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प्राईमरी रंगों की खोज किसने की थी?

Written By Zeashan Zaidi on सोमवार, 19 जुलाई 2010 | सोमवार, जुलाई 19, 2010

आज से चार सौ साल पहले न्यूटन ने खोज की कि सफेद रौशनी दरअसल कई रंगों की रोशनियों का मजमुआ (Group) होती है। इसको दिखाने के लिये न्यूटन ने एक चक्र लिया जो अलग अलग रंगों के कई हिस्सों में बँटा हुआ था। जब न्यूटन ने इस चक्र को तेजी से घुमाया तो देखने वालों को सिर्फ सफेद रंग ही नज़र आया। इन्द्रधनुष के बनने के पीछे भी यही थ्योरी काम करती है। जब सूरज की सफेद किरणें हवा में मौजूद पानी की बूंदों से रिफ्लेक्ट होती हैं तो उनमें मौजूद अलग अलग रंग अलग अलग दिखाई देने लगते हैं। इसी तरह जब सफेद रंग की रौशनी किसी प्रिज्म से गुजारी जाती है तो अलग अलग रंग दिखाई देने लगते हैं। लेकिन इन बातों के बारे में न्यूटन से पहले दुनिया अनजान थी, ऐसा इतिहास कहता है।  

इसके बाद उन्नीसवीं सदी में एक और महान साइंटिस्ट हुए, नाम था जेम्स क्लार्क मैक्सवेल। मैक्सवेल ने रंगों के बारे में एक निहायत अहम खोज की। वह खोज ये थी कि किसी भी तरह का रंग तीन प्राईमरी रंगों को आपस में मिलाने से बनाया जा सकता है। ये प्राईमरी रंग होते हैं लाल, हरा और नीला। मैक्सवेल की इस खोज ने दुनिया को रंगीन फोटोग्राफी का तोहफा दिया। 

मौजूदा दौर में हर तरह की रंगीन छपाई, कलर फोटोग्राफी, रंगीन टीवी, रंगीन कंप्यूटर मानीटर इन सब के पीछे मैक्सवेल की यही खोज काम कर रही है। आफसेट प्रिंटिंग में कलर छपाई में तीन रंग (या काला मिलाकर चार रंग) की प्लेटें कागज पर एक के बाद एक गिराई जाती है जिससे कागज पर सारे रंग मिल जाते हैं। इसी तरह टेलीविजन में तीन रंगों की रोशनियाँ जब स्क्रीन पर गिरती हैं तो उनके मिक्स होने से रंगीन तस्वीरें स्क्रीन पर दिखने लगती हैं। जाहिर है यह खोज कितनी अहम है, इससे किसी को इंकार नहीं हो सकता। क्योंकि अगर यह खोज न होती तो हम आज भी ब्लैक एण्ड व्हाइट जमाने में साँस ले रहे होते।

सवाल यह पैदा होता है कि क्या वाकई मैक्सवेल के पहले इस हकीकत के बारे में कोई नहीं जानता था कि दुनिया के सारे रंग तीन रंगों के मिलने से बन सकते हैं? या न्यूटन से पहले कोई नहीं जानता था कि सफेद रंग कई रंगों का मिक्सचर होता है? 

आईए इसके लिये हम नज़र करते हैं इमाम जैनुल आबिदीन (अ-स-) के एक कौल पर। इमाम जैनुल आबिदीन (अ-स-) हज़रत इमाम हुसैन (अ-स-) के बेटे थे जो अपनी बीमारी की वजह से करबला की जंग में शहीद होने से बच गये थे। और कई सालों तक यजीद के कैदखाने में बंदी की हैसियत से जिंदगी गुजारते रहे। ये बहुत बड़े इबादतगुजार और आलिम थे। हज़ार साल पुरानी शेख सुद्दूक (र.) की लिखी किताब ‘अल-तौहीद’ में इनके कई क़ौल दर्ज हैं। 

इसी किताब में इमाम जैनुल आबिदीन (अ-स-) का एक क़ौल इस तरह दर्ज है कि ‘‘----अल्लाह ने अर्श की खिलक़त से पहले तीन चीज़ें हवा, क़लम और नूर (रौशनी) को पैदा किया। फिर अर्श को मुख्तलिफ अनवार(प्रकाशपुंजों) से खल्क किया। उस नूर में एक सब्ज़(हरा) नूर है जिससे सब्ज़ी सरसब्ज़ हुई। और एक जर्द(पीला) नूर है जिससे जर्दी सुनहरी बनी। और एक सुर्ख(लाल) नूर है जिससे सुर्खी सुर्ख हो गयी। और एक सफेद नूर है और वही तमाम अनवार का नूर है और उसी से दिन की रौशनी है।-----’’। मतलब ये हुआ कि अल्लाह ने रौशनी में तीन प्राइमरी रंगों की रोशनियों को सबसे पहले खल्क किया। ये रंग थे पीला, हरा और लाल। बाद में फिर इन्ही के जरिये और रंग बने। 

यहाँ ये एतराज हो सकता है कि मैक्सवेल के अनुसार तो प्राईमरी रंग नीला, हरा और लाल हैं। तो इसका जवाब ये है कि जरूरी नहीं कि प्राईमरी कलर यही तीन लिये जायें। आजकल प्राईमरी कलर्स की एक और स्कीम भी मौजूद है सी-एम-वाई-के- (CMYK) नाम से, जिसमें लाल-गुलाबी, हरा-नीला, पीला और काला रंग प्राईमरी कलर के रूप में लिये जाते हैं। यह स्कीम इमाम जैनुल आबिदीन (अ-स-) के कौल से काफी हद तक मिलती जुलती है। काले रंग को हम किसी भी रंग की गैरमौजूदगी के तौर पर देख सकते हैं। अगर इस स्कीम को इमाम जैनुल आबिदीन (अ-स-) के कौल के मुताबिक बदल दिया जाये तो मुमकिन है कि हमें अपनी तस्वीरों में पूरी तरह नेचुरल रंग हासिल हो जायें।

इमाम जैनुल आबिदीन (अ-स-) के कौल के दूसरे हिस्से में कहा गया है कि ‘एक सफेद नूर है और वही तमाम अनवार का नूर है।’ मतलब साफ है कि सफेद रंग में सारे रंग शामिल हैं। तो अब इस बात पर फिर से गौर करना ज़रूरी हो जाता हे कि क्या इसे सबसे पहले न्यूटन ने बताया कि सफेद रंग सारे रंगों का मजमुआ होता है? इसलिये क्योंकि ये कौल भी शेख सुद्दूक (र.) की किताब में मिल रहा है जो न्यूटन से छह सौ साल पहले के जमाने में थे। 

तो इस से साफ जाहिर है कि यह बात न्यूटन से पहले मालूम थी। और अगर यह मान लिया जाये कि आम आदमी को ये बात नहीं मालूम थी तो इमाम इमाम जैनुल आबिदीन (अ-स-) के बारे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वे खुदा के अताकरदा इल्म के जरिये ऐसी बातों को जानते थे जो दुनिया को हज़ारों साल बाद मालूम हुईं।
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