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क्या ज़मीन बिछौने की तरह है?

Written By Zeashan Zaidi on सोमवार, 21 मार्च 2011 | सोमवार, मार्च 21, 2011


इस्लाम दुश्मन जब सूरे बक़रा की आयत 22 ‘‘जिस ने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना बनाया’’ पढ़ते हैं तो उससे यह मतलब निकालते हैं कि कुरआन में ज़मीन को चपटा कहा जा रहा है। क्योंकि बिछौना या फर्श भी चपटा होता है। हालांकि थोड़ी सी अक्ल लगाने पर उनकी यह बात गलत साबित हो जाती हैं। क्योंकि बिछौने की सही डिफनीशन चपटा होना नहीं है बल्कि इंसान को आराम पहुंचाने वाला बिस्तर है। चपटा तो वह इसलिए होता है क्योंकि उसके नीचे का बेड चपटा होता है। हमारे इमामों ने चौदह सौ साल पहले इस आयत की जो तफसीर बतायी है उसमें भी यही मतलब लिया गया है कि ज़मीन अल्लाह ने कुछ इस तरह खल्क़ की है जो यहां बसने वाली मख्लूक़ात के लिए आरामदेय हो। 

शेख सुद्दूक (अ.र.) की किताब अल-तौहीद में इमाम अली इब्ने हुसैन यानि इमाम ज़ैनुलआबिदीन अलैहिस्सलाम ने इरशादे इलाही के बारे में फरमाया ‘‘जिस ने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना बनाया (सूरे बक़रा आयत 22)’’ कि अल्लाह ने जानदारों के तब्कों के मुताबिक मुनासिब तुम्हारे अजसाम के म्वाफिक बनाया। उसको शदीद गर्मी और हरारत वाला नहीं बनाया कि जो तुम को जला दे और न इन्तिहाई ठण्डक वाला बनाया कि तुमको जमा दे। और न इतनी ज़बरदस्त खुश्बू रखी जो तुम्हारी खोपड़ियों में दर्द पैदा कर दे। और न उसको शदीद फित्नों वाली बनाया कि वह तुमको हलाक़ कर दे और न इतना ज्यादा नर्म बनाया जैसे कि पानी कि वह तुमको गर्क कर दे। और न इतना सख्त बनाया कि तुम्हारे हरकत करने मकानों व इमारतों को बनाने में रुकावट हो और तुम्हारे मुर्दों की कब्र बनाने में रुकावट हो। बल्कि अल्लाह अज्ज़ोजल ने उसमें ऐसी मज़बूती व पायदारी रखी है कि जिससे तुम फायदा हासिल करते हो। और मज़बूती के साथ चिमटे रहते हो। और इसी पर तुम्हारे बदन और तुम्हारी इमारात कायम रहती हैं। इसी वजह से ज़मीन को तुम्हारे लिये फर्श (बिछौना) करार दिया है।’’

और जदीद साइंस पूरी तरह इमाम के क़ौल को साबित करती है। 

इंसान का वजूद जिन बातों पर निर्भर करता है और साथ साथ दूसरी मख्लूकात का वजूद, उन बातों की एक लम्बी चौड़ी लिस्ट है। इंसान के वजूद के लिए कार्बन, हाईड्रोजन और आक्सीज़न ज़रूरी है और बहुत कम मात्रा में लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस वगैरा चाहिए। साथ ही कुछ का मौजूद न होना भी जरूरी है। जैसे हमें मीथेन, सल्फर डाई आक्साइड या अमोनिया का वायुमण्डल नहीं चाहिए, जैसा कि सौरमंडल के दूसरे ग्रहों पर है। साथ ही ग्रह का तापमान एक निश्चित सीमा में बना रहना चाहिए वरना हमारे शरीर की जैव रासायनिक प्रक्रियाएं (Bio-Chemical Processes) नहीं चल पायेंगी।

टेम्प्रेचर मेन्टेन रखने के लिए ग्रह को एक समान एनर्जी देने वाला तारा चाहिए। ऐसा तारा जिसका जीवनकाल काफी लम्बा हो और वह बिना उतार चढ़ाव के ग्रह को नियमित रूप से ऊर्जा दे। इसके लिए ग्रह की कक्षा भी दीर्घवृत्त न होकर वृत्ताकार होनी चाहिए। ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण इतना होना चाहिए कि वह वायुमंडल को बाँध कर रख सके। लेकिन यह गुरुत्वाकर्षण इतना ज्यादा भी नहीं होना चाहिए कि चलने फिरने में हड्‌िडयां टूटने की नौबत आ जाये।

हमारी ज़मीन और सूरज इन सब शर्तों को बखूबी पूरा करते हैं इसलिए यहां हमारा और दूसरे जानदारों का वजूद है। क्या ऐसा नहीं लगता कि किसी ने अपनी कुदरत से ज़मीन को हम सब लोगों के निवास के काबिल बनाया? ऐसी ज़मीन जहां बहुत सी आसानियाँ हमें हासिल हैं। मिसाल के तौर पर बाहरी वायुमंडल में मौजूद ओजोन की परत सूरज से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों से हमारी हिफाज़त करती है। ज़मीन पर ताकतवर चुम्बकीय क्षेत्र इस पर मौजूद जानदारों को कास्मिक किरणों और सबएटामिक पार्टिकिल्स की बमबारी से बचाता है।

इसी तरंह आम नियम है कि ताप घटने के साथ साथ द्रव का घनत्व बढ़ता है और जब वह ठोस में बदलने लगता है तो उसका घनत्व द्रव रूप की अपेक्षा कम हो जाता है और भारी होकर वह द्रव की सतह में बैठ जाता है। लेकिन पानी इसका अपवाद है। ताप घटने पर इसका घनत्व पहले चार डिग्री सेण्टीग्रेड तक बढ़ता है लेकिन ताप और कम होने पर इसका घनत्व फिर घटने लगता है। यही कारण है कि बर्फ पानी से हल्की होती है। पानी के इस गुण के कारण ठण्डे स्थानों में जब पूरा तालाब बर्फ में परिवर्तित हो जाता है तो नीचे की सतह पहले की तरंह द्रव रूप में रहती है और उसमें उपस्थित मछलियां अपना जीवन यापन करती रहती हैं।

ज़मीन सूरज से एक संतुलित दूरी पर मौजूद है। अगर यह सूरज के पास होती तो ज्वारीय बलों (Tidal Forces) के कारण इसकी घूर्णन गति समाप्त हो जाती। नतीजा यह होता कि ग्रह के एक तरफ हमेशा दिन होता जबकि दूसरी तरफ रात। फलस्वरूप दोनों तरफ टेम्प्रेचर चरम सीमा पर पहुंच जाता। और आखिर में एक तरफ पानी और वायुमण्डल समाप्त हो जाते जबकि दूसरी ताफ जमकर बर्फ में परिवर्तित हो जाते। स्पष्ट था कि फिर जीवन पनपने का कोई आसार ही नहीं रह जाता।

यहां पर लगता है कि ज़मीन को जीवन क्षेत्र बनाने के लिए पूरी तरंह ‘सुविधायुक्त’ किया गया। और इसी की तरफ आयत और इमाम की हदीस इशारा कर रही है, ‘‘जिस ने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना बनाया’’
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