की तखलीक़ की और ये उस का सबसे पहला काम है। यानि हुरूफ ज़ाते हक़ के फेले अव्वल के मफऊल अव्वल हैं। और यह हुरूफ ही हैं जिन पर कलाम और इबादाते इलाही का दारोमदार है। अल्लाह तआला ने तैंतीस (33) हुरूफ खल्क किये जिन में अरबी जबान में अट्‌ठाइस हुरूफ इस्तेमान होते हैं। और इन्ही अट्‌ठाइस हुरूफ में से बाइस (22) हुरूफ सूरयानी (Suryani) व इबरानी (हिब्रू) में मौजूद हैं। और पाँच दूसरे हुरूफ अज्मी (अरब से बाहर की ज़बानें जैसे अफ्रीका वगैरा की) और दूसरी ज़बानों में बोले जाते हैं। और यूं इन की कुल तादाद तैंतीस (33) है।

इस तरह यह साफ होता है अल्लाह ने तैंतीस (33) अक्षरों की खिलकत की है। और यह खिलकत मैटर की खिलकत से भी पहले की खिलकत है। यानि इंसान की पैदाइश बाद में हुई, लेकिन उसकी ज़बान की पैदाइश उससे पहले ही हो गयी थी। अब इमाम अली रज़ा (अ-स-) के कौल के मुताबिक किसी भी भाषा में अलग अलग आवाजों के तैंतीस हुरूफ यानि अक्षर हो सकते हैं। 

यानि अगर किसी ज़बान में तैंतीस अक्षर अलग अलग आवाजों के लिये जायें तो उनसे पूरी ज़बान यानि भाषा मुकम्मल तरीके से बोली जा सकती है। किसी भी ज़बान में अगर इससे ज्यादा अक्षर हैं तो उनकी आवाजें एक दूसरे से मिलने लगती हैं। जो कि हमारे लिये अनुपयोगी होता है। भाषा विज्ञानी को अगर इसपर अच्छी तरह रिसर्च करें तो आवाज़ पर चलने वाले कम्प्यूटर जैसे यन्त्र विकसित किये जा सकते हैं। जो बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं। और शायद आगे चलकर ऐसे कम्प्यूटर विकसित हो जायें जो केवल हमारी आवाज पर काम करने लगें।

फिलहाल आज भी साइंस इस्लामी साइंस से पीछे ही चल रही है।
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16 comments:

KAMDARSHEE ने कहा…

हमारा भारत महान है क्योंकि यहाँ उस चीज़ की पूजा होती है जिस पर पुरुष की महानता टिकी होती है . http://vedquran.blogspot.com/2010/07/way-for-mankind-anwer-jamal.html?showComment=1280147480789#c4309971045506993147

KAMDARSHEE ने कहा…

माननीय जमाल जी ! आपको केवल ये ज्ञान था कि भोले बाबा का लिंग ऋषियों के श्राप के कारण गिरा था लेकिन सच्चाई ये है कि उसे ऋषियों ने डंडे पत्थर मारकर गिराया था . तभी से वह भारतवासियों से दुखी होकरभोले जी भारत छोड़ कर चीन चले गए थे और मानसरोवर पर रहने लगे थे . हिन्दू ये भी मानते हैं कि भोले भंडारी काबा में रहते हैं . हो सकता है कुछ काल के लिए वहां भी रहे हों ? यहाँ पहले लिंग काटा जाता है , लिंग वाले बाबा जी को कष्ट पहुँचाया जाता है और फिर उसकी पूजा कि जाती है .

KAMDARSHEE ने कहा…

ज़ीशान जैदी ! ज्ञान लिंग से प्रकट होता है , भाषाएँ तो बहुत हैं और अक्षर भी परन्तु सब में प्यार करने के लिए ही कहा गया है और प्यार होता है लिंग से . भारतवासियों ने लिंग की शक्ति और महिमा सबसे पहले पहचानी है . मुसलमानों को भी पीछे छोड़ दिया . कोई इस सत्य से इंकार नहीं कर सकता .

सलीम ख़ान ने कहा…

BEHATAREEN !

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

फिलहाल आज भी साइंस इस्लामी साइंस से पीछे ही चल रही है। कल भी पीछे रहेगी

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

भाई मेरे आने से पहले ही मेरा नाम जपने यहाँ आ पहुंचे ?

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice post .

अनुनाद सिंह ने कहा…

दुख की बात है कि इस्लामपरस्त भाषाओं की लिपियाँ शायद सभी लिपियों में सबसे अधिक पंगु हैं। कुछ भी लिखने का कोई नियम ही नही है। वर्णमाला में स्वर ही नही हैं या बिलकुल कम हैं।

देवनागरी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। इसके वर्णों को इनके उत्पत्ति स्थान के क्रम में सजाया गया है।

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

अनुनाद सिंह जी सहमत होना पडेगा, देवनागरी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। जिसे शंका हो बताये किसी भाषा में इतनी प्रकार परदा लिखा जा सकता है?

परदा
पृदा
परदः
प्रदा
पर्दा

सलीम ख़ान ने कहा…

jazakALLAH !

PARAM ARYA ने कहा…

बच्चों की पढ़ाई के कारण नगर में बसे परंतु खेती के कारण बारम्बार गांव की ओर भागना पड़ता है। यह देखकर मन प्रसन्न है कि जो काम मैं करना चाहता था वह चल रहा है। भंडाफोड़ कार्यक्रम मूलतः स्वामी दयानंद जी का ही अभियान है। इसमें मेरी ओर से सदैव सहयोग रहेगा। कामदर्शी की पोल मैंने अपने ब्लॉग पर खोल ही दी है। अनवर को मैं आरंभ से ही छकाता थकाता आ रहा हूं। http://rajeev2004.blogspot.com/2010/04/5-headed-snake-found-in-kukke.html

इस्लामिक वेबदुनिया ने कहा…

Nice post

इस्लामिक वेबदुनिया ने कहा…

@अनुनाद सिंह जी सिर्फ एक सलाह-
पहले आप संस्कृत का कोई श्लोक सुनें। फिर अंग्रेजी की कोई पोइम। अंत में किसी मस्जिद से आने वाली अजान पर गौर करें। फिर अपने दिल से इसका जवाब मांगे। मुझे पूरा यकीन है आपका दिल झूठ नहीं बोलेगा।
क्योंकि दिल उसी का है जिसके लिए अजान है। दिल सच बात की गवाही देगा।

बेनामी ने कहा…

masjid se aane vali ajan suni hai, sirf noise polution ke alawa usme bhasai jadu vali koi bat nahi. vaigyanikta ki drashti se sampurn sansar me hindi hi ekmatra esi bhasa aur devnagri hi aisi lipi hai jisame jo bola jata hai vahi likha jata hai .isiliye UNO me bhi ise sweekar kar liya gaya .

katuwa singh

Shah Nawaz ने कहा…

जीशान भाई, बहुत ही बेहतरीन लेख है.... कमाल की जानकारी दी है आपने...

Shah Nawaz ने कहा…

हमारी अंजुमन के लिए मेरा सुझाव है की बेनामी का option बंद कर देना चाहिए.... और विषय से हट कर अथवा अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले टिप्पनिकारो की टिप्पणियों को तुरंत delete करना चाहिए. बेमतलब की अभद्र टिप्पणियों से विषय कहीं का कहीं चला जाता है....

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