World's First Islamic Blog, in Hindi विश्व का प्रथम इस्लामिक ब्लॉग, हिन्दी मेंدنیا کا سبسے پہلا اسلامک بلاگ ،ہندی مے ਦੁਨਿਆ ਨੂ ਪਹਲਾ ਇਸਲਾਮਿਕ ਬਲੋਗ, ਹਿੰਦੀ ਬਾਸ਼ਾ ਵਿਚ
आओ उस बात की तरफ़ जो हममे और तुममे एक जैसी है और वो ये कि हम सिर्फ़ एक रब की इबादत करें- क़ुरआन
Home » » ईद की नमाज़ से पहले पहले फ़ित्रा अदा कर दे

ईद की नमाज़ से पहले पहले फ़ित्रा अदा कर दे

Written By DR. ANWER JAMAL on बुधवार, 31 अगस्त 2011 | बुधवार, अगस्त 31, 2011

ईद की नमाज़ से पहले फ़ित्रा देने के बारे में

ईद अरबी शब्द है, जिसका मतलब होता है ख़ुशी। सो ईद से ख़ुशी जुड़ी हुई है। ईदुल्फित्र से रोज़े और फ़ित्रे की ख़ुशी। फ़ित्रा वह रक़म है जो ईदुल्फित्र से पहले अदा की जाती है। यह रक़म ग़रीबों को दी जाती है, जिससे वह भी ईद मना सकें।
जब तक रोज़ेदार फ़ित्रा अदा नहीं करेगा, अल्लाह उसके रोज़े भी क़ुबूल नहीं करेगा। सो मुसलमान पर लाज़िम है कि ईद की नमाज़ से पहले पहले फ़ित्रा अदा कर दे वर्ना तो लौटकर ज़रूर ही अदा कर दे। यह एक निश्चित रक़म होती है जो अलग अलग साल में गेहूं की क़ीमत के मददे नज़र अलग अलग होती है। इस्लामी विद्वान हर साल हिसाब निकाल इसकी घोषणा करते हैं। यह रक़म मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम हरेक को दी जा सकती है, बस आदमी ग़रीब होना चाहिए। इसी के साथ यह भी एक ख़ास बात है कि पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने कहा है कि मेरी औलाद को ज़कात और फ़ित्रा वग़ैरह मत देना, यह मेरी औलाद पर हराम है अर्थात वर्जित है। अक्सर मुसलमान इसी माह में अपनी ज़कात भी निकालते हैं। मुसलमानों को सदक़ा देने की ताकीद भी क़ुरआन और हदीस में बहुत की गई है और कमज़ोर आय वर्ग के लोगों को ‘क़र्ज़ ए हसना‘ देने के लिए भी बहुत प्रेरणा दी गई है।
‘क़र्ज़ ए हसना‘ की शक्ल यह होती है कि क़र्ज़ देने वाला आदमी अल्लाह की रज़ा की ख़ातिर जब किसी ज़रूरतमंद को क़र्ज़ देता है तो न तो वह उस पर सूद लेता है और न ही कोई अवधि निश्चित करता है बल्कि यह सब वह क़र्ज़ लेने वाले पर छोड़ देता है कि वह जैसे चाहे और जब चाहे क़र्ज़ लौटाए और न चाहे तो न लौटाए। इन सबके बदले में अल्लाह का वादा है कि वह ईमान वालों को दुनिया में इज़्ज़त की ज़िंदगी देगा और मरने के बाद जन्नत की ज़िंदगी। हक़ीक़त यह है कि अगर दुनिया के मालदार इस तरीक़े से ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करने लगें तो दुनिया से भूख और ग़रीबी का ख़ात्मा हो जाएगा और जो जुर्म इनकी वजह से होते हैं वे भी दुनिया से ख़त्म हो जाएंगे। अमीर और ग़रीब की आपसी नफ़रत और आपसी संघर्ष भी मिट जाएगा। तब यह दुनिया भी जन्नत का ही एक बाग़ बन जाएगी। दुनिया के सामने इसका नमूना मुसलमानों को पेश करना है।
धर्म की उन शिक्षाओं को सामने लाने की ज़रूरत आज पहले से कहीं ज़्यादा है जिनका संबंध जन कल्याण से है। जो लोग यह कहते हैं कि धर्म शोषण करना सिखाता है और दुनिया को बेहतर बनाने के लिए धर्म को छोड़ना ज़रूरी है।‘ उन लोगों से हमारा यही कहना है कि भाईयो , आपने धर्म के नाम पर अधर्म के दर्शन कर लिए होंगे। एक बार इस्लाम के दर्शन तो कीजिए, बराबरी और इंसाफ़ की, आपस में भले बर्ताव के बारे में इस्लामी शिक्षाओं को जान लीजिए और फिर उससे बेहतर या उस जैसी ही शिक्षा स्वयं बनाने की कोशिश कर लीजिए और हमारा दावा है कि आप दोनों ही काम नहीं कर पाएंगे। इस्लाम की बिना सूदी अर्थ व्यवस्था अर्थ शास्त्रियों की समझ में अब आ रही है।
इसी व्यवस्था में से एक है ‘फ़ित्रा‘।
क़ुरआन कहता है कि ‘...और मोमिन के माल में याचक और वंचित का भी हक़ है।‘ यानि ऐसा करके दौलतमंद मोमिन किसी याचक और किसी वंचित पर कोई अहसान नहीं कर रहा है बल्कि वह उन्हें वही धन दे रहा है, जिस पर उनका हक़ है। यह हक़ ईश्वर अल्लाह ने निश्चित किए हैं। जो ईश्वर अल्लाह को और उसके धर्म को नहीं मानते, वे उसके निश्चित किए हुए हक़ को भी नहीं मानते और दुनिया में भूख और ग़रीबी मौजूद है तो इसका कारण यही है कि दुनिया अल्लाह के ठहराए हुए हक़ को मानने के लिए तैयार ही नहीं है और सारी समस्या की जड़ यही न मानना है और इनका हल केवल मान लेना है। जो मान लेता है , वह ईमान वाला कहलाता है। ईमान वालों को चाहिए कि जो हक़ अल्लाह ने मुक़र्रर कर दिए हैं, उन्हें पूरा करने की कोशिश करे ताकि लोग जान लें कि धर्म इंसानियत को क्या कुछ देता है ?
Share this article :
"हमारी अन्जुमन" को ज़यादा से ज़यादा लाइक करें !

Read All Articles, Monthwise

Blogroll

Interview PART 1/PART 2

Popular Posts

Followers

Blogger templates

Google+ Followers

Labels

 
Support : Creating Website | Johny Template | Mas Template
Proudly powered by Blogger
Copyright © 2011. हमारी अन्‍जुमन - All Rights Reserved
Template Design by Creating Website Published by Mas Template