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क्या कुरआन में औरत को पीटने का हुक्म है?

Written By Zeashan Zaidi on सोमवार, 8 मार्च 2010 | सोमवार, मार्च 08, 2010


महिला दिवस ८ मार्च पर विशेष 
कुरआन 4:34: "मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि अल्लाह ने बाज़ आदमियों को बाज़ अदमियों पर फ़ज़ीलत दी है और चूंकि मर्दो ने अपना माल ख़र्च किया है पस नेक बख्त बीवियॉ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं उनके पीठ पीछे जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त की वह भी हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और (उसपर न माने तो) तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और (इससे भी न माने तो) मारो. पस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाऐं तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूढो अल्लाह तो ज़रूर सबसे बरतर बुजुर्ग है."


सुरः निसा की ये आयत पढ़कर अक्सर औरतें घबरा जाती हैं क्योंकि इसमें तो मर्दों को खुले तौर पर मारने की छूट दे दी है. गैर इस्लामी इस आयत को पढ़कर इस्लाम के औरत विरोधी होने का फतवा दे देते हैं. देखा जाए तो पूरी दुनिया में इस आयत को हथियार बनाकर इस्लाम में औरत के दोयम दर्जे की बात कही जा रही है. लेकिन क्या वास्तव में ये आयत यही मतलब बयान कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं की हमसे इस आयत का मतलब समझने में कोई भूल हो रही है?

एक मिसाल से अपनी बात की शुरुआत करते हैं. 


मान लिया एक मजदूर दिन भर अपनी मजदूरी की तलाश में जाने के बाद शाम को खाली हाथ घर लौटता है. उसकी औरत इस इन्तिज़ार में बैठी है की उसका शौहर कुछ कमाकर लाएगा तो दोनों के पेट में कुछ जाएगा. लेकिन उसे खाली हाथ देखकर उसका सब्र जवाब दे देता है. और वह शौहर को बुरा भला कहने लगती है. शौहर भी थका हुआ आया है और भूखा भी है. बीवी के ताने सुनकर उसे गुस्सा आता है और वह उसे मारने के लिए हाथ उठा देता है.

लेकिन उसी वक़्त उसे कुरआन की ये आयत याद आ जाती है और उसका उठा हुआ हाथ नीचे गिर जाता है. वह उसे समझाने लगता है और उनका गुस्सा काफी हद तक ठंडा हो जाता है. थोड़ी कसर रह जाती है, जिसकी वजह से दोनों रात को अलग अलग सोते हैं और सुकून से अपने और साथी के बारे में सोचते हैं. लिहाज़ा अगले दिन जब सोकर उठते हैं तो दोनों का गुस्सा ठंडा हो चुका होता है. बीवी ख़ुशी ख़ुशी अपने शौहर को विदा करती है और वह नए जोश के साथ काम की तलाश में निकल जाता है. दो जनाब देखा आपने, जो आयत आपको औरत विरोधी दिख रही थी उसने एक जाहिल औरत को जाहिल मर्द से पीटने से बचा लिया.

ये आयत हरगिज़ औरत विरोधी नहीं है बल्कि मनोविज्ञान (Psychology) की निहायत अच्छी मिसाल है. बहुत खूबसूरती के साथ इसमें मर्द और औरत दोनों को समझाया गया है. पहले मर्द से कहा गया की तुम चूंकि औरत से जिस्मानी तौर पर ताक़तवर होते हो इसलिए अपने पर काबू रखो. हो सकता है वह तुमसे ज्यादा फजीलत रखती हो (बाज़ को बाज़ पर फजीलत है से यही मतलब निकलता है.) इसके बाद औरत को समझाया गया चूंकि मर्द तुम्हारे लिए दिनभर मेहनत करता है कुछ कमाकर लाता है तो तुम्हारा भी फ़र्ज़ बनता है की अपनी इज्ज़त व शौहर के माल की हिफाज़त करो. इसके बाद फिर मर्द को सलाह दी गई है की अगर अपनी बीवी की किसी बात पर तुम्हें गुस्सा आ जाए तो उसे कजोर और अपने को ताक़तवर समझकर उसे पीटना न शुरू कर दो बल्कि जो कुरआन कह रहा है उसपर अमल करो, तुम्हारा गुस्सा अपने आप ठंडा हो जाएगा.


ये आयत उस वक़्त नाजिल हुई थी जब एक नव-मुसलमान ने अपनी बीवी को तमांचा मार दिया था. और उससे पहले अरब में बीवियों को पीटना आम था. आगे कोई शख्स ऐसा क़दम न उठाये इसीलिये अल्लाह ने ऐसा हुक्म फरमाया. 

अब ये सवाल उठ सकता है की अल्लाह ने सीधे सीधे बीवी की पिटाई से क्यों नहीं मना किया? तो इसका जवाब ये है की अल्लाह बेइंसाफ नहीं है की एक को तो पूरी तरह पाबन्द कर दे और दूसरे को खुली छूट दे दे. बीवी को भी तो डर रहना चाहिए की वह हद से ज्यादा सरकश न हो जाए.
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