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क्या कुरआन को समझ कर पढना ज़रुरी है? भाग- १

Written By काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif on रविवार, 24 जनवरी 2010 | रविवार, जनवरी 24, 2010

कुरआन मजीद अल्लाह तआला की आखिरी वही (पैगाम) अपने आखिरी पैगम्बर मुहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर नाज़िल की थी। कुरआन मजीद सारी दुनिया मे सबसे बेहतरीन किताब है, वो इन्सानियत के लिये हिदायत है, कुरआन मजीद हिकमत का झरना है और जो लोग नही मानते उन्के लिये चेतावनी है, उन्के लिये सख्ती है और जो लोग भटके हुए है उन्हे सीधी राह दिखाती है कुरआन मजीद। जिन लोगो को शक है कुरआन मजीद उन्के लिये यकीन है और जो मुश्किलात मे है उन्के लिये राहत है लेकिन ये कुरआन मजीद की सारी खुबियां कोई इन्सान तब तक हासिल नही कर सकता है जब की वो कुरआन मजीद को नही पढे, कुरआन मजीद को नही समझे, और कुरआन मजीद पर अमल न करे। कुरआन मजीद की ये सारी खुबियां हम तब ही हासिल कर सकते है जब कुरआन मजीद को पढे, उसकॊ समझें और उस पर अमल करें। कुरआन मजीद सारे जहां मे सबसे ज़्यादा पढी जाने वाली किताब है लेकिन अफ़्सोस की बात है की कुरआन मजीद वो ही किताब है जो सबसे ज़्यादा बिना समझे पढी जाती है, ये वो किताब है जो लोग बिना समझे पढते है यही वजह की हम मुस्लमानॊं और कुरआन के बीच जो रिश्ता है, जो बंधन है वो कमज़ोर होता जा रहा है।


कितने अफ़्सोस की बात है की एक शख्स कुरआन के करीब आता है, कुरआन पढता है, लेकिन उसके ज़िन्दगी जीने का तरीका बिल्कुल भी नही बदलता, उसका रहन-सहन ज़रा भी नही बदलता, उसका दिल ज़रा भी नही पिघलता, बहुत अफ़्सोस की बात है। अल्लाह तआला फ़र्माते है कुरआन मजीद में सुरह: अल इमरान सु. ३ : आ. ११० मे अल्लाह तआला सारे मुसलामानॊं से फ़र्माते है "की आप सारे जहां मे सबसे बेहतरीन उम्मा (उम्मत) है"। जब भी कोई तारिफ़ की जाती है या ओहदा दिया जाता है तो उसके साथ ज़िम्मेदारी होना ज़रुरी है कोई भी ओहदे के साथ ज़िम्मेदारी होना ज़रुरी है। जब अल्लाह तआला हमे सारे जहां मे सबसे बेहतरीन उम्मा कहते है तो क्या हमारे उपर कोई ज़िम्मेदारी नही है? इसी आयत मे अल्लाह तआला हमें हमारी ज़िम्मेदारी भी बताते है "अल्लाह तआला फ़र्माते है क्यौंकी हम लोगों को अच्छाई की तरफ़ बुलाते है और बुराई से रोकते है"। अगर हम लोगो को अच्छाई की तरफ़ बुलाना चाहते है और बुराई से बचाना चाहते है तो ज़रुरी है की हम कुरआन को समझ कर पढे। अगर हम कुरआन को समझ कर नही पढेंगें तो लोगो को अच्छाई की तरफ़ कैसे बुलायेंगें? और अगर हम लोगो को अच्छाई की तरफ़ नही बुलायेंगे तो हम "खैरा-उम्मा" (सबसे बेह्तरीन उम्मा) कहलाने के लायक नही है। हम मुसलमान कहलाने के लायक नही है।

आज हम गौर करते हैं की हम मुसलमान कुरआन को समझ कर क्यौं नही पढतें? हम मुस्लमान क्यौं बहाने बनाते है कुरआन मजीद को समझ कर नही पढने के?

सबसे पहला जो बहाना है वो है की हम अरबी ज़बान नही जानते। ये हकीकत है की सारी दुनिया मे बीस प्रतिशत से ज़्यादा मुसलमान है, सारी दुनिया मे १२५ करोडं से ज़्यादा मुसलमान है लेकिन इसमे से लगभग १५ प्रतिशत मुसलमान अरब है जिनकी मार्त भाषा अरबी है और इन्के अलावा चन्द मुस्लमान अरबी ज़बान जानते है इसका मतलब है की ८० प्रतिशत मुसलमान अरबी ज़बान नही जानते है। जब भी कोई बच्चा पैदा होता है और इस दुनिया मे आता है तो वो कोई ज़बान नही जानता है वो सबसे पहले अपनी मां की ज़बान सीखता है ताकि वो घरवालॊं से बात कर सके, उसके बाद वो अपने मुह्ल्ले की ज़बान सीखता है ताकि मुह्ल्लेवालों से बातचीत कर सके, फिर वो तालिम हासिल करता है जिस स्कुल या कांलेज मे जिस ज़बान मे तालिम हासिल करता है उस ज़बान को सीखता है। हर इन्सान कम से कम दो या तीन ज़बान समझ सकता है, कुछ लोग चार या पांच ज़बान समझ सकते है और लोगो को बहुत सी ज़बानॊ मे महारत हासिल होती है लेकिन आम तौर से एक इन्सान दो या तीन ज़बान समझ सकता है। क्या हमे ज़रुरी नही की हम वो ज़बान समझे जिस ज़बान मे अल्लाह तआला ने आखिरी पैगाम इंसानियत के लिये पेश किया? क्या हमे ज़रुरी नही की हम अरबी ज़बान को जानें और सीखें? और उम्र कभी भी, कोई भी अच्छे काम के लिये रुकावट नही है।

मैं आपकॊं मिसाल पेश करना चाहता हु डां. मौरिस बुकेल की, डां. मौरिस बुकेल एक ईसाई थे, उन्हे फ़्रैचं अक्डेमी अवार्ड मिला था मेडिसिन के श्रेत्र मे, और उनको चुना गया था की "फ़िरौन की लाश" जो बच गयी थी, जिसे लोगों ने ढुढां था १९वीं सदी में, उसे मिस्त्र के अजायबघर रखा गया है। उन्हे चुना गया था की आप इस लाश पर तह्कीक (रिसर्च) करने को और डां. मौरिस बुकेल क्यौंकी ईसाई थे इसलिये जानते थे की "बाईबिल" मे लिखा हुआ था "की जब फ़िरौन मुसा अलैह्स्सलाम का पिछा कर रहा था तो वो दरिया मे डुब जाता है, ये उन्हे पता था। लेकिन डां. मौरिस बुकेल जब अरब का दौरा कर रहे थे तो एक अरब के आदमी ने कहा की कोई नयी बात नही है की आपने "फ़िरौन" कि लाश को ढुढं निकाला क्यौंकी कुरआन मजीद मे सुरह: युनुस सु. १० : आ. ९२ :- "अल्लाह तआला फ़र्माते है की हम फ़िरौन की लाश को हिफ़ाज़त से रखेंगें, महफुज़ रखेंगें ताकि सारी दुनिया के लिये वो एक निशानी बनें"। डां. मौरिस बुकेल हैरान हुए की ये जो किताब आज से १४०० साल पुरानी है उसमे कैसे लिखा गया है की "फ़िरौन की लाश को हिफ़ाज़त से रखा जायेगा"। इसीलिये डां. मौरिस बुकेल ने कुरआन मजीद का तर्जुमा पढां और तर्जुमा पढने के बाद इतने मुतासिर हुए की कुरआन को और अच्छी तरह समझने के पचास साल की उम्र मे उन्होने अरबी ज़बान सीखी और कुरआन का मुताला (समझ कर पढा) किया। और उसके बाद एक किताब लिखी " Bible. Quran And Science" और ये किताब काफ़ी मशहुर है और काफ़ी ज़बानॊ मे इसका तर्जुमा हो चुका है।

मैनें ये मिसाल आपकॊ दी ये समझाने के लिये की एक गैर-मुसलमान, एक ईसाई, कुरआन को अच्छी तरह समझने के लिये पचास साल की उम्र मे अरबी ज़बान सीखता है। मै जानता है की हम सब डां. मौरिस बुकेल की तरह जज़्बा नही रखते है लेकिन कम से कम हम कुरआन का तर्जुमा तो पढ सकते है। मौलाना अब्दुल मजीद दरियाबादी फ़र्माते है की सारी दुनिया मे सबसे मुश्किल किताब जिस्का तर्जुमा हो सकता है वो है कुरआन मजीद। क्यौंकी कुरआन मजीद की ज़बान अल्लाह तआला की तरह से है और एक बेहतरीन ज़बान है, एक करिश्मा है। कुरआन की एक आयत एक ज़हीन और पढे - लिखे आदमी को मुत्तासिर (Impress) करती है और वही आयत एक आम आदमी कॊ मुत्तासिर करती है यह खुबी है कुरआन मजीद की और कई अरबी अल्फ़ाज़ (शब्द) उसके पचास से ज़्यादा माईने (मतलब/अर्थ) होते हैं और कुरआन मजीद की एक आयत के कई माईने होते है इसीलिये ये अल्लाह तआला की आखिरी किताब सबसे मुश्किल किताब है जिस्का तर्जुमा (अनुवाद) हो सकता है लेकिन इसके बावजुद कई उलमा ने कुरआन मजीद का तर्जुमा दुनिया की कई ज़बानॊ मे किया, जितनी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली ज़बानें (भाषायें) है उसके अंदर कुरआन मजीद का तर्जुमा (अनुवाद) हो चुका है तो अगर आपकॊ अरबी ज़बान मे महारत हासिल नही है तो आप कुरआन का तर्जुमा उस ज़बान (भाषा) मे पढे जिसमे आपको महारत हासिल है।

भाग -२ में जारी

साभार :- इस्लाम और कुरआन
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80 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

कुरआन मजीद अल्लाह तआला की आखिरी वही (पैगाम) अपने आखिरी पैगम्बर मुहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर नाज़िल की थी। कुरआन मजीद सारी दुनिया मे सबसे बेहतरीन किताब है,
हम इस से सहमत नहीं तो हमारे लिए क्या?

जो लोग नही मानते उन्के लिये चेतावनी है, उन्के लिये सख्ती है

बड़े भाई! यहीं से आतंकवाद की पैदाइश है, उस के लिए आधार है, उस की नींव है।
क्या नहीं है?

rahul ने कहा…

hamre vedon se achhi koi kitab nahin jise shanka ho

vedon men vigyan
वेंदों में विज्ञान

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

@ द्विवेदी जो नहीं मानते उनके लिए कोई सख्‍ती नहीं, आतंकवाद से कोई रिश्‍ता नहीं अगर आप बता सकें तो लिखें, कृप्‍या आनलाइन कुरआन से मिसाल दें,

निम्‍न फाइल पर कुरआन हिन्‍दी और उर्दू में अनुवाद तफसील के साथ है, इधर से दें तो हम सब को समझने में आसानी रहे

http://www.scribd.com/doc/19389538/Quran-Urdu-Hindi-Translation-and-Tafsir-Part-1

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

@ Rahul भाई हम आपके दिए लिंक से अति प्रसन्‍न हैं, वेदों में विज्ञान पढकर हम बाग-बाग हो गये, ईश्‍वर तुम्‍हें इसका बदला देगा, धन्‍यवाद

kuch to badlega ने कहा…

नास्तिकों के लिये तो सख्ति हर धर्म ग्रंथ में है,
और सख़्ती ईश्‍वरीय है न कि इंसानो द्वारा ग़लती द्विवेदी जी की नहीं है क्योंकि
"ये किताब जिस में कोई शक नहीं उन लोगो को राह बताने वाली है जो मुत्‍तकी हैं (अल्लाह से डरने वाले हैं, जो अच्छाई की तरफ दौड़ते हैं और बुराईयों से बचने वाले हैं, जो ज्ञान पाना चाहते हैं, जो सच की तलाश करना चाहते हैं, जो सच को पाना चाहते है, जिन के दिल में कपट नहीं, जिन के दिल में अहंकार नहीं।)" (सूरह बकर: 2:2)
क़ुरआन को समझ कर पढ़ना और पढ़कर समझना ज़रूरी है।

kuch to badlega ने कहा…

विज्ञान, क़ुरआन के आईने में

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

अब उम्दा लोग न समझें तो उनकी सोच जाने!! और अपने वकील साहिब तो खुन्नस में हैं, जो करना है कर लो!!अपुन तो तमको बुरा कहेंगे, बुरा जानेगे.अरे भैया ज़रा प्यार-मुहब्बत से इनसे बात करें.
और हाँ राहुलजी आपने जो लिंक दिया है, वहाँ पढने में ज़रा दुश्वारी आ रही है.उसे ठीक कर लें.ताकि मैं भी वेद का लिंक अपने यहाँ दे सकूँ.

अगर कुर'आन की बातें यहाँ, इसी तरह की जाएँ तो माशा अल्लाह कितना बेहतर हो!!!
और आपने बहुत ही उम्दा किया!!

Tarkeshwar Giri ने कहा…

बहुत अच्छी बात लिखी है जनाब आपने , पहली बार आपने अपनी कमजोरी को माना है, लेकिन ध्यान रहे आपके लोग ही इसका विरोध करेंगे , क्योंकि, अब तक मुसलमानों को येही बताया गया है की कुरान को समझने की जरुरत नहीं है, सिर्फ पढने की जरूरत पर बल दिया गया है, ( आप से एक अनुरोध है की आप लिखते समय कुछ शब्दों को उर्दू या अरबी उच्चारण मैं लिखते है, कृपया उनका मतलब हिंदी मैं भी लिखा करे, पढने मैं आसानी होगी।)

रही बात द्विवेदी जी की तो मैं उनकी बात से सहमत हूँ, ( जबरदस्ती लोगो को मत कहिये की आप भी कुरान में विश्वाश करे। ) क्योंकि ना विश्वाश करना कोई जुर्म नहीं है। लेकिन अरब और फारस साथ में (पाकिस्तान और अफगानिस्तान) के देशो में लोगो को जबरन मुस्लमान बनाया गया है।

कुरान एक धार्मिक किताब है और धार्मिक किताब या धर्म सबकी इज्जत करना हमारा धर्म और कर्तव्य है.

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif ने कहा…

@ Tarkeshwar Giri जी,

दुनिया लगभग हर गैर-मुस्लिम यही कहता है कि इस्लाम तलवार के बल पर फ़ैलाया गया लेकिन इस बात से बिल्कुल सहमत नही हूं.....

चलिये इस मसले पर आपसे ही बात करते है कि "अगर मै आपके गर्दन पर तलवार रख दुं तो क्या आप इस्लाम कुबुल कर लोगें????

और अगर कर भी लिया तो ज़्यादा से ज़्यादा कलमा पढ लोगे...... उसके बाद क्या?

तो क्या आप अल्लाह की इबादत करोगे???

तो क्या आप नमाज़ याद करोगे???

तो क्या आपकी दिल अल्लाह की इबादत करने को गवारा करेगा????

नही करेगा..........बिल्कुल भी नही करेगा.....

ज़्बरदस्ती एक दो शब्द कहलवाये जा सकते है.....दस्तखत कराये जा सकते है.......लेकिन सारी ज़िन्दगी एक खुदा की दिल से इबादत नही कराई जा सकती है.......

=============

"हमारा हिन्दुस्तान"

"इस्लाम और कुरआन"

The Holy Qur-an

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Coding | A Programmers Area

ab inconvenienti ने कहा…

हां कलमा पढवाने के बाद तुम्हारे मुंह में ज़बरजस्ती गाय की बोटी रख देंगे और कहेंगे की 'अब है सच्चा मुसलमान तो चबा के निगल जा इसे!'

अब गाय खा ली है और खतना हो गया, फिर हिन्दू तो वापस अपने कुनबे में लेने से रहे. अब मन मारकर अल्ला की इबादत करो, भले ही बचपन से सुबह शाम दुर्गा सप्तशती पढने की आदत रही हो... अब इसकी जगह उठक बैठक करो. खानदानी मुसलमान नए मुसलमानों को खुद से नीचा समझा करते हैं, उनपर दबाव रहता है की अपने को सच्चा मुसलमान साबित कर सामाजिक स्वीकृति पाएं. हिन्दुओं में तो मलेछ हुए ही, कम से कम मुसलमानों में नए सिरे से कोई हैसियत बनाई जाए (और रास्ता भी क्या है?)

Gazi ने कहा…

ab inconvenienti

इसीलिए तो समझाया जा रहा है कि समझ कर पढ़ो
नहीं तो तुम्हारी तरह हाल होगा।
अल्लाह तुम्हारे दिमागी हालात पर रहम करे

Gazi ने कहा…

ab inconvenienti

इसीलिए तो समझाया जा रहा है कि समझ कर पढ़ो
नहीं तो तुम्हारी तरह हाल होगा।
अल्लाह तुम्हारे दिमागी हालात पर रहम करे

Gazi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
शहरोज़ ने कहा…

तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म है.

कुर'आन की सूरत या सुर:१०९अल-काफिरून की ये अंतिम आयत है.

कुर'आन का पहला शब्द जिसकी मान्या आकाशवाणी की है , इक़रा!!जिसका अर्थ ही है पढ़!!
कुर'आन महज़ तावीज़ या मन्त्रों का नाम नहीं है जिस से भूत-प्रेत भगाए जाएँ या अमुक-अमुक काम में काम आये.बल्कि परम-सत्ता की तरफ से सम्पूर्ण
संसार के लिए एक घोषणा-पत्र है.मनिफेस्टो है कि जीवन को किस तरह गुजारना चाहिये.
पहली ही आयत है, जिसकी शुरुआत होती है,और जहां रब को सिर्फ एक आलम यानी दुनिया का नहीं बल्कि आलमीन कहा गया है, यानी कई दुनिया जहां जीवन है.और आज धीरे-धीरे ये बात साबित हो रही है कि जीवन केवल पृथिवी पर ही नहीं है.

आप सभी चाहे हिन्दू हों या मुसलमान ये खूब समझ लें कि कुरआन किसी की बपौती नहीं है.और न ही इस्लाम ज़ोर्ज़बर्दस्ती की बात करता है.
विवेकानद ने बहुत पहले कहा था कि इस्लाम तलवार के जोर पर नहीं फैला.उन्हों ने ये भी कहा था कि भारत में जहां हिन्दू धर्म देह है वही इस्लाम मस्तक!!
यदि हम आज ऐसे महापुरुष की बात मान लें तो देश में फितना फसाद ही बंद हो जाए.
और साथियों ये कहना सरासर भ्रान्ति है कि फलां मज़हब ऐसा होता है या फलां लोग ऐसे होते हैं.

गिरिजेश राव ने कहा…

सभी ग़ैर मुस्लिम जन!
बात एकदम सही है। पहले पढ़िए फिर ऐसी जगहों पर टिप्पणी करने आइए।
वैसे आप पढ़ लेंगे तो टिप्पणी की आवश्यकता नहीं रहेगी।
क़ुरआन पढ़ना संसार के हर समझदार व्यक्ति के लिए आवश्यक है - क्या मुस्लिम क्या ग़ैर मुस्लिम।
हाँ, विवेकानन्द समग्र साहित्य (समग्र, टुकड़ों में नहीं) भी पढ़ना आवश्यक है। छोटी सी जिन्दगी में क्या क्या पढेंगे लेकिन अगर ये दो पढ़ लिए तो बस समझिए कि आँखें खुल जाएँगीं।

draslamqasmi ने कहा…

nice post

Dr.Ayaz ने कहा…

क़ुरआन पर आपने अच्छी जानकारी दी thanks

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Eshwar ko manne ke bawajud uske order ko na manna khud ko bhatkana hai.jo log apne DHArM bigad baithe wo ajkal apna kam philosophy se chala rahe haine aur musalmanon ki tarah barabri insaniyat aur Ek eshwar ki baat karne lage hain.
VED ghar men nahin choti janeu bhi khatam VARNASHRAM DHARM (SANATANI VIEW)ki baat aaj qanoon se jurm hai.
MUSALMAN jaise to hindu kab ke ho chuke ab muslim hone shayad 20-30hi lagenge aur kafi to MUJH jaise musalman pehle hi hue bhaithe hain.mai khud pathan arya blood hun.
aaj duniya men 153 crore muslim hain aur baqi DHRMON ke Guru pichhle Darwaze se islam ki shiksha lekar apne bhakton ko supply kar rahe hain aur jo murty pujak hindu apne dharm par adig hain woh bhi muslim peer sai baba ke charnon men pade hain.
Ye islam ki taqat hai jise dunya dekh rahi hai lekin manne men ahankar aade aa jata hai.
Theek hai mat mano marne ke baad to khud dekh hi loge.lekin tab manna kuchh fayda na dega.

Tarkeshwar Giri ने कहा…

डॉ अनवर जमाल,

चोटी और जनेऊ गायब हुए है, समय को देखते हुए हमने अपने आप को बदला। लेकिन तुम लोगो ने क्यों बदल लिया अपने आप को क्यों सर के बाल और दाढ़ी गायब हो गई, किधर गई लोगो की मूंछे, क्यों अपनी तस्वीर बनाते हो , क्यों देखते हो टी वि। जबकि कुरान में तो ये सब करना मना है। और जमाल साहेब अगर आपके पूर्वजो ने धर्मं बदलने से पहले अगर कुरान को पढ़ लिया होता शायद आज वो भी वापश अपने घर को लौट गए होते।

आज जो आप इतनी कट्टर बाते कर रहे है ना वो भी आपका सही तरीके से कुरान ना पढ़ पाना ही है।

Tarkeshwar Giri ने कहा…

डॉ अनवर जमाल,

चोटी और जनेऊ गायब हुए है, समय को देखते हुए हमने अपने आप को बदला। लेकिन तुम लोगो ने क्यों बदल लिया अपने आप को क्यों सर के बाल और दाढ़ी गायब हो गई, किधर गई लोगो की मूंछे, क्यों अपनी तस्वीर बनाते हो , क्यों देखते हो टी वि। जबकि कुरान में तो ये सब करना मना है। और जमाल साहेब अगर आपके पूर्वजो ने धर्मं बदलने से पहले अगर कुरान को पढ़ लिया होता शायद आज वो भी वापश अपने घर को लौट गए होते।

आज जो आप इतनी कट्टर बाते कर रहे है ना वो भी आपका सही तरीके से कुरान ना पढ़ पाना ही है।

zeashan zaidi ने कहा…

@ab inconvinienti Ji,
"अब गाय खा ली है और खतना हो गया, फिर हिन्दू तो वापस अपने कुनबे में लेने से रहे."
हिन्दुओं की बात तो आपने की, लेकिन इस्लाम तो पूरी दुनिया में फैला. ईसाई और यहूदी वगैरह दूसरे लोगों ने जब इस्लाम कुबूल किया उस बारे में क्या कहेंगे आप? वो तो गाये भी पहले से खाते थे और खतना भी उनके यहाँ पहले से हुआ रहता था. और उनके यहाँ ये भी क़ैद नहीं की एक बार दूसरा मज़हब अपना लिया फिर वापस नहीं आ सकते. उन्हें चार शादियों का लालच भी नहीं था क्योंकि उनके धर्म में पहले से एलाऊ है.
खैर छोड़िये. आप दो चार लोगों की मदद लेकर कुरआन की कोई ऐसी आयत ढूढिये, जिसमें लोगों को जोर ज़बरदस्ती मार पीटकर इस्लाम कुबुल्वाने के बारे में आर्डर दिया गया हो. हम आपकी बात मान लेंगे की इस्लाम तलवार के जोर पर फैला.

ab inconvenienti ने कहा…

यहाँ मैंने हिन्दुओं की बात की है. और आज तक कितने यहूदी लोगों ने इस्लाम अपनाया, मुझे आंकड़े दीजिये? कुरआन में साफ़ लिखा है (अध्याय ९ : आयत २९) की मुशरिकों को अपने मज़हब में लाओ और जो काफ़िर बने रहें उन्हें जज़िया अदा करने और दबे रहने मजबूर करो.

वैसे भी जोर-जबरजस्ती से मुसलमान बनाने वाले के लिए कोई सजा नहीं है, न ही कुरआन में कहीं लिखा है की जबरजस्ती कबूलवाना गलत है. न ही यह पाप है, जिसके कारण आप अल्लाह की नज़रों में गिर जाते हों और दोज़ख में सीट पक्की होती हो. लिखा है कहीं ऐसा कुरआन में? क्या कुरआन की कोई आयत बता सकते हो जिसमे जोर जबरजस्ती से इस्लाम कबुलवाने को गलत कहा गया हो और ऐसा करने वाले को सजा का प्रावधान हो. जैसे की इस्लाम छोड़कर दूसरे मज़हब को अपनाने वाले के लिए है? या बलात्कार की शिकार महिला के लिए है?

बल्कि जो इस्लाम की राह ज्यादा से ज्यादा लोगों को दिखायेगा उसे कुंवारी हूरों, सोने के महलों और शराब के झरनों का प्रलोभन है, यही मुस्लिम शासकों, सिपहसालारों, ज़मींदारों, मालगुजारों, रसूखदारों के लिए जन्नत में जगह पक्की करने का तरीका था. ज्यादा से ज्यादा 'पुण्य' बटोरने के चक्कर में ये लोग ज़बरजस्ती करने से भी बाज़ नहीं आते थे.

मुसलमानों का सबसे आम तरीका है अप्रत्यक्ष दबाव, जिसके कारण युसूफ योहान्ना को मजबूरन मुसलमान बनना पड़ा. जो मुस्लिम देश या इलाके में रहने वाले हर 'काफ़िर' या 'मुशरिक' को झेलना पड़ता है. प्रत्यक्ष दबाव जैसे जाजिया लगान, गैर मुस्लिम इलाकों की लूटमार, खूनखराबा, बलात्कार, औरतें, बच्चे उठाकर ले जाना, गैर मुस्लिमों को दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक मानना.

आज भी अरब देशों में एक मुसलमान पुरुष की गवाही दो मुसलमान औरतों की गवाही के बराबर मानी जाती है, या चार काफ़िर मर्दों की गवाही के बराबर, या आठ काफ़िर खातूनों की गवाही के बराबर.... कोई मुसलमान अगर वहां हिन्दू को मार डाले तो वह कुछ डिनर देकर छुट सकता है, पर कोई गैर मुस्लिम मुसलमान से पलट कर अपना हक़ मांग ले तो उसे हलाक कर दिया जाता है........ क्या मजाक है यह इस्लामिक कानून? और कहते हो सब बराबर है... जबकि सारे मुस्लिम भी बराबर नहीं है, अरब के मुसलमान खुद को भारतीय मुसलमानों से श्रेष्ठ मानते है. पाकिस्तानी खुद को भारतीय और बंगलादेशी मुसलमानों से बेहतर मानते हैं (बल्कि वे तो भारतीय मुसलमानों को हिन्दू ही माना करते हैं). भारत से गए मुसलमान आज तक मोहाजिर नाम से संबोधित होने मजबूर हैं, जो की गाली की तरह प्रयोग होता है. भारत के मुसलमानों में तो साफ़ साफ़ जाती प्रथा कायम है, मुसलमान मर्द और खातुनें फिल्मों में काम करते हैं फोटोग्राफी करते हैं, फोटू खिंचवाते हैं, इंसानों की चित्रकारी करते हैं, शराब पीते हैं, ब्याज से चलने वाले बैंकों में काम करते हैं, सूद वसूलने की स्कीमें बनाते हैं..... क्या बात है?

http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_converts_to_Judaism

ab inconvenienti ने कहा…

खैर छोड़िये. आप दो चार लोगों की मदद लेकर कुरआन की कोई ऐसी आयत ढूढिये, जिसमें मुस्लिमों को शराब पीने से प्रतिबंध ka आर्डर दिया गया हो. केवल नसीहत दी गई है न की प्रतिबन्ध अल-बकरा दूसरे अध्याय में दो सौ उन्नीसवी आयत पढो.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@Aadarniya Tarkeshwar ji !
vedic kaal men aap murti nahin poojte the aur yag karte the.Phir jain bodh kranti ke dabao men aakar khud hi yag band kar diye aur murtiyan sambhal leen par varnashram par adig rahe. Phir musalmanon aur christians ki naqal men choti janeu to chhota hi jo dharm karm ka mool tha ^VARNASHRAM^ USE BHI JURM AUR PAAP GHOSHIT KAR DIYA.
PHIR HATH MEN BACHA KYA SIVAYE "SHIVLING" KE aur prakriti ki maar ke samne voh bhi khada na rah saka. Amarnath ka haal sabke samne hai.
muslim dadhi mundata hai lekin use gunah manta hai.ISLAM DHARM ke qanun ki pabandi woh aaj bhi zaruri manta hai use jurm aur paap nahin manta aur pakke musalman uski pabandi karke deshhit men qurbaniyan de bhi chuke hen aur ab bhi de rahe hain.
aap namaz aur qurbani par aitraz karte hain par musalman nadano ki wajah se apne dharm ke mool ko nahin chhodta jaise ki VARNASHRAM DHARM ko zamane ke dar se aap chhod baithe.
Badalne ki baat to apne man hi li . HUM to huzur itna arz kar rahe hain ke jab badalna hi hai to zara dhang se badaliye na. kyun?
ISMEN TO AAPKO HAMARA PREM NAZAR AANA CHAHYE THA KATTARTA KYUN DEKH RAHE HAIN.
zARA MUHABBAT SE DEKHIYE JANAB.

zeashan zaidi ने कहा…

@ab inconvinienti Ji,
"यहाँ मैंने हिन्दुओं की बात की है. और आज तक कितने यहूदी लोगों ने इस्लाम अपनाया, मुझे आंकड़े दीजिये?"
क्या मैं चौदह सौ साल के आंकड़े बटोरूँ? और आप बिना रेफरेंस हमपर इलज़ाम लगाते रहें?
"कुरआन में साफ़ लिखा है (अध्याय ९ : आयत २९) की मुशरिकों को अपने मज़हब में लाओ और जो काफ़िर बने रहें उन्हें जज़िया अदा करने और दबे रहने मजबूर करो."
काश की इससे पहले की भी कुछ आयतें पढ़ ली होतीं तो कुछ कहने की आवश्यकता ही न होती. शायद आपको मालूम होगा की हर कानून के साथ IF-Then जुड़ा होता है. अगर भारतीय फ़ौज का कमांडर कहता है की पाकिस्तानी फ़ौज पर टूट पड़ो तो क्या यह आदेश शान्ति समय में लागू होगा?
देखिये उपरोक्त आदेश का IF कहाँ पर है - इसी सूरे की १२ वीं व १३ वीं आयत
9:12
"और अगर ये लोग एहद कर चुकने के बाद अपनी क़समें तोड़ डालें और तुम्हारे दीन में तुमको ताना दें तो तुम कुफ्र के सरवर आवारा लोगों से खूब लड़ाई करो उनकी क़समें का हरगिज़ कोई एतबार नहीं ताकि ये लोग (अपनी शरारत से) बाज़ आएँ"
9:13
"(मुसलमानों) भला तुम उन लोगों से क्यों नहीं लड़ते जिन्होंने अपनी क़समों को तोड़ डाला और रसूल को निकाल बाहर करना (अपने दिल में) ठान लिया था और तुमसे पहले छेड़ भी उन्होंने ही शुरू की थी क्या तुम उनसे डरते हो तो अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो अल्लाह उनसे कहीं बढ़ कर तुम्हारे डरने के क़ाबिल है "
यानी अगर कोई तुमसे लड़ता है तो ज़रूर लड़ो. क्या सेल्फ डिफेंस भारतीय कानून में नहीं है?
इसी सूरे की देखिये आयत अमन पसंद गैर मुस्लिमों के बारे में क्या कहती है
9:6
"और (ऐ रसूल) अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं "
क्या इसमें कहीं कहा गया है की मुशरिक को पकड़कर इस्लाम कुबुल्वा दो?

zeashan zaidi ने कहा…

"खैर छोड़िये. आप दो चार लोगों की मदद लेकर कुरआन की कोई ऐसी आयत ढूढिये, जिसमें मुस्लिमों को शराब पीने से प्रतिबंध ka आर्डर दिया गया हो. केवल नसीहत दी गई है न की प्रतिबन्ध अल-बकरा दूसरे अध्याय में दो सौ उन्नीसवी आयत पढो."
चलिए आपने खुद ही कुबूल कर लिया की इस्लाम में मुसलमानों के लिए भी कोई कठोर बंदिश नहीं है. यानी वह अपने कर्मों के लिए स्व्येम ज़िम्मेदार है. तो अगर मुसलमानों के लिए इतनी आज़ादी है तो गैर मुस्लिमों के लिए कहाँ से बंदिशें हो जायेंगी? जबकि वह तो इस्लामी कानूनों को मानते ही नहीं.
अब बात करते हैं मुसलमानों व इस्लामी राज्यों की. तो एक बात ये है की इस्लामी कानून और मुसलमान दो अलग अलग चीज़ें है. इस्लामी कानून में हर मुसलमान अपना जज खुद होता है. अगर उसे बेटर लाइफ चाहिए तो वह खुद ही कानूनों का पालन करेगा. वरना फिर वह होगा और उसका अल्लाह.

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

भाईयों अनवर जी ने अच्‍छी बातें कही हैं वह रोमन में होने के कारण उतना प्रभावित नहीं कर पा रहीं थी मैंने आपके कमेंट को युनिकोड में कर दिया है जिससे आसानी से उनकी बात समझी जा सके, आपका शायद यह पहला कमेंट है, आप की पुस्‍तक नेट की दुनिया में धूम मचा चुकी, आपका कई धर्मों पर अध्‍ययण अतुलनीय है, अब आप अगर हिन्‍दी युनिकोड में लिखने और कमेंट करने लगें तो बहुत कुछ सम्‍भव है, मेरी अल्‍लाह से दुआ है कि वह जल्‍द युनिकोड में कमेंट करने लगे

आपकी पुस्‍तक ''दयानन्‍द ने क्‍या खोजा क्‍या पाया''
http://hamarianjuman.blogspot.com/2009/12/dr-anwar-jamal-research.html

आदर्णीय तार्केश्‍वर जी!
वैदिक-काल में आप मूर्ती नहीं पूजते थे और यज्ञ करते थे फिर जैन,बोद्घ क्रान्ति के दबाओ में आकर खुद ही यज्ञ बन्‍द कर दिये और मूर्तियाँ संभाल लीं पर वर्णाशरम पर अडिग रहे, फिर मुसलमानों और ईसाइयों की नकल में छोटी जनेव तो छोडा ही जो धर्म-कर्म का मूल था, वर्णाशरम उसे भी जुर्म और पाप घोषित कर दिया, फिर हाथ में बचा क्‍या सिवाये 'शिवलिंग' के और प्रकृति की मार के सामने वह भी खडा न रह सका, अमरनाथ का हाल सबके सामने है
मुस्लिम दाढ़ी मुडाता है लेकिन उसे गुनाह मानता है, इस्‍लाम धर्म के कानून की पाबन्‍दी वह आज भी जरूरी मानता है उसे जुर्म और पाप नहीं मानता और पक्‍के मुसलमान उसकी पाबन्‍दी करके देशहित्‍ा में कुरबानियाँ दे भी चुके हैं और अब भी दे रहे हैं
आप नमाज और कुरबानी पर एतराज करते हैं पर मुसलमान नादानों की वजह से अपने धर्म के मूल को नहीं छोडते जैसे की वर्णाशरम धर्म को जमाने के डर से आप छोड बैठे
बदलने की बात तो आपने मान ही ली हम तो साहब इतना अर्ज कर रहे हैं कि जब बदलना ही है तो ज़रा ढंग से बदलिए ना क्‍यूँ?
इसमें तो आपको हमारा प्रेम नजर आना चाहिए था कटटरता क्‍यूँ देखी रहे हैं
ज़रा मुहब्‍बत से देखिए जनाब

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

इस्‍लाम दोस्‍तो आप सभी बधाई के हकदार हैं, आप सबके जवाब से मुझे लगता है कि आप में से हर एक सारे इस्‍लाम मुखलिफों के लिए काफी है, अल्‍लाह हम सबको हौसला दे, आमीन

ab inconvenienti ने कहा…

फिर पूछ रहा हूँ

1. वैसे भी जोर-जबरजस्ती से मुसलमान बनाने वाले के लिए कोई सजा नहीं है, न ही कुरआन में कहीं लिखा है की जबरजस्ती कबूलवाना गलत है. न ही यह पाप है, जिसके कारण आप अल्लाह की नज़रों में गिर जाते हों और दोज़ख में सीट पक्की होती हो. लिखा है कहीं ऐसा कुरआन में? क्या कुरआन की कोई आयत बता सकते हो जिसमे जोर जबरजस्ती से इस्लाम कबुलवाने को गलत कहा गया हो और ऐसा करने वाले को सजा का प्रावधान हो. जैसे की इस्लाम छोड़कर दूसरे मज़हब को अपनाने वाले के लिए है? या बलात्कार की शिकार महिला के लिए है?

बल्कि जो इस्लाम की राह ज्यादा से ज्यादा लोगों को दिखायेगा उसे कुंवारी हूरों, सोने के महलों और शराब के झरनों का प्रलोभन है, यही मुस्लिम शासकों, सिपहसालारों, ज़मींदारों, मालगुजारों, रसूखदारों के लिए जन्नत में जगह पक्की करने का तरीका था. ज्यादा से ज्यादा 'पुण्य' बटोरने के चक्कर में ये लोग ज़बरजस्ती करने से भी बाज़ नहीं आते थे.

2. मुसलमानों का सबसे आम तरीका है अप्रत्यक्ष दबाव, जिसके कारण युसूफ योहान्ना को मजबूरन मुसलमान बनना पड़ा. जो मुस्लिम देश या इलाके में रहने वाले हर 'काफ़िर' या 'मुशरिक' को झेलना पड़ता है.

3. प्रत्यक्ष दबाव जैसे जाजिया लगान, गैर मुस्लिम इलाकों की लूटमार, खूनखराबा, बलात्कार, औरतें, बच्चे उठाकर ले जाना, गैर मुस्लिमों को दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक मानना. जिसके कारण जहाँ जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक होते हैं वहां अन्य धर्मों के लोग बचते ही नहीं. पाकिस्तान में हिन्दू केवल एक प्रतिशत के आसपास बचे हैं. वहीँ कश्मीर में बचे ही नहीं.

4. आज भी अरब देशों में एक मुसलमान पुरुष की गवाही दो मुसलमान औरतों की गवाही के बराबर मानी जाती है, या चार काफ़िर मर्दों की गवाही के बराबर, या आठ काफ़िर खातूनों की गवाही के बराबर.... कोई मुसलमान अगर वहां हिन्दू को मार डाले तो वह कुछ डिनर देकर छुट सकता है, पर कोई गैर मुस्लिम मुसलमान से पलट कर अपना हक़ मांग ले तो उसे हलाक कर दिया जाता है........ क्या मजाक है यह इस्लामिक कानून? और कहते हो सब बराबर है...

5. जबकि सारे मुस्लिम भी बराबर नहीं है, अरब के मुसलमान खुद को भारतीय मुसलमानों से श्रेष्ठ मानते है. पाकिस्तानी खुद को भारतीय और बंगलादेशी मुसलमानों से बेहतर मानते हैं (बल्कि वे तो भारतीय मुसलमानों को हिन्दू ही माना करते हैं).भारत से गए मुसलमान आज तक मोहाजिर नाम से संबोधित होने मजबूर हैं, जो की गाली की तरह प्रयोग होता है. भारत के मुसलमानों में तो साफ़ साफ़ जाती प्रथा कायम है, मुसलमान मर्द और खातुनें फिल्मों में काम करते हैं फोटोग्राफी करते हैं, फोटू खिंचवाते हैं, इंसानों की चित्रकारी करते हैं, शराब पीते हैं, ब्याज से चलने वाले बैंकों में काम करते हैं, सूद वसूलने की स्कीमें बनाते हैं..... क्या बात है?

ab inconvenienti ने कहा…

@ zeeshan zaidi

6. इस्लाम छोड़ने वाले के लिए सजा का प्रावधान क्यों है? जबकि उसे तो इस्लामिक कानूनों से आजाद होना चाहिए?

7. कोई मानता है की उसे जबरजस्ती या लालच देकर इस्लाम कबूलवाया गया तो क्या वह इस्लामिक कानूनों से आजाद हो सकता है?

8. क्या इस्लाम में दिम्मी के सभी हक़ मुसलमान जितने ही हैं?

9. क्या बलात्कार पीडिता अपने बलात्कार के लिए खुद ज़िम्मेदार है ? क्या उसे सजा का प्रावधान है? क्या सच में उसे बलात्कार साबित करने के लिए मोमिनों को गवाही के लिए लाना होगा जिन्होंने अपनी आँखों से बलात्कार होते देखा हो?

10. क्या मस्जिद में बैठकर शराब पी जा सकती है? 'या तो पिने दे शराब मस्जिद में बैठकर या वो जगह बता दे जहाँ खुदा न हो' (वैसे खुदा-ईश्वर सब वहम है)

11. क्या फिल्मे, चित्रकारी, फोटोग्राफी इस्लाम में जायज़ हैं?

12. कितने मुसलमान अपनी छः साल की बेटी को पचपन साल के व्यक्ति से ब्याहने तैयार हो जायेंगे? (वैसे सउदी अरब --जहाँ कुरआन संविधान है--- शेख भारत और बंगलादेश से किशोर लड़कियां खरीद कर ले जाते हैं). कोई मुसलमान इसे गैर इस्लामी क्यों नहीं कहता?

13. जबकि वह तो इस्लामी कानूनों को मानते ही नहीं.अब बात करते हैं मुसलमानों व इस्लामी राज्यों की. तो एक बात ये है की इस्लामी कानून और मुसलमान दो अलग अलग चीज़ें है. इस्लामी कानून में हर मुसलमान अपना जज खुद होता है. अगर उसे बेटर लाइफ चाहिए तो वह खुद ही कानूनों का पालन करेगा. वरना फिर वह होगा और उसका अल्लाह

फिर ऐसा क्यों होता है की जहाँ इस्लामिक मुल्क घोषित हुआ वहां शराब बंदी हो गई? क्यों? क्यों मुसलमान इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते? क्या कोई उलेमा फ़तवा दे सकता है की शराब, फिल्मे, टीवी, फोटोग्राफी, islam se धर्मान्तरण इस्लाम में नाजायज़ नहीं है?

इस्लाम छोड़ने वाला भी अपना जज खुद हुआ, इस्लाम पर सवाल उठाने वाला, खुदा के अस्तित्व पर शक करने वाला भी अपना जज खुद हुआ. क्यों उन्हें सजा?


14. हर मुसलमान को अपनी कमाई के पैसे से हज करना होता है, सरकारी खैरात पर हज करना इस्लाम के खिलाफ क्यों नहीं है?

15. क्या मुंबई हमलों में मारे गए जेहादियों को भी बहत्तर हूरें और शराब के झरने, बागों वाले सोने के महल मिलेंगे?

क्या दंगा करते मरे मुसलमान को भी बहत्तर हूरें और शराब के झरने, बागों वाले सोने के महल मिलेंगे?

क्या आतंकवादी को भी बहत्तर हूरें और शराब के झरने, बागों वाले सोने के महल मिलेंगे?

क्या आतंकवादियों के खिलाफ लड़ने वाले मुसलमान को भी बहत्तर हूरें और शराब के झरने, बागों वाले सोने के महल मिलेंगे?

16. जन्नत जाने वाले मर्दों के लिए बहत्तर हूरें, जन्नत जाने वाली खातूनों के लिए कोई इंतजाम नहीं? ये नाइंसाफी क्यों?


वैसे तो कई और सवाल हैं, पर फ़िलहाल इनके उत्तर मिले तो दूसरे सवाल भी उठाता हूँ.

safat alam taimi ने कहा…

ab inconvenienti साहेब यह सारे संदेह आपके मन में इस कारण हैं कि आपने अपने इश्वर के अवतरित किये हुय जीवन व्यवस्था को जाना नहीं है हमें आप पर दया आ रही है, प्लीज़ आप अपनी अमानत अर्थात ईश्वर के नियम को समझने का कष्ट करें , मेरे भाई आप ओर हम सब इस धरती पर एक सीमित दिनों के लिए हैं , हमारा ईश्वर हम सब को एक समान बनाया है, इस प्रकार आप हमारे भाई हैं , भाई कुछ भी बोले उसका असर आदमी नहीं रखता , हम समझ रहे हैं कि आप यह सारी बातें न जानने के कारण ही कह रहे हैं, यह बातें दिल से निकल रही हैं, दिल की आवाज़ है जो आप तक पहुंचा रहा हूँ, प्लीज़ एक बार विशाल ह्रदय से अपनी अमानत की खोज कर लें , अर्थात इस्लाम को जान लें, यह आपके ईश्वर का धर्म है, जब तक आप अपने ईश्वर के सन्देश को न जानेंगे तब तक सत्य सामने नहीं आ सकता, यदि हम चाहें तो हम आपके एक एक सवाल का जवाब देने बैठ जाएँ लेकिन आपको अभी इसकी ज़रुरत नहीं, पढ़ने के बाद बोलीय फिर हम आप को इसका जवाब देते हैं , ( जनाब कलीमुद्दीन सिद्दीकी साहेब की किताब आपकी अमानत आपकी सेवा में पर मौ जूद है, इसे पढ़ लें फिर हम आपके सवाल का जवाब देते हैं . यदि समय न हो तो कहें हम आप को पाँच मिनट में इस्लाम बता देते हैं फिर आपके सवालों का जवाब देंगे

safat alam taimi ने कहा…

please visit:
http://islaminhindi.blogspot.com/

ab inconvenienti ने कहा…

@safat alam taimi

अगर जवाब हैं तो ज़रूर दीजिये. भले एक नई पोस्ट लिखें. एक एक करके ग़लतफ़हमियाँ दूर करें, आखिर हम भी तो जानें की हमारे शक-शुबहा कहाँ और क्यों गलत हैं. आप एक एक करके शक दूर करेंगे तभी तो दूर होंगे.

यह आपकी साईट के लिए भी अच्छा है. लोग सवाल उठाएंगे आप एक एक कर जवाब देंगे, जिससे कुछ ही महीनों में आपके पास सवालों का अच्छा खासा डेटाबेस तैयार हो जायेगा. कुछ सैकड़ा भर सवाल है जो गैर मुस्लिम पूछते हैं, अगर उनके जवाब मिल जाएँ तो इस्लाम के बारे में सबको जानकारी हो जाएगी. फिर एक वक्त ऐसा आयेगा सवाल उठाने के लिए प्रश्न ही नहीं बचेंगे, आखिर कोई कितनी ग़लतफ़हमी पालेगा? तर्कसंगत उत्तर के आगे सभी चुप हो जाते हैं.

और अगर जवाब देने से बच रहे हैं तब इसका एक ही मतलब है: आपके पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं.

zeashan zaidi ने कहा…

@ab inconvinienti Ji,
Q 1,3,15 का जवाब:
2:256
दीन में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस शख्स ने झूठे खुदाओं बुतों से इंकार किया और अल्लाह ही पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है
2:272
ऐ रसूल उनका मंज़िले मक़सूद तक पहुँचाना तुम्हारा काम नहीं (तुम्हारा काम सिर्फ़ रास्ता दिखाना है) मगर हॉ अल्लाह जिसको चाहे मंज़िले मक़सूद तक पहुंचा दे
7:56
(लोगों) अपने परवरदिगार से गिड़गिड़ाकर और चुपके - चुपके दुआ करो वह हद से तजाविज़ करने वालों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता और ज़मीन में असलाह के बाद फसाद न करते फिरो और (अज़ाब) के ख़ौफ से और (रहमत) की आस लगा के अल्लाह से दुआ मांगो
2:11
और जब उनसे कहा जाता है कि मुल्क में फसाद न करते फिरो (तो) कहते हैं कि हम तो सिर्फ इसलाह करते हैं
2:12
ख़बरदार हो जाओ बेशक यही लोग फसादी हैं लेकिन समझते नहीं
मुंबई और पाकिस्तान के आतंकवादियों की जगह मरने के बाद वहीँ है जो गुजरात और भागलपुर के दंगाइयों की है. क्योंकि हर तरह के फसाद के बारे में अल्लाह सख्ती से मना करता है. ज़बरदस्ती किसी का मज़हब बदलना भी फसाद ही है.
हाँ प्यार मोहब्बत के साथ अपने मज़हब में इनवाईट करने में कोई हर्ज नहीं.
2. मुसलमानों का सबसे आम तरीका है अप्रत्यक्ष दबाव, जिसके कारण युसूफ योहान्ना को मजबूरन मुसलमान बनना पड़ा. जो मुस्लिम देश या इलाके में रहने वाले हर 'काफ़िर' या 'मुशरिक' को झेलना पड़ता है.
इस्लाम कुबूल करने के बाद यूसुफ़ का स्टेटमेंट "I cannot tell you what a great feeling it is."
क्या आप बताएंगे मस्जिद की मीनारों के विरोधी ने क्यों इस्लाम कुबूल कर लिया? उसके ऊपर कौन सा दबाव था? (इससे पहले की पोस्ट पढ़ें.)
3. जहाँ जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक होते हैं वहां अन्य धर्मों के लोग बचते ही नहीं. पाकिस्तान में हिन्दू केवल एक प्रतिशत के आसपास बचे हैं. वहीँ कश्मीर में बचे ही नहीं.
मुस्लिम देशों में मुस्लिम आबादी - मिस्र 90%(10%?), Indonesia - 86%(14%?), Nigeria - 50%(50%?), Sudan 70%(30%?), Qatar - 77%, Brunei - 67%, UAE - 76%, Malaysia - 60%, Kuwait - 85%, Lebenon - 60%, Bahrain- 81%, Syria - 90% ????

zeashan zaidi ने कहा…

4,5.....और कहते हो सब बराबर है...
यह तो पूरी दुनिया में हो रहा है. हर देश में दूसरे देश के शहरी को दोयम दर्जे का माना जाता है. तो मुसलमान कहाँ से दूध का धुला हो जाएगा. जब कोई फ़रिश्ता नहीं तो आप उससे क्यों एक्स्पेक्ट करते हो की वह फ़रिश्ता हो जाए. हाँ वह कोशिश ज़रूर कर सकता है क्योंकि उसके पास Best Guidelines हैं.
7. कोई मानता है की उसे जबरजस्ती या लालच देकर इस्लाम कबूलवाया गया तो क्या वह इस्लामिक कानूनों से आजाद हो सकता है?
जी हाँ. और अगर उसे डर है की उसकी गर्दन उड़ा दी जायेगी तो वह चोरी छुपे भी अपना पुराना धर्म मानता रह सकता है. जैसा की रसूल के ज़माने में कुछ मुनाफ़िक़ किया करते थे और रसूल जानते हुए भी खामोश रहते थे. लेकिन मरने के बाद उसका जो अंजाम होगा उसमें फिर उसे शिकायत का कोई मौका न होगा. वैसे चन्द्रमोहन उर्फ़ चाँद मुहम्मद का उदाहरण तो सबके सामने है. क्या किसी ने उसके क़त्ल का फतवा दिया?
9. क्या बलात्कार पीडिता अपने बलात्कार के लिए खुद ज़िम्मेदार है ? क्या उसे सजा का प्रावधान है? क्या सच में उसे बलात्कार साबित करने के लिए मोमिनों को गवाही के लिए लाना होगा जिन्होंने अपनी आँखों से बलात्कार होते देखा हो?
अच्छा इस्लामी कानून छोड़िये. आप कैसे सिद्ध करेंगे की पीडिता के ऊपर बलात्कार हुआ है? कैसे सिद्ध करेंगे की वह किसी पर इलज़ाम नहीं लगा रही है? कैसे पता करेंगे की बलात्कारी कौन है?
10. क्या मस्जिद में बैठकर शराब पी जा सकती है? 'या तो पिने दे शराब मस्जिद में बैठकर या वो जगह बता दे जहाँ खुदा न हो' (वैसे खुदा-ईश्वर सब वहम है)
2:219
(ऐ रसूल) तुमसे लोग शराब और जुए के बारे में पूछते हैं तो तुम उन से कह दो कि इन दोनो में बड़ा गुनाह है और कुछ फायदे भी हैं और उन के फायदे से उन का गुनाह बढ़ के है और तुम से लोग पूछते हैं कि अल्लाह की राह में क्या ख़र्च करे तुम उनसे कह दो कि जो तुम्हारे ज़रुरत से बचे यूँ अल्लाह अपने एहकाम तुम से साफ़ साफ़ बयान करता है
जिस चीज़ को करने पर गुनाह है वह इस्लाम में हराम है.
11. क्या फिल्मे, चित्रकारी, फोटोग्राफी इस्लाम में जायज़ हैं?
हराम भी नहीं हैं. यह सब तो टूल्स हैं. चाहे सही इस्तेमाल करें चाहे ग़लत.
12. कितने मुसलमान अपनी छः साल की बेटी को पचपन साल के व्यक्ति से ब्याहने तैयार हो जायेंगे? (वैसे सउदी अरब --जहाँ कुरआन संविधान है--- शेख भारत और बंगलादेश से किशोर लड़कियां खरीद कर ले जाते हैं). कोई मुसलमान इसे गैर इस्लामी क्यों नहीं कहता?
जो ऐसा कर रहे हैं वह खुद ही सोचें की सही कर रहे हैं या ग़लत.(हर मुसलमान अपना जज खुद होता है.)
13. "फिर ऐसा क्यों होता है की जहाँ इस्लामिक मुल्क घोषित हुआ वहां शराब बंदी हो गई? क्यों? क्यों मुसलमान इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते? क्या कोई उलेमा फ़तवा दे सकता है की शराब, फिल्मे, टीवी, फोटोग्राफी, islam se धर्मान्तरण इस्लाम में नाजायज़ नहीं है?"
शराब इस्लाम में हराम है. इसके बावजूद मुस्लिम देशों में आजादी है लोग घर में बैठकर शराब पी सकते हैं. हाँ सड़क पर मना है. क्या हमारे देश के कानून में खुलेआम शराब पीना एलाऊ है?
16. जन्नत जाने वाले मर्दों के लिए बहत्तर हूरें, जन्नत जाने वाली खातूनों के लिए कोई इंतजाम नहीं? ये नाइंसाफी क्यों?
बेहतर है की कोई खातून ये सवाल करे. आप कौन होते हैं उनकी वकालत करने वाले.

KAMDARSHEE ने कहा…

@SAFAT JI
APKE dharm men burkhe wagherah ki pabandi bahut hai. Isse hamara dum Ghut jata hai.
Manushya wasna ka putla hai aur wasna ki purti ke liye hamare mandiron aur teerthon se achhi jagah koi dusri nahin. Apke yahan to HOOR udhar hai. Hamare yahan to nagad hai.Kumbh chal raha hai Ganga ke ghat par harek bhakt apni ankhen aur atma ko tript kar sakta hai.
dusri kami apke yahan NIYOG ki anumati na hona hai.
By the way kisi musalman murd ke sperm kum hon to woh bina aulad ke hi marega.jivan bhar kasht uthayega.
jabke hamare DHARM MEN KISI SE BHI AURAT GARBH DHARAN KAR SAKTI HAI.
HAMARE REET RIWAJ KO AAP GUNAH BATATE HO.
Agar aurat widhwa ho jati hai aap uski dobara shadi kar dete ho.Ek ka paband banana achha hai ya ye achha hai ke use kisi ashram men chhod diya jaye.SEX ki purti bhi ho jayegi aur moksh bhi mil jayega.
Aaj europe jis free sex par itrata hai ,hamare poorwaj to usse bhi aage the.wishwas na ho to MAHABHARAT UTHAKAR PADH LO.
AURAT KO TAB JITNI AZADI THI UTNI AZADI KA PEHLE INTEZAM KARO PHIR HUMSE ISLAM KABULWANE KI SOCHNA.
Everything depends on sex.Sex is the source of our greatculture. Please try to understand yaar.

ab inconvenienti ने कहा…

जितने भी आयतें गिनाई उनमे से कोई भी जबरजस्ती कलमा पढ़ाने वाले को पापी नहीं मानती, न ही साफ़ साफ़ इसे गुनाह घोषित करती हैं. आप आयातों के बीच से वाक्यांश निकाल कर दे रहे हैं और कह रहे हैं लो तुम्हारा जवाब! ऐसी कोई आयात बताओ जिसमे किसी जबरजस्ती से इसलाम कबूलवाने को कुफ्र का दर्जा दिया हो. इसके आलावा इतनी मोटी कुरआन में कोई मुस्लिम बादशाह, ज़मींदार, मालगुजार ये तीन वाक्यांश खोजेगा और अमल करेगा......!!!!!!!!!!! हद है! जब जीते हुए इलाके की जनता अपने कब्ज़े में हो और इस्लाम कबूलवाने में 'पुण्य' हो और साफ़ साफ़ राजनैतिक फायदे हों तो क्या कोई ये इतनी मोटी किताब खोल कर आयातों में ये तीन वाक्यांश खोजता बैठेगा?

पहली आयत में आसानी से कहा जा सकता है की यह इस्लाम स्वीकार कर चुके लोगों को संबोधित है न की काफिरों या मुशरिकों को.

दूसरी आयत मंजिले मकसूद के बारे में है, क्या सिर्फ इस्लाम अपना लेना ही मंजिल है? यह मंजिले मक़सूद इस्लाम अपनाना तो नहीं हो सकती, हां इमान से इबादत करना ज़रूर हो सकती है. वैसे भी यह रसूल (पैगम्बर) को संबोधित है, न की हर मुस्लिम को --- इसमें रसूल से कहा गया है की आराधना के मार्ग में किसी का हाथ पकड़ कर घसीटने की ज़रूरत नहीं है, उन्हें केवल सलाह दो.

ab inconvenienti ने कहा…

तीसरी आयत 'असलाह के बाद फसाद ' के बारे में है, जो की मुस्लिमों को ही नसीहत है की वे आपस में फसाद न करें और नियमों के अन्दर रहें.

अगर अल्लाह ने मना किया है तो शिया सुन्नी क्यों सारी दुनिया में एक दुसरे से मारकाट मचाते रहते हैं, क्यों पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर भारत में आतंकी भेजता है? क्यों तालिबान जबरजस्ती दुनिया को दरउलउलूम बनाने का ख्वाब देखता है?



मुस्लिम मौलाना खुद हर भारत जाकर जेहाद करने वाले को बताते हैं की अगर तुम शहीद हुए तो तुम्हे जन्नत में ये मिलेंगी वो मिलेगा. हर पकडे गए आतंकी ने यही कहा है.

युसूफ ने यह सामाजिक अलगाव और दबाव दूर होने के बारे में कहा था, चलो मज़हब बदला और इतने दबाव हट गए, अच्छा तो महसूस होगा ही. उस स्विस नेता की वो जाने, यह तो वाही बता सकता है की क्यों अपनाया. शायद वह आइन्स्टीन और न्यूटन से भी ज्यादा होशियार है, जो बात दुनिया भर में इतने सारे लोगों की समझ नहीं आ रही वह यह समझ पाया. इसे सारे नोबेल प्राइज़ दो!

पूर्वी यूरोप से निकट के देश मिस्र , नाईजेरिया, सूडान, कातर, कुवैत, लेबनान, बहरीन, सिरिया में सारे अल्पसंख्यक इसाई हैं , जिन्हें पश्चिम के ताकतवर देशों का समर्थन हासिल है. मुस्लिम सत्ता इनके मामलों में दखलंदाज़ी चाहकर भी नहीं कर सकती. बाकि इंडोनेशिया, ब्रुनेई, मलेशिया में इस्लामिक और बौद्ध परंपरा मिली जुली है, यहाँ के मुस्लिम बौद्ध और हिन्दू मंदिरों में रामलीला करते हैं और बुद्ध की पूजा अर्चना में भाग लेते हैं, जो की एक मुस्लिम के लिए प्रतिबंधित है. वहां भी वहाबी इस्लाम आ चुका है इसलिए मलेशिया और इंडोनेशिया में गैर मुस्लिमों पर अत्याचार शुरू हो चुके है .... बाली बम विस्फोट, मलेशिया में तमिल हिन्दुओं पर अत्याचार मिसालें हैं. युएई और कुवैत को सस्ते और अच्छे कर्मचारी, मैनेजर, इंजिनियर, और टेक्नीशियन चाहिए, जो भारत से जाते है, उन्हें नाराज़ करके वही नुकसान में रहेंगे. दुबई में तीन लाख हिन्दू काम करते हैं पर वहां केवल एक ही मंदिर है जो भारतीय दूतावास के अन्दर है!!!!!! कश्मीर कोई हिन्दू नहीं बचा , जबकि वहां सन १९०० में लगभग आधी हिन्दू आबादी थी. अरब पाकिस्तान और कश्मीर में वहाब अपने सही रूप में है.

बेस्ट गाइद्लाइन्स तुम्हारे पास नहीं हमारे पास हैं, यह हम कहते हैं. इसाई खुद बाइबिल की गाइद्लाइन्स को सबसे बेहतर बताते हैं, बौद्ध धम्म्पितक को, यहूदी तोराह को. these are best guideline for them.

ab inconvenienti ने कहा…

मुस्लमान अपने दूसरों से बेहतर होने का दावा करते हैं तो बेहतर होकर भी दिखाएँ. ऐसा इस्लाम में ही है की वहां घोषित रूप से हब्शी, हिन्दुओं और गैर यूरोपियन ईसाईयों को मुसलमानों से नीचा मानते हैं. दुसरे बुरे हों तो हों, तुम क्यों बुरे हो? यह कोई माफ़ी नहीं हो सकती की हमारी बुरे इसीलिए माफ़ क्यों की कुछ और लोग भी बुरे हैं. बाकि सभी देशों में कम से कम कानून के अनुसार सभी बराबर हैं, बस मुस्लिम मुल्कों में कानून की किताबें तक अत्याचार में शामिल हैं.

चन्द्रमोहन ने इस्लाम अपनाया ही गलत मकसद से था और उसके मकसद को जानकर भी मुस्लिमों ने समर्थन किया, तो उसके धर्म छोड़ने पर उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा. अभी २६/११ और इस्लामिक आतंकवाद का मुद्दा भी बहुत गर्म है इसीलिए चुप्पी ही बेहतर समझी गई, नहीं तो लोगों को आलोचना का एक और मुद्दा मिल जाता. यह सहमी हुई चुप्पी थी, जिसके कारण राजनैतिक थे. वर्ना साफ़ साफ़ कुरआन और हदीस में इस्लाम छोड़ने वाले का सीधे सर उड़ाने हुक्म है. इसमें फ़तवा क्या कर लेगा, जब कुरान और हदीस में ही साफ़ लिखा है.


तुम्हारे नबी ने आयशा से ..... करते वक्त नहीं सोचा तो ऐय्याश शेख क्यों सोचने लगे? अल्लाह और कुरआन की आलोचना करो तो मौत, धरम छोडो तो मौत पर बच्चियों के साथ अय्याशी में खुद जज..... वाह क्या बात है!

किस किस मुस्लिम देश में शराब की खरीद बिक्री की इजाज़त है, मेरी जानकारी में तो शरिया को मान्यता देने वाले हर देश में मुस्लिमों के लिए सख्ती से शराब प्रतिबंधित है.

कोई औरत बलात्कार का गलत इलज़ाम लगाएगी , क्योंकि न तो वह साबित कर सकेगी और जिंदगी भर के लिए बदनामी झेलनी होगी वह अलग, जबकि कोई बलात्कारी मोमिनों को samne बिठाकर बलात्कार नहीं करेगा. और तो और इस्लाम बलात्कार से पीड़ित महिला को पत्थरों से मार डालने की सिफारिश करता है. इस्लाम में बलात्कारी के बच निकलने की पूरी गुंजाईश छोड़ी गई है, पर पीड़ित औरत को कहीं इंसाफ नहीं दिया गया.

और आखिरी सवाल का जवाब टाल गए? क्योंकि कोई जवाब नहीं है, मैं ही पूछ रहा हूँ. जवाब हो तो दो, वर्ना मान लिया की जेहादियों अय्याशी का लालच देता है, पर महिलाओं को कैसा स्वर्ग मिलता होगा? यह शंका समाप्त नहीं हुई है.

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

दोस्‍तो आपके जवाबों से दिल से दुआ निकलती है, शाबाश, जिहाद पर तफसीली जवाब देना चाहो तो देखो
पुस्‍तक ''जिहाद या फ़साद'-jihad--aur-quran--sawalon-ke-jawab
डायरेक्‍ट लिंक
http://islaminhindi.blogspot.com/2009/11/jihad-aur-quran-sawalon-ke-jawab.html

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विचार करें कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि
(इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
antimawtar.blogspot.com (Rank-1 Blog)
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अल्‍लाह का
चैलेंज पूरी मानव-जाति को

अल्‍लाह का
चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता

अल्‍लाह का
चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं

अल्‍लाह का
चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार

अल्‍लाह का
चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में

अल्‍लाह
का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी


छ अल्लाह के चैलेंज सहित अनेक इस्‍लामिक पुस्‍तकें
islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)
डायरेक्‍ट लिंक

ab inconvenienti ने कहा…

@ KAMDARSHEE

मुसलमान आदमियों को तो जंग में बलात्कार करने की इजाज़त तो है ही, औरतें लड़कियां लूटने की भी. एक मर्द चार शादी करे, जब मन आये तीन बार तलाक बोल कर रिश्ता ख़त्म कर ले. और औरत के मरने पर दशक दूसरी शादी कर ले. अगर आदमी क इन सबकी इजाज़त है तो औरत को क्यों नहीं? औरत को कैद में रख कर कौन सा तीर मार लोगे? क्या पाकिस्तान और अरब में गैर आदमी औरतों में रिश्ते नहीं बनते? पाकिस्तान में इतने बलात्कार होते हैं, वह क्यों होते हैं. मुस्लिम तो सर्वथा पवित्र होते हैं फिर अरब और पाकिस्तान में ये नाजायज़ रिश्ते बनाने वाले कौन हैं?
अब बचकानेपन में यह मत कहना की औरत ही पूछेगी तो हम बताएँगे

हम लाख बुरे सही पर हम मुहम्मद की तरह पचपन की उम्र में नौ साल की लड़कियों के साथ 'निकाह मुकम्मल' नहीं करते.

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

'हमें खुदा कैसे मिला'
प्रस्तुत पुस्तक एक संग्रह है 80 ऐसी औरतों की कहानियों का जो अधिकांश यूरोप और अमेरिका से संबंध रखती हैं। इन सौभाग्यशाली महिलाओं को वास्तव में सच्चाई की तलाश थी और उन्हों ने गहन अध्ययन, सोच-विचार और संतुष्टि के बाद इस्लाम ग्रहण किया। इस्लाम स्वीकारने के बाद आज़माइशों और संकटों ने इनका रास्ता रोकने की कोशिश की, मगर ये साहसी महिलायें पहाड़ के समान अपने फैसले पर जमी रहीं।
डायरेक्‍ट लिंक
http://www.scribd.com/doc/19834206/-hamenkhudakesemilastories80newmuslimswomens

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

दोस्‍तो छोटे-छोटे सवालों पर हमारे बुजुर्गों ने पुस्‍तकें तैयार की हैं, आप अपना समय बचायें और सवाल करने वालों को एक दो लाइन नहीं पूरी किताब थमायें जैसे नारी, इस्‍लाम और परर्दे पर निम्‍न लिंक से पुस्‍तक देखें

पुस्तक: ''इस्लाम में परदा और नारी की हैसियत''

सामूहिक जीवन में औरत और मर्द का संबंध किस तरह होना चाहिए, यह इंसानी सभ्यता की सब से अधिक पेचीदा और सब से अहम समस्या रही है, जिसके समाधान में बहुत पुराने ज़माने से आज तक दुनिया के सोचने-समझने वाले और विद्वान लोग परेशान हैं, जबकि इसके सही और कामयाब हल पर इंसान की भलाई और तरक्क़ी टिकी हुई है।
इतिहास का पन्ना पलटने से पता चलता है कि प्राचीन काल की सभ्याताओं से लेकर आज के आधुनिक पिश्चमी सभ्यता तक किसी ने भी नारी के साथ सम्मान और और न्याय का बर्ताव नहीं किया है! वह सदैव दो अतियों के पाटन के बीच पिसती रही है। इस घोर अंधेरे में उसको रौशनी एक मात्र इस्लाम ने प्रदान किया है, जो सर्व संसार के रचयिता का एक प्राकृतिक धर्म है, जिस ने आकर नारी का सिर ऊँचा किया, उसे जीवन के सभी अधिकार प्रदान किये, समाज में उसका एक स्थान निर्धारित किया और उसके सतीत्व की सुरक्षा की..
इस पुस्तक में इतिहास से मिसालें दे कर यह स्पष्ट किया गिया है कि दुनिया वालों ने नारी के साथ क्या व्यवहार किया और उसके कितने भयंकर प्रमाण सामने आये, इसके विपरीत इस्लाम धर्म ने नारी को क्या सम्मान दिया, उसकी नेचर के अनुकूल उसके लिये जीवन में क्या कार्य-क्षेत्र निर्धारित किये, उसके के रहन-सहन के क्या आचार नियमित किये तथा सामाजिक जीवन में मर्द और औरत के बीच संबंध का किस प्रकार एक संतुलित व्यवस्था प्रस्तुत किया जिसके समान कोई व्यवस्था नहीं। विशेष कर नारी के परदा (हिजाब) के मुद्दे को विस्तार रूप से उठाया गया है और इसके पीछे इस्लाम का उद्देश्य क्या है? उसका खुलासा किया गया है, तथा जो लोग नारी के परदा का कड़ा विरोध और उसका उपहास करते हैं, इसके पीछा उनका उद्देश्य क्या है और यह किस प्रकार उनके रास्ते का काँटा है, इस से भी अवगत कराया गया है। कुल मिलाकर वर्तमान समय के हर मुसलमान बल्कि हर बुद्धिमान को इस पुस्तक का अध्ययन करना चाहिए

डायरेक्‍ट लिंक पुस्तक: ''इस्लाम में परदा और नारी की हैसियत''

इस्लामिक वेबदुनिया ने कहा…

@ ab inconvenienti
आप मेरे ब्लॉग पर आएं। इसमें सौ से ज्यादा ऐसे लोगों की दास्तां हैं जिन्होंने इस्लाम अपनाया। उन्होंने डिटेल में बताया हैं कि वे इस्लाम में क्यों आए।
अगर आप वास्तव में ईमानदारी से इस्लाम को समझना चाहते हो तो इनके इन्टव्यू पढ़ लो। सब मजहब के लोग हैं। युसूफ का एक्सक्लूसिव इन्टरव्यू भी। यहूदी भी । अस्सी महिलाएं भी। आपके सब सवालों के जवाब मिल जाएंगें। और ना समझना चाहो तो शब्दों का खेल कर खुद भी भ्रमित रहो और दूसरों को भी भ्रमित करते रहो।

zeashan zaidi ने कहा…

@ab inconvinienti Ji,
आप आयातों के बीच से वाक्यांश निकाल कर दे रहे हैं और कह रहे हैं लो तुम्हारा जवाब! ऐसी कोई आयात बताओ जिसमे किसी जबरजस्ती से इसलाम कबूलवाने को कुफ्र का दर्जा दिया हो. इसके आलावा इतनी मोटी कुरआन में कोई मुस्लिम बादशाह, ज़मींदार, मालगुजार ये तीन वाक्यांश खोजेगा और अमल करेगा......!!!!!!!!!!! हद है!
शराब के बारे में तो पूरे कुरआन में दो ही वाक्यांश हैं. तो क्या कोई यह सोचकर बच सकता है की मैंने तो उन्हें पढ़ा ही नहीं? चलिए कुछ आयतें और पढ़ लीजिये,
88:21
तो तुम नसीहत करते रहो तुम तो बस नसीहत करने वाले हो
88:22
तुम कुछ उन पर दरोग़ा तो हो नहीं
109:5
और जिसकी मैं इबादत करता हूँ उसकी तुम इबादत करने वाले नहीं
109:6
तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मेरे लिए मेरा दीन
पहली आयत में आसानी से कहा जा सकता है की यह इस्लाम स्वीकार कर चुके लोगों को संबोधित है न की काफिरों या मुशरिकों को.
कुरआन की तो सारी आयतें या तो रसूल को मुखातिब करके कही गयी हैं या मुसलमान को. ज़बरदस्ती मुसलमान बनाने का काम एक मुसलमान ही तो करेगा, और उसी को रोकने के लिए आयत भी उसी से संबोधित होगी.
इसमें रसूल से कहा गया है की आराधना के मार्ग में किसी का हाथ पकड़ कर घसीटने की ज़रूरत नहीं है, उन्हें केवल सलाह दो.
जो हुक्म रसूल के लिए है मुसलमान उससे हरगिज़ आगे नहीं बढ़ सकता. ऐसा तो है नहीं की अल्लाह रसूल से कुछ कहेगा और मुसलमानों से कुछ.
अगर अल्लाह ने मना किया है तो शिया सुन्नी क्यों सारी दुनिया में एक दुसरे से मारकाट मचाते रहते हैं, क्यों पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर भारत में आतंकी भेजता है? क्यों तालिबान जबरजस्ती दुनिया को दरउलउलूम बनाने का ख्वाब देखता है?
मैंने पहले ही कहा है की हर मुसलमान दूध का धुला नहीं. जहां मानव बम बनने या बनाने पर डालर मिलते हैं वहाँ सही इस्लाम किसे दिखेगा.
उस स्विस नेता की वो जाने, यह तो वाही बता सकता है की क्यों अपनाया.
फिर तो यूसुफ़ ही बता सकता है की उसने इस्लाम क्यों अपनाया. आप कैसे उसके दिल में घुस गए?
शायद वह आइन्स्टीन और न्यूटन से भी ज्यादा होशियार है, जो बात दुनिया भर में इतने सारे लोगों की समझ नहीं आ रही वह यह समझ पाया. इसे सारे नोबेल प्राइज़ दो!
जहां तक आइन्स्टीन की बात है, उसका सिद्धांत तो किसी की समझ में नहीं आया, फिर उसका मज़हब किसकी समझ में आ जाएगा. रही बात न्यूटन की तो विकिपीडिया में छपा ये स्टेटमेंट पढ़िए,
"Newton was also highly religious, though an unorthodox Christian, writing more on Biblical hermeneutics and occult studies than the natural science for which he is remembered today."
"A manuscript he sent to John Locke in which he disputed the existence of the Trinity was never published."
http://en.wikipedia.org/wiki/Isaac_Newton
न्यूटन पूरी तरह धार्मिक होने के बावजूद ट्रिनिटी में विश्वास नहीं करता था. जो की इस्लामिक मान्यता के काफी करीब है. हो सकता है वह मुसलमान हो गया हो लेकिन किसी कारणवश अपना धर्म न ज़ाहिर किया हो.

zeashan zaidi ने कहा…

पूर्वी यूरोप से निकट के देश मिस्र , नाईजेरिया, सूडान, कातर, कुवैत, लेबनान, बहरीन, सिरिया में सारे अल्पसंख्यक इसाई हैं, जिन्हें पश्चिम के ताकतवर देशों का समर्थन हासिल है.
अगर यही कारण है तो सउदी अरब साइंस और तकनीक में पूरी तरह पश्चिमी देशों पर निर्भर है. इस तरह वहाँ ईसाई अच्छे खासे होने चाहिए. जबकि पाकिस्तान की तो पूरी इकोनोमी अमरीका की दान दक्षिणा पर निर्भर है. बाकी बचा अफगानिस्तान तो वह हमेशा से ही लड़ाकू देश रहा है. वहाँ की औरतें आईं तो भारत में रामायण और महाभारत करा दी. अब आप बताएं की इस्लाम और आतंकवाद का रिश्ता कहाँ बाकी रह गया?
जब स्पेन पर मुसलमानों का कब्ज़ा हुआ था तो वहाँ सारे अल्पसंख्यक यहूदी अमन चैन से रहते थे. लेकिन जब बाद में ईसाइयों का कब्ज़ा हुआ तो मुसलमानों को चुन चुनकर मारा गया और जो बचे उन्हें देशनिकाला देकर एक जहाज़ में सवार किया गया और फिर उस जहाज़ में छेदकर उसे डुबो दिया गया. उस दिन को आज भी पूरी दुनिया अप्रैल फूल के नाम से मनाती है और खुश होती है.
यहाँ के मुस्लिम बौद्ध और हिन्दू मंदिरों में रामलीला करते हैं और बुद्ध की पूजा अर्चना में भाग लेते हैं, जो की एक मुस्लिम के लिए प्रतिबंधित है.
यही तो है इस्लामी भाईचारे और एकता की मिसाल.
युएई और कुवैत को सस्ते और अच्छे कर्मचारी, मैनेजर, इंजिनियर, और टेक्नीशियन चाहिए, जो भारत से जाते है, उन्हें नाराज़ करके वही नुकसान में रहेंगे.
अगर हर जगह इकोनोमी ही चीज़ों को कण्ट्रोल कर रही है तो जहां फसाद हो रहे हैं वहाँ इस्लाम को क्यों कसूरवार ठहरा रहे हैं?
कश्मीर कोई हिन्दू नहीं बचा , जबकि वहां सन १९०० में लगभग आधी हिन्दू आबादी थी.
अगर आपके बकौल इस्लाम तलवार के जोर पर फैला तो होना ये चाहिए था की कश्मीर उसी वक़्त हिन्दुओं से साफ़ हो जाता जब मुगलों का टाइम था. अब तो आज़ाद लोकतांत्रिक भारत है फिर इस्लाम कैसे तलवार से फ़ैल रहा है?
इसाई खुद बाइबिल की गाइद्लाइन्स को सबसे बेहतर बताते हैं, बौद्ध धम्म्पितक को, यहूदी तोराह को. these are best guideline for them
हो सकता है लेकिन ईसाई और यहूदी अपनी किताबों को best guidelines खुद ही नहीं मानते. वो तो अपनी किताबों में ही बदलाव करते रहते हैं. जबकि किसी मुसलमान ने कभी अपनी किताब यानी कुरआन में बदलाव नहीं किया.
यह कोई माफ़ी नहीं हो सकती की हमारी बुरे इसीलिए माफ़ क्यों की कुछ और लोग भी बुरे हैं. बाकि सभी देशों में कम से कम कानून के अनुसार सभी बराबर हैं, बस मुस्लिम मुल्कों में कानून की किताबें तक अत्याचार में शामिल हैं.
मैंने कब कहा की सभी मुस्लिम्स को माफ़ी है. ऐसा तो है नहीं की सब मुस्लिम जन्नत में पहुँच जायेंगे. आमाल तो देखे ही जायेंगे. आप एक दो मुल्कों के कानूनों को लेकर सारे मुल्कों को क्यों लपेटे में ले रहे हैं?
इस्लामिक आतंकवाद का मुद्दा भी बहुत गर्म है इसीलिए चुप्पी ही बेहतर समझी गई, नहीं तो लोगों को आलोचना का एक और मुद्दा मिल जाता. यह सहमी हुई चुप्पी थी, जिसके कारण राजनैतिक थे.
भला २६/११ और चंद्रमोहन में क्या सम्बन्ध? २६/११ की सभी ने भर्त्सना की, क्योंकि इस्लामिक नज़र से वह गलत था. और चंद्रमोहन के मामले में चुप रहे. क्योंकि उसमें कुछ बोलने की ज़रुरत ही न थी शरियत के नजरिये से.
वर्ना साफ़ साफ़ कुरआन और हदीस में इस्लाम छोड़ने वाले का सीधे सर उड़ाने हुक्म है. इसमें फ़तवा क्या कर लेगा, जब कुरान और हदीस में ही साफ़ लिखा है.
क्या आप कुरआन की वह आयत दिखा सकते हैं?

zeashan zaidi ने कहा…

तुम्हारे नबी ने आयशा से ..... करते वक्त नहीं सोचा तो ऐय्याश शेख क्यों सोचने लगे?
एक आधारहीन हदीस को आधार बनाकर इस्लाम दुश्मन अक्सर इस्लाम के पीछे पड़े रहते हैं. नबी की बीवी की उम्र के बारे में कुछ भी इतिहास में सिद्ध नहीं है.ज़रा तर्क से सोचिये, नबी की बीवी नबी के हमउम्र सहाबी की सबसे बड़ी बेटी थीं. यानी अगर नबी पचपन के हुए तो उनके सहाबी भी पचपन के ही हुए. तो फिर उनकी बड़ी बेटी इतनी कमउम्र कैसे हो सकती हैं जितना आप सोचते हैं?
http://en.wikipedia.org/wiki/Talk:Aisha
किस किस मुस्लिम देश में शराब की खरीद बिक्री की इजाज़त है, मेरी जानकारी में तो शरिया को मान्यता देने वाले हर देश में मुस्लिमों के लिए सख्ती से शराब प्रतिबंधित है.
आप अरब में रहने वाले अपने किसी दोस्त से पूछ सकते हैं. क्योंकि वहाँ का हाल तो वही बता पायेगा जो वहाँ रहता होगा.
कोई औरत बलात्कार का गलत इलज़ाम लगाएगी...इस्लाम में बलात्कारी के बच निकलने की पूरी गुंजाईश छोड़ी गई है, पर पीड़ित औरत को कहीं इंसाफ नहीं दिया गया.
मैंने आपसे पूछा था की इस्लामिक कानून से अलग आप कैसे बलात्कार के बारे में पता करेंगे. सजा वगैरह की तो बाद की बात है.
मैं ही पूछ रहा हूँ. जवाब हो तो दो, वर्ना मान लिया की जेहादियों अय्याशी का लालच देता है, पर महिलाओं को कैसा स्वर्ग मिलता होगा? यह शंका समाप्त नहीं हुई है.
ठीक है. ज्यादा उतावले हो रहे हैं तो यह शंका भी दूर कर लीजिये
52:24
(और ख़िदमत के लिए) नौजवान लड़के उनके आस पास चक्कर लगाया करेंगे वह (हुस्न व जमाल में) गोया एहतियात से रखे हुए मोती हैं

सलीम खान ने कहा…

@kashif arif

gr8 task!!!

ab inconvenienti ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ab inconvenienti ने कहा…

सब कुछ कान्त छांट कर बीच में से कुछ लाइने कॉपी पेस्ट करके अधकचरे जवाब पेश कर रहे हो.

जबरजस्ती कलमा पढ़ाने के बारे में पूरी आयत हो तो बताओ, जिसका कोई और मतलब न निकाला जा सके

आखिर तुमने मान ही लिया की मुस्लमान दूध के धुले नहीं है, अधिकतर जल्लाद हैं. मरने के बाद डालरों का कोई क्या करेगा? पैसे के लिए फिदायीन थोड़े मरता है, स्वर्ग के लिए मरता है (७२ हूरों और शराब के झरनों वाले)

दूसरी आयत मंजिले मकसूद के बारे में है, क्या सिर्फ इस्लाम अपना लेना ही मंजिल है? यह मंजिले मक़सूद इस्लाम अपनाना तो नहीं हो सकती, हां इमान से इबादत करना ज़रूर हो सकती है. वैसे भी यह रसूल (पैगम्बर) को संबोधित है, न की हर मुस्लिम को --- इसमें रसूल से कहा गया है की लोगों का हाथ पकड़ कर बच्चों की तरह स्पूनफीड करने की ज़रूरत नहीं है, उन्हें (इस्लाम के बन्दों को ) केवल सलाह दो.
यह मुहम्मद को मुस्लमान बन चुके लोगों से डील करने के बारे में आदेश दिया जा रहा है, इसमें काफ़िर कहीं नहीं है. यह आयत धर्म परिवर्तन से सम्बंधित नहीं है.

न्यूटन मुसलमान (?) कहाँ पढ़ लिया भाई हमें भी बताओ!!!! मुझ जैसे नास्तिक भी ट्रिनिटी पर विश्वास नहीं करते क्या नास्तिक भी मुस्लमान हैं. ट्रिनिटी में पवित्र आत्मा की कल्पना है, और न्युतामं आत्मा को नहीं मानता था. क्या मुस्लमान आत्मा को नहीं मानते?

तुम लोग कबसे महाभारत को सच्चा इतिहास मानाने लगे? कभी कहते हो काल्पनिक कहानियां है कभी कहते हो सच में हुआ? जैसी तुम्हारी सुविधा वैसा मान लेते हो?

हर जगह इकोनोमी कंट्रोल नहीं कर रही सिर्फ युएई और कुवैत का नाम लिखा है मैंने, बाकी इस्लामी आतंकवाद का नाच देख ही रहे हो.

कश्मीर से हिन्दुओं को क्यों निकाला गया? पांच लाख लोग अपनी मर्ज़ी से अपना घर, रोजीरोटी और जायदाद छोड़कर दो घंटों के अन्दर yu hi नहीं चले जाते. unhe majboor kia gaya muslimo dwara.

यहूदियों के आलावा मैंने बौद्धों के बारे में भी लिखा है, हिन्दुओं के बारे में भी, सिख भी गुरुग्रंथ साहिब को बेस्ट मानते है. हम कुरआन को बेस्ट गैद्लाइन नहीं मानते.

कोई मुस्लिम जन्नत नहीं पहुँचता, कोई पहुंचा हो तो सबूत दिखाओ. जन्नत के होने का वैज्ञानिक प्रमाण लाओ

Qur'an 4:89 Bukhari 4.260 http://www.faithfreedom.org/content/apostasy-islam
देख लो इस्लाम छोड़ने वालों की सजाएं

पहले तो हदीस को आधारहीन कहना बंद करो, अधिकतर मुसलमान इसे सच्चा मानते हैं. अबू बकर मुहम्मद से दस साल छोटे थे, जब आयशा पैदा हुई तो वे चालीस साल के थे. वैसे मैंने साठ से ऊपर के पट्ठों और चालीस से ऊपर की महिलाओं को माता-पिता बनते देखा है. निकाह के वक्त आयशा छः साल की ही थी. शाही बुखारी गलत क्यों कहेंगे?

साउदी अरब में तो शराब खरीदने बेचने की इजाज़त नहीं है, न ही ब्रुनेई में है! सउदी में मेरा दोस्त आयल शिप पर कम करता है, और ब्रुनेई के पर्तिबंध के बारे में मैं अच्छे से जनता हूँ. Egypt, Syria, Lebanon, Jordan Turkey बंगलादेश पाकिस्तान मालदीव में मुस्लिमों के लिए शराब पीना, बनाना , खरीदना या बेचना अपराध है. कुछ देशों में गैर मुस्लिम और विदेशी पर्यटकों को छूट है.

बलात्कार सच में हुआ है और किसी ने होते नहीं देखा है तो औरत कैसे इंसाफ पायेगी बिना गवाह के? यह मैं पूछता हूँ. तुम कैसे कह सकते हो की औरत झूठ बोल रही है? क्या एक मुस्लिम औरत जब भी बलात्कार का इलज़ाम लगाती है तो वह एक बेगुनाह को फंसा रही होती है.... ऐसा?

लाहौल विला कुवत.... आप जवान हूर हो जाती हैं और आपके आगे नौजवान चक्कर लगाया करते हैं...... तभी मैं सोचूं की जन्नत में हूरों की कमी क्यों नहीं है...... क्या बैलेंस है.. मान गए!!!

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इस्लाम पर सवाल उठाने वाला, खुदा के अस्तित्व पर शक करने वाला भी अपना जज खुद हुआ. क्यों उन्हें सजा?

http://en.wikipedia.org/wiki/Mahmoud_Mohamed_Taha

is link me मुहम्मद ताहा के मामले में देख लो इस्लाम में सुधारवादी बातें करने वाले का क्या हश्र होता है, तसलीमा और रुश्दी का मामला भी साफ़ है. ye dono bhi kisi इस्लामी मुल्क में दिखे तो inki गर्दन उड़ा दी जाएगी.

AB INCONVINIENTI Ka Savaal :

हर मुसलमान को अपनी कमाई के पैसे से हज करना होता है, सरकारी खैरात पर हज करना इस्लाम के खिलाफ क्यों नहीं है

ab inconvenienti ने कहा…

और हां जो बुद्ध या किसी और ईश्वर के सामने सर झुकाता हो, मूर्तिपूजा करता हो वह सच्चा मुस्लमान नहीं है. क्या आपका मानना है की ऐसे मुस्लिम सच्चे इस्लाम के बन्दे कहलाने के हक़दार हैं? अगर हैं तो फिर वहाबी क्या हैं? ज़्यादातर वहाबी आतंकी हैं, उदारवाद और सुधार के दुश्मन और आतंकवाद के समर्थक हैं. क्या तुम उदारवादी मुस्लमान की तरह हिन्दू बौद्ध और जैन मंदिर की पूजा अर्चना में भाग लेना पसंद करोगे? क्या साईं बाबा की मूर्ति के सामने हिन्दुओं की तरह सजदा करोगे? क्या मूर्तियों पर जल चढ़ा सकते हो? हिन्दू तो अपने मंदिरों में भी ईश्वर अल्लाह तेरे नाम गाते हैं, और मजारों पर चादर चढाते हैं, मस्जिद भी दिखे तो प्रणाम करते हुए सर झुका लेते हैं.

KAMDARSHEE ने कहा…

@A B ji
Aapne bahut achha ghera in musalmanon ko.inse itne sawal kar dalo ki inka dhyan hamare devtaon ki rasleelaon ki taraf jane hi na paaye aur agar chala bhi jaye to kah do bhayya hum to ishwar ko mante nahin. Ab hindu dharam ki raksha nastik bankar hi sambhaw hai. warna to Hum duniya men kis kis ko batate phirenge ki Ashvamegh yag men horse ka long long penis pande pakad kar raja ki rani ki patni ki vajina men kyun dalte the?
Inka ghanchakkar bana do.
Werldon A B JI

zeashan zaidi ने कहा…

@ab inconvinienti Ji,
जबरजस्ती कलमा पढ़ाने के बारे में पूरी आयत हो तो बताओ, जिसका कोई और मतलब न निकाला जा सके.
इससे साफ़ और क्या कहा जा सकता है की अल्लाह कह रहा है, 'तुम बस नसीहत करो क्योंकि तुम दरोगा नहीं हो.' या 'तुम्हारा दीन तुम्हारे साथ, मेरा मेरे साथ'. अगर आप इसे भी नहीं मान रहे हो तो उमर भाई के दिए लिंक पर जाओ. और अगर वहाँ भी नहीं बात बनती तो मानते रहो हमें आतंकवादी. चढ़ा दो सारे मुसलमानों को फांसी पर.
आखिर तुमने मान ही लिया की मुस्लमान दूध के धुले नहीं है.
मैं तो यह बात शुरू से ही कह रहा हूँ.
अधिकतर जल्लाद हैं.
इसे कैसे मान लूं? अगर ऐसा हो गया तो दुनिया में कोई गैर मुसलमान ही नहीं बचेगा.
मरने के बाद डालरों का कोई क्या करेगा? पैसे के लिए फिदायीन थोड़े मरता है, स्वर्ग के लिए मरता है.
फिदायीन को फिदायीन बनाने वाला तो डालर खाता है, जो उसे इसी बात के मिलते हैं की मुसलमानों को आपस में और दूसरी शांतिप्रिय कौमों से लड़वाते रहो, ताकि मुसलमान कमज़ोर हो और उसकी हस्ती दुनिया से मिटाई जा सके, लेकिन 'कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी'
इसमें रसूल से कहा गया है की लोगों का हाथ पकड़ कर बच्चों की तरह स्पूनफीड करने की ज़रूरत नहीं है, उन्हें (इस्लाम के बन्दों को ) केवल सलाह दो. यह मुहम्मद को मुस्लमान बन चुके लोगों से डील करने के बारे में आदेश दिया जा रहा है,
क्या इस आयत के आगे पीछे कहीं कहा गया की यह आदेश केवल मुसलमानों के लिए है?
न्यूटन मुसलमान (?) कहाँ पढ़ लिया भाई हमें भी बताओ!!!! मुझ जैसे नास्तिक भी ट्रिनिटी पर विश्वास नहीं करते क्या नास्तिक भी मुस्लमान हैं. ट्रिनिटी में पवित्र आत्मा की कल्पना है, और न्युतामं आत्मा को नहीं मानता था. क्या मुस्लमान आत्मा को नहीं मानते?
ट्रिनिटी का मतलब हुआ तीन खुदा मानना. यानी अल्लाह, साथ में उसका बेटा यानी हज़रत ईसा और बीवी यानी जनाबे मरियम. न्यूटन धार्मिक था अर्थात अल्लाह में विश्वास करता था, यानी नास्तिक नहीं था. लेकिन वह अल्लाह के बेटे और बीवी में विश्वास नहीं करता था. यही तो इस्लाम भी कहता है. अगर न्यूटन मोहम्मद(स.) को भी मान लेता तो शायद गिलोटिन पर रख दिया जाता और उसकी सारी मेहनत मिटटी में मिल जाती. हो सकता है इसीलिये वह चुप रह गया हो.
हर जगह इकोनोमी कंट्रोल नहीं कर रही सिर्फ युएई और कुवैत का नाम लिखा है मैंने, बाकी इस्लामी आतंकवाद का नाच देख ही रहे हो.
कुछ मुट्ठीभर लोग इस्लाम दुश्मन ताक़तों की शह पर मुसलमानों को कमज़ोर करने के लिए अगर आतंकवाद का खेल खेल रहे है तो यह इस्लामी आतंकवाद कैसे हो गया?
कश्मीर से हिन्दुओं को क्यों निकाला गया? पांच लाख लोग अपनी मर्ज़ी से अपना घर, रोजीरोटी और जायदाद छोड़कर दो घंटों के अन्दर yu hi नहीं चले जाते. unhe majboor kia gaya muslimo dwara.
अगर दूसरे हिस्सों के पाश इलाकों में किसी को रहने की अच्छी जगह मिल रही है तो कौन ठन्डे नरक में रहना पसंद करेगा?
हम कुरआन को बेस्ट गैद्लाइन नहीं मानते.
न मानिए.

zeashan zaidi ने कहा…

कोई मुस्लिम जन्नत नहीं पहुँचता, कोई पहुंचा हो तो सबूत दिखाओ. जन्नत के होने का वैज्ञानिक प्रमाण लाओ
आप जन्नत न होने का वैज्ञानिक प्रमाण लाइए. तो हम भी नास्तिक हो जायेंगे.
Qur'an 4:89
इस आयत में कहाँ लिखा है की इस्लाम छोड़ने की सजा मौत है?
Bukhari 4.260
बुखारी की बहुत सी हदीसों को सारे मुसलमान नहीं मानते. कोई ऐसा प्रूफ लाइए जो सर्वमान्य हो.
http://www.faithfreedom.org/content/apostasy-islam देख लो इस्लाम छोड़ने वालों की सजाएं
faithfreedom.org is AntiIslamic site.
अबू बकर मुहम्मद से दस साल छोटे थे, जब आयशा पैदा हुई तो वे चालीस साल के थे. वैसे मैंने साठ से ऊपर के पट्ठों और चालीस से ऊपर की महिलाओं को माता-पिता बनते देखा है. निकाह के वक्त आयशा छः साल की ही थी.
ये लिंक नबी की तारीखे पैदाइश 632 AD बताता है और ये लिंक उनके सहाबी की 634 AD. यानी जब नबी पचपन के हुए तो उनके सहाबी तिरपन के. तो फिर आपके बकौल निकाह के वक़्त नबी की बीवी की उम्र हुई तेरह साल. कौन सी गणित लगाकर आप यह उम्र छः साल बता रहे है? वैसे सच कहा जाए तो हिजरी सन शुरू होने से पहले अरब में कैलेण्डर वगैरह का चलन ही नहीं था. तो किसी की सही उम्र कहाँ पता लग सकती है?
बलात्कार सच में हुआ है और किसी ने होते नहीं देखा है तो औरत कैसे इंसाफ पायेगी बिना गवाह के? यह मैं पूछता हूँ. तुम कैसे कह सकते हो की औरत झूठ बोल रही है? क्या एक मुस्लिम औरत जब भी बलात्कार का इलज़ाम लगाती है तो वह एक बेगुनाह को फंसा रही होती है.... ऐसा?
मैंने एक सवाल पूछा था, की बलात्कार सच में हुआ है, आप कैसे डिसाइड करेंगे? फिर मैं इस्लामी कानून की बात करूं. आप इधर उधर की बातें क्यों कर रहे हैं?
और हां जो बुद्ध या किसी और ईश्वर के सामने सर झुकाता हो, मूर्तिपूजा करता हो वह सच्चा मुस्लमान नहीं है. ......हिन्दू बौद्ध और जैन मंदिर की पूजा अर्चना में भाग लेना पसंद करोगे?
अगर कोई मुसलमान किसी गैर अल्लाह को अल्लाह समझकर सर झुकाता है या सजदा करता है तो वह मुसलमान नहीं है. वैसे तो एक सर दिन भर में पता नहीं कितने लोगों के सामने झुकता है. नाई की दूकान में बैठकर किसी का सर झुकेगा तो क्या वह मुसलमान नहीं रह जाएगा? हर मुसलमान को अपनी हद पता है.
हिन्दू तो अपने मंदिरों में भी ईश्वर अल्लाह तेरे नाम गाते हैं, और मजारों पर चादर चढाते हैं, मस्जिद भी दिखे तो प्रणाम करते हुए सर झुका लेते हैं.
ठीक है, इसी से फैसला हो सकता है. आप अजमेर जाइए और ख्वाजा साहब की दरगाह पर जाकर उनके वसीले से कोई जायज़ मुराद मांग लीजिये. अगर पूरी हो जाये तो इस्लाम कुबूल करना आपकी मर्ज़ी. ज़बरदस्ती की बहस में क्यों वक़्त बर्बाद कर रहे हैं.

ab inconvenienti ने कहा…

हर मुसलमान को अपनी कमाई के पैसे से हज करना होता है, सरकारी खैरात पर हज करना इस्लाम के खिलाफ क्यों नहीं है

ab inconvenienti ने कहा…

you left one question I am asking again :

हर मुसलमान को अपनी imandari aur mehnat ki कमाई के पैसे से हज करना होता है, सरकारी खैरात पर हज करना इस्लाम के खिलाफ क्यों नहीं है.
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कोई आयत नही दे सके, डिफेंसिव होकर दूसरों से ही सुबूत मांगने लगे! मुस्लिम शासक जजिया और जबरन गाय खिलाकर मुस्लमान बनाते ही थे, वो भी मुल्ले मौलानाओं की सलाह पर. यह आज भी जारी है पाकिस्तान जैसे देशों में.

अगर मुसलमान हो जाने से ही लोग नेक नहीं हो जाते तो इस्लाम बेहतर कैसे? हर मुस्लमान दूध का धुला नहीं तो तुम्हारी बेस्ट गाइडलाइन किसी काम की नहीं, वह मज़हब के नाम पर आतंकवाद और कत्लेआम मचने वालों को तक नहीं रोक पाई.

मुस्लमान मौलवी और लोग 'इस्लाम खतरे में है' बताकर, ७२ हूरों (जो की मुसलमानों की जन्नतनशीं माँ बहन बेटियां है) का लालच देते हैं. मध्ययुगीन शिक्षा देते हैं.

क्या डॉलर देनेवाले देश इस्लामिक देशों के मौलवियों को पैसे देते हैं, और कहते हैं मचाओ आतंकवाद हमारे देश में?!!! और मुसलमान डॉलर खाकर आतंकी बन भी जाते हैं!!!!!!! सब समझते हुए भी 'अल्लाह हो अकबर' कहते हुए हमला कर भी देते हैं?

"क्या इस आयत के आगे पीछे कहीं कहा गया की यह आदेश केवल मुसलमानों के लिए है?" गैर मुस्लिमों को कुरआन आदेश कैसे दे सकती है? जो कुरआन को मानते ही नहीं.

ट्रिनिटी में मरियम नहीं है. ईश्वर और यीशू के बीच एक आत्मा है, किसी भी ईसाई से पूछो या वेब खंगाल लो, विकिपीडिया ही देख लो. न्यूटन का आत्मा पर विश्वास नहीं था, क्या मुसलमानों का भी आत्मा पर विश्वास नहीं है?

साबित करो की ट्रिनिटी में ईश्वर और यीशू के बीच होली घोस्ट या स्पिरिट नहीं है, बल्कि मरियम है.

इस्लाम के दुश्मन खुद पर हमला कराने के के लिए मुसलमानों को आतंकवाद के लिए पैसा दे रहे हैं???????

अगर दूसरे हिस्सों के पाश इलाकों में किसी को रहने की अच्छी जगह मिल रही है तो कौन ठन्डे नरक में रहना पसंद करेगा?
हजारो सालों से तो रह रहे थे, किसी मुसलमान ने कश्मीर क्यों नहीं छोड़ा? शरणार्थी कैम्प पोश होते हैं पहली बार सुना!!!!! जो काम गर्म कपड़ों, सिगड़ी, अलाव, हीटर से हो सकता है उसके लिए लोग दो घंटों के अन्दर अपना घर ज़मीन बाग़ छोड़कर यूँ ही चले जायेंगे!!!! इसीलिए मैं कहता हूँ की मुसलमान बुरे हैं, फिलिस्तीन में हो तो बुरा, पर कश्मीर में हो तो अच्छा!!!!!!

फिलिस्तीन में इस्राएल ठीक ही कर रहा है, तुम्हारे जैसे आतंकवाद के समर्थक कश्मीर में हिन्दुओं के क़त्ल जबरजस्ती भगाए जाने का समर्थन करते हो. तुम्हारी बेस्ट गाइडलाइन में कितनी नेकी है यहीं पता चल जाता है.

हम कुरआन को बेस्ट गैद्लाइन नहीं मानते.
न मानिए
मानाने का सवाल ही नहीं है. यह खून खराबे, आतंकवाद और अत्याचार का सन्देश है

जन्नत है ही नहीं तो सबूत क्या दोगे? साबित तुमे करना है, मैं तो केवल सवाल उठा रहा हूँ. अन्धविश्वासी मुझसे तुम्हारी तरह पूछते हैं की साबित करो भूत नहीं होते, साबित करो की परी जिन्न नहीं होते, साबित करो की भैंस हवा में नहीं उड़ सकती, साबित करो की जन्नत नहीं है, साबित करो की कंप्यूटर एलियनों ने डिज़ाइन नहीं किया है?

कुअरान 9:11 से 9:14 तक आयात पढो, सजाएं दिख जाएँगी.

शाही बुखारी झूठ क्यों बोलेंगे? क्या उनकी कोई दुश्मनी थी, उन्होंने साफ साफ़ आयशा की उम्र छह साल बताई है.

अगर बलातकार सच में हुआ है तो औरत बिना चश्मदीद गवाह के कैसे साबित करे?

तुम कह रहे हो की कोई उदार मुसलमान अगर मंदिर के सामने सर झुकाता है तो यह मान कर के चलता है की नाई की दुकान और मंदिर में कोई अंतर नही? क्या आपका मानना है की ऐसे मुस्लिम सच्चे इस्लाम के बन्दे कहलाने के हक़दार हैं? अगर हैं तो फिर वहाबी क्या हैं? ज़्यादातर वहाबी आतंकी हैं, उदारवाद और सुधार के दुश्मन और आतंकवाद के समर्थक हैं. क्या तुम उदारवादी मुस्लमान की तरह हिन्दू बौद्ध और जैन मंदिर की पूजा अर्चना में भाग लेना पसंद करोगे? क्या साईं बाबा की मूर्ति के सामने हिन्दुओं की तरह सजदा करोगे? क्या मूर्तियों पर जल चढ़ा सकते हो? हिन्दू तो अपने मंदिरों में भी ईश्वर अल्लाह तेरे नाम गाते हैं, और मजारों पर चादर चढाते हैं, मस्जिद भी दिखे तो प्रणाम करते हुए सर झुका लेते हैं.

वैसे वहाबियों का तो मजारों सूफियों और दरगाहों पर विश्वास नहीं? ये लोग इसे गैर इस्लामी मानते हैं. वैसे ही जैसे बामियान की बुद्ध प्रतिमाओं को मानते थे.

ab inconvenienti ने कहा…
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ab inconvenienti ने कहा…

साउदी अरब में तो शराब खरीदने बेचने की इजाज़त नहीं है, न ही ब्रुनेई में है! सउदी में मेरा दोस्त आयल शिप पर कम करता है, और ब्रुनेई के पर्तिबंध के बारे में मैं अच्छे से जनता हूँ. Egypt, Syria, Lebanon, Jordan Turkey बंगलादेश पाकिस्तान मालदीव में मुस्लिमों के लिए शराब पीना, बनाना , खरीदना या बेचना अपराध है. कुछ देशों में गैर मुस्लिम और विदेशी पर्यटकों को छूट है.

क्यों शरिया लागू होते ही मुसलमानों पर शराबबंदी थोप दी जाती है? क्या वहां के मुल्ले मौलवी कुरआन नहीं समझते? या तुम उनसे ज्यादा अच्छी तरह समझते हो.

क्यों रुश्दी, ताहा और नसरीन की मौत के फतवे निकाले जाते हैं? क्यों सुधारवादी लेखक नजीब महफूज़ का जीना हराम कर दिया जाता है?

डेनमार्क के कार्टूनिस्ट की मौत पर फतवे और दंगों की बाढ़ आ जाती है, और यह भी कहते हो की ऐसे लोगों को सजा अल्लाह देगा, तो मुस्लमान कौन होते हैं उसे सजा देने वाले या उसकी मौत का फ़तवा जरी करने वाले? उसका फैसला क़यामत के दिन होगा ही.

ab inconvenienti ने कहा…

कुरआन मजीद अल्लाह तआला की आखिरी वही (पैगाम) अपने आखिरी पैगम्बर मुहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर नाज़िल की थी। कुरआन मजीद सारी दुनिया मे सबसे बेहतरीन किताब है,
हम इस से सहमत नहीं तो हमारे लिए क्या?

जो लोग नही मानते उन्के लिये चेतावनी है, उन्के लिये सख्ती है
--------
इसी पोस्ट का यह वाक्य सारी बात साफ़ कर देता है. और तुम कितने उदार हो यह भी बता देता है.

zeashan zaidi ने कहा…

@ab inconvinienti Ji,
हर मुसलमान को अपनी कमाई के पैसे से हज करना होता है, सरकारी खैरात पर हज करना इस्लाम के खिलाफ क्यों नहीं है.
कोई मुसलमान हज के लिए सरकारी खैरात का मोहताज नहीं होता. सरकार उसे अपने फायेदे के लिए सब्सिडी देती है, वरना साल भर तो सरकारी फ्लाईट घाटे में जाती है. लेकिन हज के मौसम में मुसलमानों की मेहरबानी से उसे इतना मिल जाता है की साल भर का घाटा पूरा हो जाता है. अगर सरकार सब्सिडी नहीं देगी तो हाजी दूसरी अच्छी फ्लाइट्स पकड़ लेगा और फिर सरकारी फ्लाईट....
कोई आयत नही दे सके,
जो आयतें मैं दे रहा हूँ उन्हें तुम मानने को तय्यार नहीं, क्योंकि तुम कुरआन के बारे में मुसलमानों से ज्यादा समझते हो.
डिफेंसिव होकर दूसरों से ही सुबूत मांगने लगे!
मैं तो शुरू से ही Defensive हूँ. लेकिन जब तुम्हारी नज़र में सारे मुस्लिम जल्लाद हैं तो मेरा defence भी offense ही नज़र आएगा. रही बात सुबूत देने की तो जो आरोप लगाता है वही तो सुबूत देगा. यही तो देश का कानून कहता है. अगर मुस्लिम शासकों ने लोगों को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया है तो इसका कोई Unbiased सुबूत लाओ.
यह आज भी जारी है पाकिस्तान जैसे देशों में.
तुम्हारी सुई बार बार पकिस्तान पर आकर अटक जाती है. सवाल ये है क्या पाकिस्तान पूरी मुस्लिम कौम का प्रतिनिधित्व करता है?
अगर मुसलमान हो जाने से ही लोग नेक नहीं हो जाते तो इस्लाम बेहतर कैसे?
वैसे तो हर मज़हब में बेस्ट व्यक्तित्व हुए हैं, लेकिन अगर गिनती और क्वालिटी के एतबार से देखा जाए तो सबसे ज्यादा लोग इस्लाम में ही मिलेंगे.
७२ हूरों (जो की मुसलमानों की जन्नतनशीं माँ बहन बेटियां है)
यह फैक्ट तुम्हें कहाँ से मिल गया?
"क्या इस आयत के आगे पीछे कहीं कहा गया की यह आदेश केवल मुसलमानों के लिए है?" गैर मुस्लिमों को कुरआन आदेश कैसे दे सकती है? जो कुरआन को मानते ही नहीं.
वह आदेश मुसलमानों के लिए ही है की वे मुस्लिम और शांतिप्रिय गैर मुस्लिमों के साथ कैसा व्यवहार करें.
न्यूटन का आत्मा पर विश्वास नहीं था, क्या मुसलमानों का भी आत्मा पर विश्वास नहीं है?
इस लिंक पर जाओ और इसे पढो , "Newton saw a monotheistic God as the masterful creator whose existence could not be denied in the face of the grandeur of all creation." साथ ही वह जीसस को God नहीं मानता था.
साबित करो की ट्रिनिटी में ईश्वर और यीशू के बीच होली घोस्ट या स्पिरिट नहीं है, बल्कि मरियम है.
Sorry, मैं गलती पर था.
हजारो सालों से तो रह रहे थे,
क्या पहले कश्मीर में मुसलमान नहीं थे? तो फिर पहले हिन्दुओं ने क्यों नहीं कश्मीर छोड़ा?
फिलिस्तीन में इस्राएल ठीक ही कर रहा है,
दूसरों की ज़मीन पर कब्ज़ा करना अगर ठीक है तो कश्मीर पर क्यों रो रहे हो?
तुम्हारे जैसे आतंकवाद के समर्थक कश्मीर में हिन्दुओं के क़त्ल जबरजस्ती भगाए जाने का समर्थन करते हो. तुम्हारी बेस्ट गाइडलाइन में कितनी नेकी है यहीं पता चल जाता है.
हम तो हर जगह ज़बरदस्ती निकाले जाने का विरोध करते है. हम कश्मीर से हिन्दुओं के भगाए जाने का विरोध करते हैं, हम महाराष्ट्र, असम, उडीसा, गुजरात, झारखंड सभी का विरोध करते हैं. हर जगह कोई न कोई निकाला जा रहा है.
यह खून खराबे, आतंकवाद और अत्याचार का सन्देश है
फिर तो सारे मुसलमानों को आतंकवादी हो जाना चाहिए.

zeashan zaidi ने कहा…

जन्नत है ही नहीं तो सबूत क्या दोगे? साबित तुमे करना है, मैं तो केवल सवाल उठा रहा हूँ.
ठीक है मैंने मान लिया जन्नत नहीं है----तुम्हारे लिए.
अन्धविश्वासी मुझसे तुम्हारी तरह पूछते हैं की साबित करो भूत नहीं होते....
अगर तुम दूसरे के विश्वास को अंधविश्वास कह रहे हो तो साबित तो करना ही होगा. बहुत पहले दुनिया पृथ्वी को केंद्र मानती थी. फिर कोपरनिकस ने इसे गलत सिद्ध किया तो दुनिया का अंधविश्वास दूर हुआ. अगर तुम चाहते हो की हमारी आँखे खुल जाएँ तो साबित करो जन्नत या अल्लाह वगैरह का वजूद नहीं.
कुअरान 9:11 से 9:14 तक आयात पढो, सजाएं दिख जाएँगी.
इसमें कहीं भी कोई ऐसी सजा नहीं है जो इस्लाम छोड़ने वाले को दी जाती हो.
शाही बुखारी झूठ क्यों बोलेंगे? क्या उनकी कोई दुश्मनी थी, उन्होंने साफ साफ़ आयशा की उम्र छह साल बताई है.
न उनकी कोई दुश्मनी थी न वो झूट बोले. लेकिन गलती का इमकान तो था ही क्योंकि पेपर अरब में इस्लाम आने के दो सौ साल बाद शामिल हुआ. उससे पहले हदीसें या तो याद की जाती थीं या पत्तों वगैरह पर लिखकर सुरक्षित की जाती थीं. इसीलिये अधिकतर मुसलमान हदीसों को authentic नहीं मानते हैं. हाँ कुरआन का मामला दूसरा है. उसको लिखने में पूरी एहतियात से काम लिया गया, और उसकी बनावट कुछ ऐसी रही की गलत सूरे लिखने का इमकान ही न रहा.
अगर बलातकार सच में हुआ है तो औरत बिना चश्मदीद गवाह के कैसे साबित करे?
अगर Holleywood की कोई हीरोइन अमरीका के प्रेसिडेंट पर बलात्कार का इलज़ाम लगाती है तो आप सिर्फ उसके बयान पर प्रेसिडेंट को दोषी ठहरा देंगे?
तुम कह रहे हो की कोई उदार मुसलमान अगर मंदिर के सामने सर झुकाता है तो यह मान कर के चलता है की नाई की दुकान और मंदिर में कोई अंतर नही?
मैंने सिर्फ इतना कहा है की अल्लाह मानकर सर झुकाना और अल्लाह न मानते हुए सर झुकाना दो अलग चीज़ें हैं. आप कोई महान काम करिए, मैं आपके सामने सर झुका दूंगा.
साउदी अरब में तो शराब खरीदने बेचने की इजाज़त नहीं है, न ही ब्रुनेई में है! सउदी में मेरा दोस्त आयल शिप पर कम करता है, और ब्रुनेई के पर्तिबंध के बारे में मैं अच्छे से जनता हूँ. Egypt, Syria, Lebanon, Jordan Turkey बंगलादेश पाकिस्तान मालदीव में मुस्लिमों के लिए शराब पीना, बनाना , खरीदना या बेचना अपराध है. कुछ देशों में गैर मुस्लिम और विदेशी पर्यटकों को छूट है.
तो फिर ठीक है. न तो मुसलमान को शराब बनानी है न पीनी है. आपको क्या तकलीफ है?
क्यों रुश्दी, ..डेनमार्क के कार्टूनिस्ट की मौत पर फतवे और दंगों की बाढ़ आ जाती है, और यह भी कहते हो की ऐसे लोगों को सजा अल्लाह देगा, तो मुस्लमान कौन होते हैं उसे सजा देने वाले या उसकी मौत का फ़तवा जरी करने वाले?
अल्लाह यकीनन सजा देगा. लेकिन आप ये बताओ, कोई आपके घर में आकर आपके पिता को अपशब्द कहता है तो क्या तुम उसे पुलिस से पकडवाकर कोर्ट के फैसले का इन्तिज़ार करोगे?

ab inconvenienti ने कहा…

क्या कमज़ोर तर्क हैं?
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एयर इंडिया के औडिट बताते हैं की हज सब्सिडी से उसे भारी घाटा होता है. एयर इण्डिया खुद इसे बंद करना चाहती है पर नेता इसे और हज यात्री ढोने मजबूर कर रहे हैं. यह सरकारी खैरात ही है. सब्सिडी की रकम एयर इंडिया को सरकार वापस ही नहीं करती! तो एयर इंडिया का फायदा कैसे हो गया?
http://www.financialexpress.com/printer/news/360651/
फाइनेंशियल एक्सप्रेस में देख लो.

अब बाताओ क्या हज की खैरात (चाहे किसी भी मकसद से दी जाये, किसी भी रूप में दी जाये) लेना एक मुस्लिम के लिए सही है? वह खून पसीने की कमाई से हज करे या खैरात के पैसों से?

आयत है नहीं, कुछ शब्द निकाल कर कह रहे हो की लो जवाब.

अनबायस्ड सबूत वही होगा जो मुस्लिम शासकों को दूध का धुला साबित करेगा, है न!

पाकिस्तान एक उदहारण है की गैर मुस्लिमों की संख्या बीस प्रतिशत से घटकर दो प्रतिशत से भी कम कैसे रह जाती है. बंगलादेश भी देख लो.

जन्नतनशीं महिलाओं को खुबसूरत हूर बना दिया जाता है, जहाँ उनके आगे पीछे नौजवान लड़के घूमते रहते हैं. जन्नतनशीं मर्द कभी न ख़त्म होने वाली जवानी और अक्षय पौरुष मिलता है. बैलेंस बना के नहीं? वर्ना इतनी हूरें कैसे आ जाती हैं? अपने आप ?

वह आदेश मुसलमानों के लिए ही है की वे मुस्लिम और शांतिप्रिय गैर मुस्लिमों के साथ कैसा व्यवहार करें.
गैर मुस्लिमों के लिए नहीं बल्कि मुस्लिमों की बाकी मुस्लिमों के साथ आपस में बर्ताव के बारे में है यह आयत.

न्यूटन ने घोस्ट पर अविश्वास के कारण ही ट्रिनिटी से श्रद्धा हटा ली थी. नॉन-त्रिनितेरियानिस्म की अवधारणा कई इसाई मतों में इसाइयत की शुरुआत से ही रही है, और जीसस इश्वर नहीं है, कोई जीसस को इश्वर नहीं मानता. बल्कि इश्वर के द्वारा भेजे गए ख़ास दूत थे. पुनर्जागरण काल में कई वैज्ञानिकों को यह पवित्र भूत की अवधारणा पच नहीं रही थी, इसीलिए उन्होंने नॉन-त्रिनितेरियानिस्म की विचारधारा अपना ली.

मैंने सवाल पूछा :
अगर दूसरे हिस्सों के पाश इलाकों में किसी को रहने की अच्छी जगह मिल रही है तो कौन ठन्डे नरक में रहना पसंद करेगा?
हजारो सालों से तो रह रहे थे, किसी मुसलमान ने कश्मीर क्यों नहीं छोड़ा? शरणार्थी कैम्प पोश होते हैं पहली बार सुना!!!!! जो काम गर्म कपड़ों, सिगड़ी, अलाव, हीटर से हो सकता है उसके लिए लोग दो घंटों के अन्दर अपना घर ज़मीन बाग़ छोड़कर यूँ ही चले जायेंगे!!!! इसीलिए मैं कहता हूँ की मुसलमान बुरे हैं, फिलिस्तीन में हो तो बुरा, पर कश्मीर में हो तो अच्छा!!!!!!

जवाब आया :

"क्या पहले कश्मीर में मुसलमान नहीं थे? तो फिर पहले हिन्दुओं ने क्यों नहीं कश्मीर छोड़ा?"

क्योंकि मुसलमानों ने १९८९ में पाकिस्तान के भड़कावे कश्मीर को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की कवायद शुरू कर दी थी, जिसके कारण कश्मीरियों को मजबूरन जान बचा कर घर बार छोड़ना पड़ा. और कोई मुस्लिम उनकी सुरक्षित वापसी के के लिए आवाज़ नहीं उठाता. नेता मुस्लिम वोटों के लालच में यह बात उठाने से बचते हैं.

सभी राज्यों में पहले से ज्यादा मुस्लिम हैं पर कश्मीर में ही हिन्दू नहीं बचे हैं.

सारे नहीं पर यह तय है हर कुरआन पर ही चलने वाला और मानने वाला शख्स तालिबानी मानसिकता का है.

ab inconvenienti ने कहा…

Neuroscience kahta है की इंसान का मष्तिष्क और न्यूरल नेटवर्क ही उसकी चेतना के लिए ज़िम्मेदार हैं, ब्रेन ख़त्म शारीर ख़त्म तो इंसान की हस्ती भी ख़त्म और किस्सा ख़त्म. रूह का क्या काम, और जब रूह नहीं तो जन्नत कैसी? और कैसी क़यामत?


भ्रष्ट हुई तो कुरआन भी हुई aur सुरक्षित रही तो हदीस भी रही. हदीस को भ्रष्ट हुआ बता कर तुम मुसलमानों के एक बड़े हिस्से के विश्वास का अपमान कर रहे हो, जो हदीस को भी सत्य मानते हैं.


अगर बलातकार सच में हुआ है तो औरत बिना चश्मदीद गवाह के कैसे साबित करे?
अगर Holleywood की कोई हीरोइन अमरीका के प्रेसिडेंट पर बलात्कार का इलज़ाम लगाती है तो आप सिर्फ उसके बयान पर प्रेसिडेंट को दोषी ठहरा देंगे?

ये क्या प्रेसिडेंट और होलिउद की बकवास है? कुरआन और शरिया में हीरोइन और अमेरिकन प्रेसिडेंट कहाँ से आ गए? क्या कोई मर्द बलात्कार चश्मदीद गवाह के सामने करेगा? अगर सच में बलात्कार हुआ ही है तो औरत साबित कैसे करे? साबित करने गवाह चाहिए, पर बलात्कार लोगों के सामने तो कोई करेगा नहीं.


क्या आपका मानना है की ऐसे मूर्तियों पर जल चढाने वाले या मूर्तियों के सामने सजदा करने वाले मुस्लिम सच्चे इस्लाम के बन्दे कहलाने के हक़दार हैं? अगर हैं तो फिर वहाबी क्या हैं? ज़्यादातर वहाबी आतंकी हैं, उदारवाद और सुधार के दुश्मन और आतंकवाद के समर्थक हैं. हिन्दू तो अपने मंदिरों में भी ईश्वर अल्लाह तेरे नाम गाते हैं, और मजारों पर चादर चढाते हैं, मस्जिद भी दिखे तो प्रणाम करते हुए सर झुका लेते हैं. वैसे वहाबियों का तो मजारों सूफियों और दरगाहों पर भी विश्वास नहीं? ये लोग इसे गैर इस्लामी मानते हैं. वैसे ही जैसे बामियान की बुद्ध प्रतिमाओं को मानते थे.




क्या तुम गैर वहाबी इण्डोनेशियाई मुस्लमान की तरह हिन्दू बौद्ध और जैन मंदिर की पूजा अर्चना में भाग लेना पसंद करोगे? क्या साईं बाबा की मूर्ति के सामने हिन्दुओं की तरह सजदा करोगे? क्या मूर्तियों पर जल चढ़ा सकते हो?

आयत है :

अल-बकरा दूसरे अध्याय में दो सौ उन्नीसवी आयत isme keval nasihat hai, ki yah nuksaan ka sabab hai.

तुम्हारा पहला जवाब : इस्लाम में मुसलमानों के लिए भी कोई कठोर बंदिश नहीं है. यानी वह अपने कर्मों के लिए स्व्येम ज़िम्मेदार है. तो अगर मुसलमानों के लिए इतनी आज़ादी है तो गैर मुस्लिमों के लिए कहाँ से बंदिशें हो जायेंगी? जबकि वह तो इस्लामी कानूनों को मानते ही नहीं.बात करते हैं मुसलमानों व इस्लामी राज्यों की. तो एक बात ये है की इस्लामी कानून और मुसलमान दो अलग अलग चीज़ें है. इस्लामी कानून में हर मुसलमान अपना जज खुद होता है. अगर उसे बेटर लाइफ चाहिए तो वह खुद ही कानूनों का पालन करेगा. वरना फिर वह होगा और उसका अल्लाह.

फिर अगले जवाब में कहते हो : शराब इस्लाम में हराम है. इसके बावजूद मुस्लिम देशों में आजादी है लोग घर में बैठकर शराब पी सकते हैं. हाँ सड़क पर मना है. क्या हमारे देश के कानून में खुलेआम शराब पीना एलाऊ है?

फिर : किस किस मुस्लिम देश में शराब की खरीद बिक्री की इजाज़त है, मेरी जानकारी में तो शरिया को मान्यता देने वाले हर देश में मुस्लिमों के लिए सख्ती से शराब प्रतिबंधित है.
आप अरब में रहने वाले अपने किसी दोस्त से पूछ सकते हैं. क्योंकि वहाँ का हाल तो वही बता पायेगा जो वहाँ रहता होगा.

फिर मैंने पूछा : साउदी अरब में तो शराब खरीदने बेचने की इजाज़त नहीं है, न ही ब्रुनेई में है! सउदी में मेरा दोस्त आयल शिप पर कम करता है, और ब्रुनेई के पर्तिबंध के बारे में मैं अच्छे से जनता हूँ. Egypt, Syria, Lebanon, Jordan Turkey बंगलादेश पाकिस्तान मालदीव में मुस्लिमों के लिए शराब पीना, बनाना , खरीदना या बेचना अपराध है. कुछ देशों में गैर मुस्लिम और विदेशी पर्यटकों को छूट है.

इसका जवाब : तो फिर ठीक है. न तो मुसलमान को शराब बनानी है न पीनी है. आपको क्या तकलीफ है?

मेरा सवाल है की जब शराब कुरआन में प्रतिबंधित नहीं है तो क्यों मुसलामानों पर बंदिश है? मुसलमान तो ब्लेक में खरीदते हैं, भारत में तो हर तीसरा मुसलमान शराब चख चुका है. पाकिस्तान और बंगलादेश में तिगुनी कीमत में ब्लेक होती है, जिसे मुसलमान पर्यटकों और गैर मुसलमानों से खरीदते हैं. पीने मिले तो अधिकतर मुस्लिम पीते हैं.

उस कार्टूनिस्ट का तो कुछ नहीं बिगड़ पाया आज तक, पर भारत, पाक, बंगलादेश, अरब इरान इराक मलेशिया वगैरह में उसकी वजह से जो दंगे भड़के उसमे मुसलमानों ने कितने ऐसे लोगों को मार डाला जिनका उस कार्टून से कहीं कोई लेना देना नहीं था. क्यों भला, घर में घुसकर पीटने वाला चला गया पर तुम गुस्सा पडोसी पर उतार रहे हो. :-)

zeashan zaidi ने कहा…

@ab inconvinienti Ji,
फाइनेंशियल एक्सप्रेस में देख लो.
रेफरेंस भी ऐसे अखबार का दिया जो हमेशा से मुसलमानों के खिलाफ आग उगलता रहा है. अगर इतना ही घाटा होता है तो सरकारी फ्लाईट अब तक बंद हो जानी चाहिए थी.
अब बताओ क्या हज की खैरात (चाहे किसी भी मकसद से दी जाये, किसी भी रूप में दी जाये) लेना एक मुस्लिम के लिए सही है? वह खून पसीने की कमाई से हज करे या खैरात के पैसों से?
हज के लिए Affordability शर्त है. अगर कोई खैरात (तुम्हारे कथनानुसार) की वजह से affordable हो जाता है तो बुरा क्या है? यहाँ पढ़ लो.
ठीक है बंद कर दो सब्सिडी. लेकिन शर्त है की मोनोपोली भी हटाओ. हाजी को मोलभाव करने का तो मौका मिले.
अनबायस्ड सबूत वही होगा जो मुस्लिम शासकों को दूध का धुला साबित करेगा, है न!
इलज़ाम लगाकर सुबूत नहीं दे रहे हो, फिर उलटी सीधी बातें कर रहे हो. चलो ये
किताब पढ़ लो.
ये सच है की कुछ आक्रमणकारियों ने मंदिर वगैरह को नुक्सान पहुंचाया लेकिन उनका मकसद लूटमार था न की इस्लाम फैलाना. अगर मुस्लिम शासक इतने ही क्रूर होते तो क्या सैंकड़ों साल शासन कर पाते? क्या जनता विद्रोह न कर देती?
पाकिस्तान एक उदहारण है की गैर मुस्लिमों की संख्या बीस प्रतिशत से घटकर दो प्रतिशत से भी कम कैसे रह जाती है. बंगलादेश भी देख लो.
एक उदाहरण से तुम ऐसे मज़हब पर ऊँगली उठा रहे हो जो पूरी दुनिया में फैला है. और एक आध जगह छोड़कर पूरी दुनिया में हमारी कौम शान्ति से दूसरों के साथ मिल जुलकर रह रही है. रही बात पकिस्तान और बांगलादेश पर, तो उसकी बुनियाद ही झगडे पर हुई है. उससे शान्ति की उम्मीद कैसे?
जन्नतनशीं महिलाओं को खुबसूरत हूर बना दिया जाता है, जहाँ उनके आगे पीछे नौजवान लड़के घूमते रहते हैं......वर्ना इतनी हूरें कैसे आ जाती हैं? अपने आप ?
अगर तुम्हारी बात सच मान ली जाए तो ये कैसे संभव होगा की एक जवान के साथ कई हूरें और एक हूर के साथ कई जवान?
न्यूटन ने घोस्ट पर अविश्वास के कारण ही ट्रिनिटी से श्रद्धा हटा ली थी. नॉन-त्रिनितेरियानिस्म की अवधारणा कई इसाई मतों ......इसीलिए उन्होंने नॉन-त्रिनितेरियानिस्म की विचारधारा अपना ली.
ईसाई तो कई बार अपनी मान्यताओं को बदल चुके हैं, लेकिन उस समय तो वे हज़रत ईसा को खुदा का बेटा ही मानते थे.जीसस को अल्लाह का नबी तो मुसलमान भी मानते हैं. और हमने कभी अपनी इस मान्यता को नहीं बदला. हमने अल्लाह को हमेशा से एक माना, न ही पवित्र आत्मा को इस्लाम में अल्लाह माना गया. तो फिर न्यूटन की मान्यता और इस्लाम की मान्यता में क्या अंतर रहा?
जी हाँ अंतर है. वो भी इसलिए क्योंकि ईसाई पवित्र आत्मा के कांसेप्ट को या तो समझ नहीं पाए या जानकार अनजान बने रहे. इस्लाम के अनुसार अल्लाह ने सबसे पहले जो चीज़ क्रियेट की वह थी, मोहम्मद(स.) की आत्मा. बाइबिल में यही पवित्र आत्मा के रूप में वर्णित है. देखा जाए तो मुसलमान असली बाइबिल में ईसाई से ज्यादा यकीन रखता है.
क्योंकि मुसलमानों ने १९८९ में पाकिस्तान के भड़कावे कश्मीर को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की कवायद शुरू कर दी थी,.......नेता मुस्लिम वोटों के लालच में यह बात उठाने से बचते हैं.
पाकिस्तान कश्मीर को भारत से अलग करना चाहता है, इसलिए वह अपने आतंकवादी भेजकर वहाँ आतंक फैला रहा है. यानी यहाँ मुद्दा इस्लामीकरण की आड़ में कुछ और है. इस्लाम से इसका कोई लेना देना ही नहीं. क्या तुम्हें लगता है वहाँ का मुस्लिम अमन की ज़िन्दगी गुज़ार रहा है? पल भर में वहाँ की पुलिस किसी को आतंकवादी ठहराकर भून देती है और कहीं रिपोर्ट तक नहीं आती. सिक्के का दूसरा पहलू देखना है तो यहाँ देख लो.

zeashan zaidi ने कहा…

सारे नहीं पर यह तय है हर कुरआन पर ही चलने वाला और मानने वाला शख्स तालिबानी मानसिकता का है.
एक और इलज़ाम. अब इसको साबित भी कर दो. लेकिन उससे पहले एक सवाल क्या हज़रत इमाम हुसैन(अ.), अजमेर के ख्वाजा(र.) , आगरा के शहीदे सालिस(र.), दिल्ली के हज़रत निजामुद्दीन(र.), देवा के हाजी वारिस(र.), शेख सलीम चिश्ती(र.) जैसे बुज़ुर्ग कुरआन को नहीं मानते थे? अगर ये लोग तालिबानी मानसिकता के थे तो हर धर्म का व्यक्ति इनके आगे सर क्यों झुकाता है?
Neuroscience kahta है की इंसान का मष्तिष्क और न्यूरल नेटवर्क ही उसकी चेतना के लिए ज़िम्मेदार हैं, ब्रेन ख़त्म शारीर ख़त्म तो इंसान की हस्ती भी ख़त्म और किस्सा ख़त्म.
ज़रा ये लिंक भी पढ़ लो "Mrs. Thomas, while being kept breathing artificially, had no detectable brain waves for more than 17 hours. The family were discussing organ donation options for their mother when she suddenly woke up and started speaking to nurses."
और यहाँ भी पढ़ लो."However, some religious groups and even some healthcare workers अरे uncomfortable with a brain death definition of death since the patient may still have a heart beat and wish to wait until there is persisting absence of heart beat, the classical criterion." यानी ब्रेन डेथ अंतिम डेथ नहीं है. दरअसल इंसान की बॉडी का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं की वह मरा तो इंसान पूरी तरह मर गया.
अब आगे बढ़ते हैं. जुरासिक पार्क तो देखी ही होगी. बहुत पहले सड़ गल गए डाइनासोर का DNA मिल जाए तो उस डाइनासोर का हूबहू दूसरा जन्म संभव है, ये तो साइंटिस्ट कह रहे हैं और आप कहते हो इन्सान एक बार ख़त्म तो ख़त्म.
और कैसी क़यामत?
विज्ञान तो कहता है की सूर्य एक दिन सुपरनोवा बनकर ख़त्म हो जाएगा, और आप कहते हो कैसी क़यामत?
भ्रष्ट हुई तो कुरआन भी हुई aur सुरक्षित रही तो हदीस भी रही. हदीस को भ्रष्ट हुआ बता कर तुम मुसलमानों के एक बड़े हिस्से के विश्वास का अपमान कर रहे हो, जो हदीस को भी सत्य मानते हैं.
मैंने ठोस दलीलें दीं तो ओछेपन पर उतर आये. यानी मुसलमानों को ही आपस में हदीस के मानने न मानने और वहाबी गैर वहाबी जैसे मामलों में लडवा दो. लेकिन इससे मेरी ही बात वेरीफाई हो रही है की अगर मुसलमान आपस में लड़ते हैं तो इसके पीछे एंटी इस्लामिक ताक़तों का हाथ होता है. अगर कोई ऐसी आयत बनाकर ले आओ जो कुरआन की किसी आयत का मुकाबला कर सके तो हम कुरआन को बदला हुआ मान सकते हैं. रही बात हदीस की तो वह तो सलमान रूश्दी ने भी बना दी.

zeashan zaidi ने कहा…

अगर बलातकार सच में हुआ है तो औरत बिना चश्मदीद गवाह के कैसे साबित करे?
मैं कुरआन से ही अल्टरनेट निकाल के बताऊंगा. लेकिन पहले मेरे सवाल का जवाब दो, इस्लामिक कानून से अलग बलात्कार को कैसे साबित करोगे?
ये क्या प्रेसिडेंट और होलिउद की बकवास है? कुरआन और शरिया में हीरोइन और अमेरिकन प्रेसिडेंट कहाँ से आ गए?
मुझे एक ऐसा Universal Law चाहिए जिसमें सब शामिल हों. ये ठीक है की भारत में कोई औरत बदनामी के डर से झूठा इलज़ाम नहीं लगाएगी. लेकिन Hollywood की औरत तो लगा सकती है? उसे बदनामी का क्या डर? उसे तो और पब्लिसिटी मिलेगी.
अगर हैं तो फिर वहाबी क्या हैं? ज़्यादातर वहाबी आतंकी हैं, उदारवाद और सुधार के दुश्मन और आतंकवाद के समर्थक हैं.
चलिए एक पल को मान लें की सारे वहाबी (जो की गलत है) आतंकी हैं, तो पूरी दुनिया की 1.6 बिलियन मुस्लिम आबादी में केवल डेढ़ करोड़ वहाबी मान्यता के लोग है, यानी एक प्रतिशत भी नहीं. फिर तुम अधिकाँश को आतंकी और जल्लाद कैसे बना देते हो?
अल-बकरा दूसरे अध्याय में दो सौ उन्नीसवी आयत isme keval nasihat hai, ki yah nuksaan ka sabab hai. तुम्हारा पहला जवाब ...........अधिकतर मुस्लिम पीते हैं.
मेरी किस बात में तुम्हें विरोधाभास दिख रहा है? जिस आयत का तुमने हवाला दिया उसी में है की शराब पीने का गुनाह उसके फायेदे से बहुत ज्यादा है. अब और कैसे मना किया जायेगा? कुरआन ने तो हर हराम चीज़ को इसी स्टाइल से मना क्या है. उसके बाद अगर मुसलमान किसी तरीके से पीता है (जिसके लिए उसका हाथ नहीं पकड़ा जा सकता) तो उसे मरने के बाद सज़ा मिलनी ही है और अगर उसने शराब के नशे में कोई और गुनाह किया तो इसकी भी सजा मिलेगी. रही बात देश की तो अगर कोई देश इसको अच्छा कानून मानते हुए शामिल करता है तो आप क्यों सवाल खडा करते हो? अब इस कानून के बावजूद मुसलमान उस देश में शराब पी रहा है (किसी भी तरकीब से) तो मेरा जुमला 'लोग घर में बैठकर शराब पी सकते हैं.' सही हुआ या गलत?
तुमने कहा कुछ देशों में 'गैर मुस्लिम और विदेशी पर्यटकों को छूट है.' तो मेरी बात कैसे गलत हो गई की 'गैर मुस्लिमों के लिए कहाँ से बंदिशें हो जायेंगी? जबकि वह तो इस्लामी कानूनों को मानते ही नहीं.'
भारत में तो हर तीसरा मुसलमान शराब चख चुका है.
अगर ये बात तुमने अरब के लिए कही होती तो मैं मान लेता क्योंकि वहाँ कुछ शराबें शराब नहीं समझी जातीं. लेकिन भारत में तुम्हें कहाँ से ये आंकड़े मिल गए? या हमेशा की तरह हवाई छोड़ रहे हो?
उस कार्टूनिस्ट का तो कुछ नहीं बिगड़ पाया आज तक, पर भारत, पाक, बंगलादेश, अरब इरान इराक मलेशिया ....घर में घुसकर पीटने वाला चला गया पर तुम गुस्सा पडोसी पर उतार रहे हो. :-)
जब कोई प्रदर्शन होता है तो उसमें अराजक तत्व भी शामिल हो जाते हैं जिनका मकसद भीड़ की आड़ में लूटमार ही होता है. इसके लिए असली प्रदर्शनकारी तो दोषी हो नहीं गए. और दूसरी बात क्या पडोसी का फ़र्ज़ नहीं बनता की वह पीटने वाले का हाथ थाम ले. किसी घर को आग लगती है तो धुवां पड़ोस में भी भरता है.

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

@ भाई ज़ीशान आपके जवाबों को देखकर बहुत खुशी होती है, दुआ निकलती है अल्‍लाह आपकी कलम को और शक्ति दे,
मशवरा था के जवाब और सवाल में कुछ फर्क करके लिखें तो नये पाठक भ्रमित न हों,
दूसरी बात हमें आपका हमारी अन्‍जुमन में शामिल होने की दरखास्‍त मिल चुकी, पर नियमनुसार निवेदन का बेसब्री से इन्‍तजार है, अर्थात नयी पोस्‍ट पर कमेंटस में दरखास्‍त किजिये, सलीम साहब की भी खाहिश है आपको जल्‍द शामिल किया जाए, निवेदन के बाद हमें अपने अन्‍जुमन के दोस्‍तों की राय भी लेनी है, बराय मेहरबानी जल्‍द कमेंटस में जवाब दिजिये

ab inconvenienti ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ab inconvenienti ने कहा…

हां दस अरब साल बाद एक दिन सुपरनोवा बनकर ख़त्म हो जाएगा. पर इंसान की नस्ल को पैदा हुए ढाई लाख साल भी नहीं बीते. जब रूह ही नहीं तो अल्ला किसका इन्साफ करेगा? क़यामत उस दिन को कहते हैं जब अल्ला सबकी रूहों का इन्साफ करेगा. किसका इन्साफ करेगा जब इश्वर रूह आत्मा अंधविश्वास हैं?

भ्रष्ट हुई तो कुरआन भी हुई aur सुरक्षित रही तो हदीस भी रही. हदीस को भ्रष्ट हुआ बता कर तुम मुसलमानों के एक बड़े हिस्से के विश्वास का अपमान कर रहे हो, जो हदीस को भी सत्य मानते हैं.

इसमें कुछ ओछापन नहीं है, सबूतों के साथ साबित करो की हदीस भ्रष्ट हुई और कुरआन नहीं

मध्ययुग और आज में अंतर यह है की आज बलात्कार पारिस्थितिक साक्ष्य, पीडिता के शारीर पर जबरजस्ती के निशान, शारीर और कपड़ों पर शारीरिक द्रवों की वैज्ञानिक जांच, डीएनए एनालिसिस, मुजरिम और पीडिता का क्रोस एक्सामिनेशन से साबित किया जा सकता है. हर किसी को इन्ही से अपनी बेगुनाही और आरोप साबित करना होता है. कम से कम दो मोमिनों ने नहीं देखा न सही. बिन गवाह के विज्ञान ही इंसाफ दिला देता है या आपकी बेगुनाही साबित करता है.

रही बात देश की तो अगर कोई देश इसको अच्छा कानून मानते हुए शामिल करता है तो आप क्यों सवाल खडा करते हो? अब इस कानून के बावजूद मुसलमान उस देश में शराब पी रहा है

जब मुसलमान के लिए प्रतिबंधित नहीं है तो क्यों जबरजस्ती शराबबंदी थोप रहा है? मुसलमान पी रहा है क्यों की उसे पीना है, पीने के टाइम नहीं मानता कुरआन की नसीहत..... खुल्ली बगावत.... का कल्लोगे?

कुछ देशों में कहा न की हर देश में. कुछ मुल्क ही हैं न की हर एक मुल्क.

भारत में मुस्लिम पीते हैं, बीयर वाइन से लेकर ठर्रा रम वोदका तक पीते हैं, जिसकी जैसी हैसियत. तुम्हारे कुरआन में सिगरेट तम्बाकू गुटखा के बारे में कुछ नहीं लिखा?

मुस्लिम देशों में शरिया के अनुसार छिप कर पीना भी मना है. और भारत में तो बहुत सारे मुस्लमान पीते हैं.

और दूसरी बात क्या पडोसी का फ़र्ज़ नहीं बनता की वह पीटने वाले का हाथ थाम ले. किसी घर को आग लगती है तो धुवां पड़ोस में भी भरता है

माने पडोसी चुप रहे तो उसे तुम सजा दोगे? मुसलमानों की रैली में मुसलमान ही अराजक तत्व होंगे, अगर कोई बलवा कर रहा है तो क्यों बाकी मुसलमान उन्हें नहीं रोकते? सभी सभी काफिरों को कुरआन में जहाँ पाओ वहां में मार डालने का हुक्म है.

zeashan zaidi ने कहा…

हज़रत इमाम हुसैन(अ.), .....जैसे बुज़ुर्ग कुरआन को नहीं मानते थे
हज़रत इमाम हुसैन(अ.), जो नबी(स.) के नवासे थे और जिनके बारे में खुद नबी ने फरमाया की हुसैन मुझसे हैं और मैं हुसैन से हूँ, जिनको हर मुसलमान नबी के बाद सबसे ज्यादा इज्ज़त देता है.जिनको जन्नत का सरदार कहा गया है, उनके बारे में तुम कहते हो की वो कुरआन को नहीं मानते थे. और दो कौड़ी के तालिबानियों के बारे में कहते हो की वो कुरआन को मानते हैं. तो तुमसे बहस का कोई मतलब नहीं रह जाता. जाओ जो जी में आये समझते रहो.
हाँ बलात्कार वाले तुम्हारे सवाल का जवाब दे देता हूँ. चूंकि तुमने मेरे प्रश्न का उत्तर दे दिया था, और वही दिया जो मैं चाहता था. ये आयतें पढो.

12:26
या दर्दनाक अज़ाब में मुब्तिला कर दिया जाए यूसुफ ने कहा उसने ख़ुद (मुझसे मेरी आरज़ू की थी और ज़ुलेख़ा) के कुन्बे वालों में से एक गवाही देने वाले ने गवाही दी कि अगर उनका कुर्ता आगे से फटा हुआ हो तो ये सच्ची और वह झूठे
12:27
और अगर उनका कुर्ता पींछे से फटा हुआ हो तो ये झूठी और वह सच्चे
यानी कुरआन ने चौदह साल पहले ही बता दिया है की सुबूतों के आधार पर फैसला करो.

ab inconvenienti ने कहा…

भाई जीशान, मान लिया की जिन्होंने भी इस्लाम के नाम पर गलत किया वे कुरआन का गलत मतलब निकाल रहे थे, और उनके निजी स्वार्थ थे.

मैंने मान लिया की कुरआन गलत नहीं बल्कि उसके नाम पर फायदा उठाने वाले और लोगों को भड़काने वाले गलत है. तुमने इतने धीरज से समझाया, इसके लिए शुक्रिया.

-------

इमाम हुसैन के बारे में मुझसे कॉपी पेस्ट में गलती हुई है, दरअसल मैं नाम डिलीट करना चाहता था, और सूफी संत मंसूर के बारे में कहना चाहता था की उन्हें अनलहक कहने पर मुस्लिम सरदारों ने दीन से बगावत के नाम पर मार डाला था. पर एडिटिंग की गलती से original text रह गया. इस बात के लिए मैं बेहद शर्मिंदा हूँ.

अब इस गलती के बाद मैं खुद अपने को सवाल करने लायक नहीं समझता. मैं वह पूरा सवाल खुद हटा रहा हूँ. यह एडिटिंग और रिव्यू में लापरवाह की वजह से हुआ. I apologize.

ab inconvenienti ने कहा…

अगर हो सके तो कुछ गलत लोगों की वजह से हर एक मुस्लिम को कट्टरपंथी समझने की नादानी नज़रंदाज़ कर देना. मेरे कई मुस्लिम दोस्त रहे हैं और उन्होंने कभी तालिबानियों का समर्थन नहीं किया, पर मैं ही उन्हें अपवाद समझता था. भारतीय मुस्लिम सच में उदारवादी है, और आपकी बातों से लगता है की युवा मुस्लिम किसी भड़कावे में नहीं आयेंगे क्योंकि वे खुद सोचने समझने की ताकत रखते हैं. धन्यवाद.

zeashan zaidi ने कहा…

ab भाई, आपका बहुत बहुत शुक्रिया की आपने हमारी बातों को गौर व सुकून से पढ़ा और हकीकत को समझा. जो आपकी गलतफहमियां थीं उसके लिए हम मुसलमान ही ज़िम्मेदार हैं, उसमें आपका कोई कुसूर नहीं. हममें से कुछ मुठ्ठीभर लोग जो पूरी दुनिया में अफरा तफरी फैला रहे हैं उनकी वजह से शांतिप्रिय मुसलमानों की आवाजें नक्कारखाने में तूती की तरह सिद्ध हो रही हैं.
और हाँ, मैं अपने इन शब्दों को वापस लेता हूँ,"मैंने मान लिया जन्नत नहीं है----तुम्हारे लिए".
फैसले का हक तो सिर्फ अल्लाह को है.

Parvez Khan Mo. 09303082117 ने कहा…

Kabar agar use kahte he janha murde ko dafnaya jata he to mujhe bataye ki kyaa us kabar me hi ajab hota he kyaa...?

Parvez Khan Mo. 09303082117 ने कहा…

Hamare Nabi par jadu chala ki nahi....?

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@ भाई परवेज़ ! क़ब्र से मुराद आलमे क़ब्र है इसी का एक नाम आलमे बरज़ख़ भी है। रोज़े क़ियामत तक मृतकों की रूहें यहीं रहती हैं और अपने अपने आमाल के मुताबिक़ राहत और मुसीबत महसूस करती हैं।
पूरी तफ़सील जानना चाहें तो बाज़ार से मौलाना आशिक़ इलाही बुलंदशहरी साहब की किताब ‘मरने के बाद क्या होगा ?‘ लेकर पढ़ लीजिए। इसे पढ़कर कई सौ ग़ैर-मुस्लिम भाई अपने शिर्क से तौबा करके नेकी के रास्ते पर आ चुके हैं।
आप भी पढ़ें, फ़ायदा होगा।

Parvez Khan ने कहा…

Dr. Anwer Jamal Sahb badi mehrbani aapki mujhe ye kitab asani se kis jagah se mil sakti he ....?

usama Khan ने कहा…

agr nahi pdha tho padhiye bohot haseen kitaab hain allah ke fazl se saari sacchaiyi hai ismai jo bakhuda honi hai qayamat se pehle kafir bhi kehnge ki kaash hum mitti hote tho ghair momin bhaiyoo pdho na smhj aaye tho hmse puhcho inshallah taala jo preshani ya sawaal hai kro naik bno or shirk se bacho

jaisingh ने कहा…

मैं मोहम्मद साहब के बारे में जानना चाहता हूं और जैसा कि आपने बताया की पाक कुरान यह बहुत से तर्जुमे है मुझे बताइए कि मैं कौनसे तर्जुमे की कुरान पढ़ सकता हूं

Umar Kairanvi ने कहा…

jaisingh - हिंदी में quranhindi.com वाला तर्जुमा अधिक पढा जाता है आप वो पढ सकते हैं, मुहम्‍मद साहब के बारे जानकारी बढाने के लिए इस ब्‍लाग पर भी झांकिएगा
islaminhindi.blogspot.in

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