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आओ उस बात की तरफ़ जो हममे और तुममे एक जैसी है और वो ये कि हम सिर्फ़ एक रब की इबादत करें- क़ुरआन
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क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-3)

Written By Zeashan Zaidi on सोमवार, 12 जुलाई 2010 | सोमवार, जुलाई 12, 2010

उस शख्स ने कुरआन पर अगला एतराज़ कुछ यूं किया, ‘(अश-शूरा 51) और किसी आदमी के लिये ये मुमकिन नहीं कि खुदा उससे बात करे मगर 'वही' (दिल में सीधे उतारना) के जरिये या पर्दे के पीछे से, या कोई रसूल (फ़रिश्ता भेज दे) यानि वह अपने अज्ऩ व अख्तियार से जो चाहता है पैगाम भेजता है।’ और उस ने फरमाया ‘(निसा 164) अल्लाह ने मूसा से बातें कीं।’ उसने ये भी कहा, ‘(आराफ 22) और उन दोनों के परवरदिगार ने उन को आवाज़ दी।’ और उसने ये भी फरमाया ‘(अहज़ाब 59) ऐ नबी तुम अपनी बीबियों और लड़कियों से कह दो।’ और उसने ये फरमाया, ‘(मायदा 67) ऐ रसूल जो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से नाजिल हुआ है उसे पहुंचा दो।’ तो ये सब बातें कैसे एक साथ सच हैं?

अब जवाब में इमाम हजरत अली (अ-) ने फरमाया, कि किसी बशर के लिये मुनासिब नहीं कि अल्लाह से बगैर 'वही' कलाम करे और ऐसा वाकिया होने वाला नहीं है मगर पर्दे के पीछे से या किसी फ़रिश्ते को भेजे फिर वह उसकी इजाज़त से जो चाहे वही करे। इस वास्ते अल्लाह ने अपने लिये ‘बहुत बलन्द’ फरमाया है। रसूल पर आसमानी रसूलों (फरिश्तों) के जरिये वही की जाती थी। तो फ़रिश्ते ज़मीन के रसूलों तक पहुंचते थे। और ज़मीन के रसूलों और उस के दरमियान गुफ्तगू बगैर उस कलाम के होती थी जो आसमानी रसूलों के जरिये भेजा जाता था। रसूल अल्लाह (स-अ-) ने फरमाया ऐ जिब्रील क्या तुमने अपने रब को देखा है? तो जिब्रील ने अर्ज़ किया कि बेशक मेरा रब देखा नहीं जा सकता। तब रसूल (स-अ-) ने फरमाया तुम ‘वही’ कहां से लेते हो? उन्होंने कहा इस्राफील से लेता हूं। आप ने फरमाया इस्राफील कहां से लेते हैं? जिब्रील कहने लगे कि वह उस फ़रिश्ते से लेते हैं जो रूहानीन से बुलन्द है। आप ने फरमाया कि वह फ़रिश्ता कहां से लेता है? जिब्रील ने कहा कि उस के दिल में तेजी के साथ बगैर किसी रुकावट के ऊपर से आती है तो यही ‘वही’ है। और यह अल्लाह का कलाम है और अल्लाह का कलाम एक तरह का नहीं होता। वह रसूलों से बात करता है तो वह उसी की तरफ से होता है और उस के जरिये से वह दिल में डालता है। और उसी की तरफ से रसूलों को ख्वाब दिखाता है और उसी की तरफ से ‘वही’ लिखी है जो तिलावत की जाती है और पढ़ी जाती है वही कलाम अल्लाह है।

आगे उस शख्स ने कहा कि मैं अल्लाह को कहते हुए पाता हूं, ‘(यूनुस 61) और तुम्हारे रब से न ज़मीन में न आसमान में जर्रा बराबर शय गायब रह सकती है।’ और वह फरमाता है ‘(आले इमरान 77) और अल्लाह कयामत के दिन उन की तरफ रहमत की नज़र से न देखेगा और न उन को पाक करेगा।’ 
वह किस तरह नज़र व रहमत करेगा जो उस से छुपे होंगे?

इसके जवाब में इमाम हज़रत अली (अ-स-) ने फरमाया, ‘कि हमारा रब इसी तरह का है कि जिस से कोई शय गायब व पोशीदा नहीं है और ये क्योंकर हो सकता है कि जिसने चीजों को खल्क किया उस को मालूम न हो कि उसने क्या खल्क फरमाया और वह तो सब से बड़ा पैदा करने वाला इल्म वाला है। उसके दूसरे जुमले का मतलब है वह बता रहा है कि उन को खैर में से कुछ नहीं पहुंचेगा जैसे कि कहावत है क़सम खुदा की फलां हमारी तरफ नहीं देखता। इस से वह ये मतलब लेते हैं कि उससे हमें खैर में से कुछ नहीं पहुंचता। तो इसी तरह अल्लाह का अपनी मखलूक के साथ नज़र से मतलब है। उस की मखलूक की तरफ नज़र से मुराद रहमत है।

इसके बाद उस शख्स ने कहा, ‘(मुल्क 16) क्या तुम उस की ज़ात से जो आसमानों पर है बेखौफ हो के वह तुम को जमीन में धंसा दे फिर वह जोश में आकर उलटने पलटने लगे।’ उस ने ये भी फरमाया, ‘(ताहा 5) वह रहमान है जो अर्श पर तैयार हो।’ और उसने ये भी फरमाया ‘(ईनाम 3) वही अल्लाह आसमानों और जमीन में है वह तुम्हारी खुफिया और एलानिया बातों को जानता है।’ फिर उसने कहा, ‘(हदीद 3) वही जाहिर और पोशीदा है।’ और उसने फरमाया, ‘(हदीद 4) और वह तुम्हारे साथ है जहाँ कहीं भी हो।’ और उसने कहा कि ‘(क़ाफ 16) और हम तो उसकी शह रग से भी ज्यादा करीब हैं।’ तो ये बातें एक दूसरे से कितनी अलग हैं।

जवाब में इमाम अली इब्ने अबी तालिब (अ-स-) ने फरमाया कि अल्लाह की जात बुलन्द व अलग है उससे कि जो कुछ मखलूक से सरज़द हो, उस से सरज़द हो वह तो लतीफ व खबीर है (आप जो कुछ भी मखलूक के बारे में सोचते हैं या देखते हैं, अल्लाह तआला की ज़ात उससे अलग है।) वह जलील तर है इसलिये कि उस से कोई चीज़ ऐसी जाहिर हो जो उस की मखलूक से जाहिर हो रही हो। मिसाल के तौर पर मखलूक अगर सामने है तो पोशीदा नहीं हो सकती। लेकिन अल्लाह की जात के लिये यह कायदा नहीं है। अगर अर्श की बात की जाये तो उस का इल्म अर्श पर छाया हुआ है। वह हर राज व सरगोशी का गवाह है और वह हर शय पर किफायत करने वाला है और तमाम अशिया का मुदबिर है। अल्लाह तआला की ज़ात बहुत बुलन्द है इस से कि वह अर्श पर हो।

इस तरह उस शख्स ने इमाम हज़रत अली (अ-स-) से कुरआन के मुताल्लिक अनेकों सवाल किये और उन के मुनासिब जवाब पाकर इत्मिनान जाहिर किया। यकीनन पूरे कुरआन का इल्म हर एक को नहीं हासिल है जिसकी वजह से लोग अक्सर शक में मुब्तिला हो जाते हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि कुरआन हर लिहाज से अल्लाह का कलाम है। और जिस तरह अल्लाह की बनाई दुनिया राजों से भरी हुई है लेकिन उन राजों से परदा उठाने के लिये गौरो फिक्र जरूरी है उसी तरह कुरआन के बारे में भी गौरो फिक्र तमाम शक व शुबहात को दूर कर देती है।  
   
सन्दर्भ : शेख सुद्दूक की किताब अल तौहीद
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