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आओ उस बात की तरफ़ जो हममे और तुममे एक जैसी है और वो ये कि हम सिर्फ़ एक रब की इबादत करें- क़ुरआन
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८३ वर्ष ४ महिना से उत्तम रात

Written By safat alam taimi on शनिवार, 12 सितंबर 2009 | शनिवार, सितंबर 12, 2009

अभी हम रमज़ान के अन्तिम दशक से गुज़र रहे हैं। रमज़ान के अन्तिम दशक को नरक से मुक्ति का दशक कहा गया है। इस लिए इन दिनों में ज्यादा से ज्यादा उपासनाओं और प्रार्थनाओं में व्यस्त रहना चाहिए। अल्लाह वाले इन दिनों की प्रतीक्षा बड़ी तड़प से करते थे। स्वयं अल्लाह के रसूल सल्ल0 इन दिनों जैसा कि उनकी पत्नी आइशा रजि0 बयान करती हैं "जब रमज़ान का अन्तिम दशक आरम्भ हो जाता तो नबी सल्ल0 इबादत के लिए कमर कस लेते, उन रातों को स्वयं भी रात भर जागते और अपने घर वालों को भी जगाए रखते।" (बुखारी, मुस्लिम)
अब प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों करते थे ? तो इसका उत्तर स्वयं अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने दिया हैः " इन दिनों में एक ऐसी रात आती है जो हज़ार महीनों (83 वर्ष 4महीने) से उत्तम है जो इस रात की भलाइयों से वंचित रहा वह हर प्रकार की सांसारिक एवं पारलौकिक भलाइयों से वंचित है"।
इस रात को "शबे कद्र" कहा जाता है। इस्लाम में यह रात बहुत महत्वपूर्ण है जिसकी चार विशेषतायें निम्न में बयान की जा रही हैं।
(1) शबेकद्र हजार महीनों से बिहतर है। हजार महीनों की मात्रा 83 वर्ष 4 महीने से होती है जो एक लम्बी आयु पाने वाले इनसान की मुद्दत है। यदि एक व्यक्ति 83 वर्ष चार महीना तक इबादत करता रहा और आपने केवल इस रात में इबादत की तो आपकी इबादत उस व्यक्ति की इबादत से उत्तम और बिहतर है। इसी से आप अनुमान लगा सकते हैं कि यह कितनी महान रात्री है।
(2) इसी रात में अल्लाह ने सम्पूर्ण संसार के मार्गदर्शक हेतु अन्तिम ग्रन्थ कुरआन को अवतरित किया जो किसी विशेष जाति अथवा धर्म के लिए नहीं है बल्कि सारे संसार के लोगों के लिए है। इसी लिए गैर-मुस्लिम भाइयों को भी चाहिए कि वह इस रात के महत्व को जानें क्योंकि यह महत्व उनके अल्लाह और उनके अन्तिम अवतार मुहम्मद सल्ल0 की ओर से है।
(3) इस रात की तीसरी विशेषता यह है कि इस रात में पूरे वर्ष इनसानों को जो कुछ मिलने वाला है उसका फैसला होता है।
(4) इस रात में अल्लाह की बर्कतें और रहमतें उतरती हैं इसी लिए जिब्रील और फरिश्ते इस रात ज़मीन पर अवतरित होते हैं।
एक संदेह का निवारणः
एक सज्जन ने मुझ से कहा कि जनाब जब एक रात की इबादत 83 वर्ष चार महीने की इबादत से उत्तम है तो हम एक ही रात इबादत कर लेंगे तो क्या यह सम्पूर्ण जीवन के लिए काफी नहीं, बल्कि ज्यादा ही हुई क्योंकि सब लोगों को तो 83 वर्ष इबादत करने का अवसर प्राप्त भी नहीं होता है ?
मैंने कहाः भाई जान! आपका फल्सफा तो बहुत अच्छा है पर इस्लामी नियमानुसार नहीं। हम सब अल्लाह के दास हैं और दास का काम है सेवा करना और इसी उद्देश्य के अन्तर्गत हमें इस संसार में बसाया गया है, यह संसार परीक्षा-स्थल है परिणाम-स्थल नहीं । स्वयं अल्लाह पाक ने हम पर दिन और रात में पाँच समय की नमाज़ अनिवार्य की है। इसी लिए कुरआन में कहा गया "अल्लाह की इबादत करते रहो यहां तक कि मौत आ जाए "
फिर मैंने कहा कि अब आप पुछ सकते हैं कि इतने पुन्य जो दिए गए हैं क्या इसका कोई तात्पर्य है ? तो इसका उत्तर यह है किः अल्लाह पाक ने मुहम्मद सल्ल0 की समुदाय को सब से उत्तम समुदाय बनाया है और यह समुदाय जन्नत (स्वर्ग) में भी सब से पहले प्रवेश करेगी। जबकि उनकी आयु साठ से सत्तर वर्ष तक रखी गई है "मेरी उम्मत की आयु साठ से सत्तर वर्ष के बीच है" जबकि पहले नबियों और उनकी कौमों की उमरें हज़ार हज़ार वर्ष की होती थीं स्वयं हजरत नूह अलै0 ने अपनी क़ौम को साढ़े नौ सौ वर्ष तक एकेश्वरवाद की ओर बुलाते रहे। जाहिर है कि जब उनकी इतनी लम्बी उमरें थीं तो इनमें उन्होंने अल्लाह की इबादत भी किया होगा फिर भी यह उम्मत अफ्ज़ल कैसे हो जाती और कैसे सब से पहले स्वर्ग में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त करती? इसका तरीक़ा इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं था कि इस अम्मत को नेकियों के ऐसे ही मोसम दिए जाएं जिन में वह ज्यादा से ज्यादा नेकियाँ कमा कर पहली उम्मतों पर बाज़ी ले जाएं।
इसी से आप अनुमान लगा सकते हैं कि हमारा मुहम्मद सल्ल0 की उम्मत में पैदा होना कितने गर्व की बात है। क्योंकि आप तो सम्पूर्ण संसार के मार्गदर्शक बना कर भजे गए।
यह रात कब होती है? इस रात को अल्लाह पाक ने अपनी हिकमत से छुपा दिया है परन्तु इतना अवश्य बयान कर दिया गया कि इसे अन्तिम दशक की विषम रातों (21,23,25,27,29) में खोजा जाए। तिर्मिज़ी की रिवायत के अनुसार अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने फरमायाः " रमज़ान के अन्तिम दस दिनों की विषम (ताक़) रातों में शबे-क़द्र की खोज करो"।
इन रातों में क्या पढ़ा जाए ?
अल्लाह के रसूल सल्ल0 की पत्नी हज़रत आइशा रजि0 ने एक बार आप से पूछा था कि जब हम इस रात को पाएं तो इसमें क्या प्रार्थना करें तो आपने फरमाया थाः यह दुआ किया करो " अल्लाहुम्म इन्नक अफुव्वुन तोहिब्बुल अफ़व फअफु अन्नी।" "हे अल्लाह ! तू क्षमा करने वाला है और क्षमा करने को पसंद करता है। अतः तू मेरे पापों को क्षमा कर दे"।
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