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बकरा-ईद में मुसलमान करोड़ों निर्दोष जानवरों की हत्या क्यूँ करते है?

Written By Saleem Khan on सोमवार, 24 अक्तूबर 2011 | सोमवार, अक्तूबर 24, 2011


‘‘इस्लाम में मांसाहार, और इसके लिए जानवरों की हत्या का प्रावधान हिंसात्मक तथा निर्दयतापूर्ण है; इससे मुसलमानों में हिंसक प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। ईद-उल-अज़हा के अवसर पर पशु-बलि (क़ुरबानी) की सामूहिक रीति में यह निर्दयता व्यापक रूप धारण कर लेती है। क्या यह वही इस्लाम है जिसका ईश्वर ‘अति दयावान’ है? यह कैसा दयाभाव, कैसी दयाशीलता है?’’

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क़ुरबानी-हिंसा, हत्या, निर्दयता? इस विषय के कई पहलू हैं। उन सब पर दृष्टि डालने से उपरोक्त आपत्तियों के निवारण, और उलझनों के सुलझने में आसानी होगी।


● हिंसा, जीव-हत्या जीव-हत्या, अपने अनेक रूपों में एक ऐसी हक़ीक़त है जिससे मानवता का इतिहास कभी भी ख़ाली नहीं रहा। व्यर्थ व अनुचित व अन्यायपूर्ण जीव-हत्या से आमतौर पर तो लोग हमेशा बचते रहे हैं क्योंकि यह मूल-मानव प्रवृत्ति तथा स्वाभाविक दयाभाव के प्रतिवू$ल है; लेकिन जीवधारियों की हत्या भी इतिहास के हर चरण में होती रही है क्योंकि बहुआयामी जीवन में यह मानवजाति की आवश्यकता रही है। इसके कारक सकारात्मक भी रहे हैं, जैसे आहार, औषधि तथा उपभोग के सामानों की तैयारी व उपलब्धि; और नकारात्मक भी रहे हैं, जैसे हानियों और बीमारियों से बचाव। पशुओं, पक्षियों, मछलियों आदि की हत्या आहार के लिए भी की जाती रही है, औषधि-निर्माण के लिए भी, और उनके शरीर के लगभग सारे अंगों एवं तत्वों से इन्सानों के उपभोग व इस्तेमाल की वस्तुएं बनाने के लिए भी। बहुत सारे पशुओं, कीड़ों-मकोड़ों, मच्छरों, सांप-बिच्छू आदि की हत्या, तथा शरीर व स्वास्थ्स के लिए हानिकारक जीवाणुओं (बैक्टीरिया, जम्र्स, वायरस आदि) की हत्या, उनकी हानियों से बचने-बचाने के लिए की जानी, सदा से सर्वमान्य, सर्वप्रचलित रही है। वर्तमान युग में ज्ञान-विज्ञान की प्रगति के व्यापक व सार्वभौमिक वातावरण में, औषधि-विज्ञान में शोधकार्य के लिए तथा शल्य-क्रिया-शोध व प्रशिक्षण (Surgical Research and Training) के लिए अनेक पशुओं, पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों, कीटाणुओं, जीवाणुओं आदि की हत्या की जाती है। ठीक यही स्थिति वनस्पतियों की ‘हत्या’ की भी है। जानदार पौधों को काटकर अनाज, ग़ल्ला, तरकारी, फल, पू$ल आदि वस्तुएं आहार व औषधियां और अनेक उपभोग-वस्तुएं तैयार करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं; पेड़ों को काटकर (अर्थात् उनकी ‘हत्या’ करके, क्योंकि उनमें भी जान होती है) उनकी लकड़ी, पत्तों, रेशों (Fibres) जड़ों आदि से बेशुमार कारआमद चीज़ें बनाई जाती हैं। इन सारी ‘हत्याओं’ में से कोई भी हत्या ‘हिंसा’, ‘निर्दयता’, ‘क्रूरता’ की श्रेणी में आज तक शामिल नहीं की गई, उसे दयाभाव के विरुद्ध व प्रतिकूल नहीं माना गया। कुछ नगण्य अपवादों (Negligible exceptions) को छोड़कर (और अपवाद को मानव-समाज में हमेशा पाए जाते रहे हैं) सामान्य रूप से व्यक्ति, समाज, समुदाय या धार्मिक सम्प्रदाय, जाति, क़ौम, सभ्यता, संस्कृति, धर्म, ईशवादिता आदि किसी भी स्तर पर जीव-हत्या के उपरोक्त रूपों, रीतियों एवं प्रचलनों का खण्डन व विरोध नहीं किया गया। बड़ी-बड़ी धार्मिक विचारधाराओं और जातियों में इस ‘जीव-हत्या’ के हवाले से ईश्वर के ‘दयावान’ व ‘दयाशील’ होने पर प्रश्न नहीं उठाए गए, आक्षेप नहीं किए गए, आपत्ति नहीं जताई गई।

● भारतीय परम्परा में जीव-हत्या, मांसाहार और पशु-बलि विषय-वस्तु पर इस्लामी दृष्टिकोण और मुस्लिम पक्ष पर चर्चा करने से पहले उचित महसूस होता है कि स्वयं भारतीय परम्परा पर (आलोचनात्मक, नकारात्मक व दुर्भावनात्मक दृष्टि नहीं, बल्कि) एक  तथ्यात्मक (Objective) नज़र भी डाल ली जाए। मनुस्मृति को ‘भारतीय धर्मशास्त्रों में सर्वोपरि शास्त्र’ होने का श्रेय प्राप्त है। इसके मात्र एक (पांचवें) अध्याय में ही 21 श्लोकों में मांसाहार (अर्थात् जीव-हत्या) से संबंधित शिक्षाएं, नियम और आदेश उल्लिखित हैं। रणधीर प्रकाशन हरिद्वार से प्रकाशित, पण्डित ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी द्वारा अनूदित प्रति (छटा मुद्रण, 2002) में 5:17-18; 5:21-22; 5:23; 5:27-28; 5:29-30; 5:31-32; 5:35-36; 5:37-38; 5:39; 5:41-42; 5:43-44; 5:56 में ये बातें देखी जा सकती हैं। इनका सार निम्नलिखित है:

1. ब्रह्मा ने मांस को (मानव) प्राण के लिए अन्न कल्पित किया है। अन्न, फल, पशु, पक्षी आदि प्राण के ही भोजन हैं। ब्रह्मा ने ही खाद्य और खादक दोनों का निर्माण किया है। स्वयं ब्रह्मा ने यज्ञों की समृद्धि के लिए पशु बनाए हैं इसलिए यज्ञ में पशुओं का वध अहिंसा है
2. भक्ष्य (मांसाहार-योग्य) कुछ पशुओं के नाम बताए गए हैं। सनातन विधि को मानते हुए संस्कृत किया हुआ पशु-मांस ही खाना चाहिए।
3. वेद-विदित और इस चराचर जगत में नियत हिंसा को अहिंसा ही समझना चाहिए क्योंकि धर्म वेद से हो निकला है।
4. अगस्त्य मुनि के अनुपालन में ब्राह्मण यज्ञ के निमित्त यज्ञ, या मृत्यों के रक्षार्थ प्रशस्त, पशु-पक्षियों का वध किया जा सकता है। मनु जी के कथनानुसार मधुपर्व, ज्योतिष्टोमादि यज्ञ, पृतकर्म और देवकर्म में पशु हिंसा करना चाहिएश्राद्ध और मधुपर्व में विधि नियुक्त होने पर मांस न खाने वाला मनुष्य मरने के इक्कीस जन्म तक पशु होता है
5. देवतादि के उद्देश्य बिना वृथा पशुओं को मारने वाला मनुष्य उन पशुओं के बालों की संख्या के बराबर जन्म-जन्म मारा जाता है।इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि :
(i) आहार के लिए मांस खाया जा सकता है।
(ii) यज्ञ के लिए, श्राद्ध के लिए, और देवकर्म में, पशु हिंसा करनी चाहिए, यह वास्तव में अहिंसा है।
(iii) पशुओं को व्यर्थ मारना पाप है।
(iv) पशु-पक्षी और वनस्पतियां मनुष्य के आहार के लिए ही निर्मित की गई हैं। यही कारण है कि (बौद्ध-कालीन अहिंसा-आन्दोलन के समय, और उसके पहले) वैदिक सनातन धर्म में मांसाहार और यज्ञों के लिए पशु-वध का प्रचलन था। धर्म इसका विरोधी नहीं, बल्कि समर्थक व आह्वाहक था।

● इस्लाम का पक्ष मनुस्मृति, वेद, सनातन धर्म और वैदिक काल के उपर्लिखित हवाले, मांसाहार, जीव-हत्या और क़ुरबानी (पशु-बलि) के इस्लामी पक्ष के पुष्टीकरण में दलील के तौर पर प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। इस्लाम एक प्राकृतिक व शाश्वत धर्म के रूप में, अपने आप में संपूर्ण, तर्कपूर्ण, विश्वसनीय (Authentic) है। उपरोक्त बातें विषय-वस्तु को समझने में उन लोगों की आसानी के लिए लिखी गई हैं जो मालूम नहीं क्यों हर स्तर पर, हर क़िस्म के मांसाहार व जीव-हत्या तथा हिंसा को तो अनदेखा (Neglect) कर देते हैं, बल्कि उनमें से अधिकतर लोग तो स्वयं (बहुत शौक़ से) मांस-मछली, अंडे आदि खाते भी हैं, लेकिन इस्लाम और मुसलमानों के हवाले से इन्हीं बातों पर क्षुब्ध, चिन्तित और आक्रोषित हो जाते हैं।इस्लाम का दृष्टिकोण इस विषय में संक्षिप्त रूप से यूं है :
● भूमण्डल, वायुमण्डल, सौर्यमण्डल की हर वस्तु (जीव-अजीव, चर-अचर) मनुष्यों की सेवा/आहार/उपभोग/स्वास्थ्य/जीवन के लिए निर्मित की गई है।
● किसी भी जीवधारी की व्यर्थ व अनुद्देश्य हत्या अबाध्य (Prohibitted) है, और सोद्देश्य (Purposeful) हत्या बाध्य (Permissible)।

● मुस्लिम पक्ष क़ुरबानी, ईशमार्ग में यथा-अवसर आवश्यकता पड़ने पर अपना सब कुछ क़ुरबान (Sacrifice) कर देने की भावना का व्यावहारिक प्रतीक (Symbol) है। इसकी शुरुआत लगभग 4000 वर्ष पूर्व हुई थी जब ईशदूत पैग़म्बर इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से अल्लाह ने उनकी ईशपरायणता की परीक्षा लेने के लिए आदेश दिया था कि अपनी प्रियतम चीज़—बुढ़ापे की सन्तान, पुत्र इस्माईल—की बलि दो। इब्राहीम (अलैहि॰) बेटे की गर्दन पर छुरी पे$रने को थे कि ईशवाणी हुई कि, बस तुम परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए। बेटे की बलि अभीष्ट न थी, अतः (बेटे की बलि के प्रतिदान-स्वरूप) एक दुम्बे (भेड़) की बलि दे दो, यही काफ़ी है (सारांश क़ुरआन, 37:101-107)। तब से आज तक उसी तिथि (10 ज़िलहिज्जा) को, पशु-बलि (कु़रबानी) देकर मुस्लिम समाज के (क़ुरबानी के लिए समर्थ) सारे व्यक्ति, प्रतीकात्मक रूप से ईश्वर से अपने संबंध, वफ़ादारी और संकल्प को हर वर्ष ताज़ा करते हैं कि ‘‘हे ईश्वर! तेरा आदेश होगा, आवश्यकता होगी, तक़ाज़ा होगा तो हम तेरे लिए अपनी हर चीज़ क़ुरबान करने के लिए तैयार व तत्पर हैं।’’ और यही ईशपरायणता का चरम-बिन्दु है।

● मुसलमानों की ‘हिंसक प्रवृत्ति’ (?) जहां तक मांसाहार और पशु-हत्या की वजह से मुसलमानों में हिंसक प्रवृत्ति उत्पन्न होने की बात है तो पिछले आठ नौ दशकों से अब तक का इतिहास इस बात का स्पष्ट व अकाट्य खण्डन करता है। विश्व में मुस्लिम जनसंख्या लगभग 20-25 प्रतिशत, और भारत में (पिछले 60-62 वर्षों के दौरान) लगभग 15 प्रतिशत रही है। इस समयकाल में दो महायुद्धों और अनेक छोटे-छोटे युद्धों में हुई हिंसा में मुसलमानों का शेयर 0 प्रतिशत रहा है। तीन अन्य बड़े युद्धों में अधिक से अधिक 2-5 प्रतिशत; और भारत के हज़ारों दंगों में लगभग 2 प्रतिशत, कई नरसंहारों (Mass Kilkings) में 0 प्रतिशत। हमारे देश में पूरब से दक्षिण तक, तथा अति दक्षिण में हिन्द महासागर में स्थित एक छोटे से देश में, लंबे समय से कुछ सुसंगठित, सशस्त्र गुटों और सुनियोजित भूमिगत संगठनों द्वारा चलाई जा रही हिंसा की चक्की में लाखों निर्दोष लोग और आबादियों की आबादियां पिस्ती, मरती रही हैं। इनमें कोई भी मुस्लिम गुट या संगठन नहीं है। राष्ट्र पिता और दो प्रधानमंत्रियों के हत्यारे, मुसलमान नहीं थे।

● हिंसा में दरिन्दों, राक्षसों से भी आगे...कौन? हिंसक प्रवृत्ति में जो लोग दरिन्दों, शैतानों और राक्षसों को भी बहुत पीछे छोड़ गए, हज़ारों इन्सानों को (यहां तक कि मासूम बच्चों को भी) ज़िन्दा, (लकड़ी की तरह) जलाकर उनके शरीर कोयले में बदल दिए और इस पर ख़ूब आनन्दित व मग्न विभोर हुए; गर्भवती स्त्रियों के पेट चीर कर बच्चों को निकाला, स्त्री को जलाया, और बच्चे को भाले में गोध कर ऊपर टांगा और ताण्डव नृत्य किया वे मुसलमान नहीं थे (मुसलमान, मांसाहारी होने के बावजूद इन्सानों का मांस नहीं ‘खाते’)



अगर औरतों के साथ ऐसे अत्याचार व अपमान को भी हिंसा के दायरे में लाया जाए जिसकी मिसाल मानवजाति के पूरे विश्व इतिहास में नहीं मिलती तो यह बड़ी अद्भुत, विचित्र अहिंसा है कि (पशु-पक्षियों के प्रति ग़म का तो प्रचार-प्रसार किया जाए, मगरमछ के टस्वे बहाए जाएं, और दूसरी तरफ़) इन्सानों के घरों से औरतों को खींचकर निकाला जाए, बरसरे आम उनसे बलात् कर्म किया जाए, वस्त्रहीन करके सड़कों पर उनका नग्न परेड कराया जाए, घसीटा जाए, उनके परिजनों और जनता के सामने उनका शील लूटा जाए। नंगे परेड की फिल्म बनाई जाए, और गर्व किया जाए! ऐसी मिसालें ‘हिंसक प्रवृत्ति’ वाले मुसलमानों ने कभी भी क़ायम नहीं की हैं। उनकी इन्सानियत व शराफ़त और उनका विवेक और धर्म उन्हें कभी ऐसा करने ही नहीं देगा। ऐसी ‘गर्वपूर्ण’ मिसालें तो उन पर हिंसा का आरोप लगाने वाले कुछ विशेष ‘अहिंसावादियों’ और ‘देशभक्तों’ ने ही हमारे देश की धरती पर बारम्बार क़ायम की हैं।
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5 comments:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice post.

जिन जानवरों को काटा ही नहीं जाता, वे कितना कष्ट भोगते हैं, इसे उन बूढ़े आवारा मवेशियों को देखकर जाना जा सकता है जो कि सड़कों पर घूमते ही रहते हैं। जब तक वे दूध दे सकते थे, उनके अहिंसावादी और शाकाहारी स्वामी उनके मालिक बने रहे। वे बेचारे जगह जगह से मांग कर खाते रहे और दूध के टाइम पर आकर दूध मालिक को देते रहे और जब वे दूध देने के लायक़ न बचे तो उन पर से उनके रखवाले ने अपना मालिकाना हक़ ही उठा लिया। अब वे बेचारे बुढ़ापे में जहां तहां डंडे और पॉलिथीन खाते हुए घूमते रहते हैं। यह भी तो घोर कष्ट ही है और इन जानवरों को यह कष्ट उन लोगों के कारण होता है जो कि क़ुरबानी नहीं करते बल्कि क़ुरबानी का विरोध करते हैं।
क़ुरबानी का विरोध करने वाले अपने मवेशियों को कितना दारूण कष्ट पहुंचाते हैं,इसके विरूद्ध किसी की आवाज़ क्यों नहीं उठती ?

मवेशियों का मांस भी इंसान का ठीक उसी प्रकार भोजन है जिस प्रकार उनका दूध, शहद या फल-सब्ज़ियां। धर्म तो इस बात को पहले से ही कहता आ रहा है और अब विज्ञान भी यही कह रहा है। जहां धर्म और विज्ञान सहमत हैं, वहां भी ऐतराज़ क्यों ?
ईश्वर सृष्टि का रचयिता भी है और विधाता भी। उसी ने सब जीवों की रचना की है और उनके स्वभाव की रचना भी उसी परमेश्वर ने की है।

‘जीव जीवस्य भोजनम्‘ अर्थात जीव का आहार जीव ही है, इस विधान की रचना भी उसी परमेश्वर ने की है और अपनी वाणी में भी उसने यह साफ़ साफ़ बताया है। उसकी जिन वाणियों में क्षेपक हो गया है, उनमें भी यह व्यवस्था आज तक मौजूद मिलती है।
ईश्वर ने जिन मवेशियों को खाने की इजाज़त दी है, उनकी क़ुरबानी देने के लिए हलाल करना या अपने भोजन के लिए उन्हें ज़िब्ह करना जीव हत्या नहीं कहलाता क्योंकि ऐसा ईश्वर की अनुमति से किया जाता है और इसी बात की याददिहानी के लिए उन्हें हलाल करते समय ईश्वर अल्लाह की महानता का ज़िक्र किया जाता है। ईश्वर का आदेश और उसका नाम आने के बाद यह काम हत्या नहीं बल्कि इबादत बन जाता है।
हक़ीक़त से नावाक़िफ़ लोगों को यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि महज़ ईश्वर का आदेश और उसका नाम लेना किसी जानवर की जान लेने को हत्या के बजाय इबादत कैसे बना सकता है ?
इसे समझने के लिए आप औरत और मर्द के यौन संबंधों को देख सकते हैं।
जो लोग ईश्वरीय व्यवस्था होने का दावा करते हैं। उनके पास विवाह और निकाह की व्यवस्था भी ज़रूर मिलेगी। विवाह और निकाह वह तरीक़ा है जो कि ईश्वर का आदेश है और जब औरत और मर्द लोगों के सामने एक दूसरे को ग्रहण करते हैं तो वे ईश्वर को साक्षी मानकर, उसके नाम पर और उसके आदेश को पूरा करने के लिए ही ऐसा करते हैं। ईश्वर का नाम औरत मर्द के यौन संबंधों को पवित्रता प्रदान करता है। पवित्रता और महानता ही नहीं बल्कि इसे ईश्वर प्राप्ति का साधन भी बना देता है। हिंदू दर्शन में भी चारों आश्रमों में गृहस्थ आश्रम को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है।
जहां औरत और मर्द के यौन संबंध तो पति पत्नी की तरह ही हों लेकिन ये संबंध ईश्वर के नाम पर न बने हों तो यही संबंध व्याभिचार और पाप कहलाते हैं। ईश्वर का नाम हटते ही संबंधों की पवित्रता भी ख़त्म हो जाती है और उनका नाम भी बदल जाता है।
यह बात ऐतराज़ करने वालों के सामने रहती तो वे ईश्वर के नाम पर क़ुरबान किए जाने वाले जानवरों के ज़िब्ह को जीव हत्या का नाम न देते।

shakeel Qureshi Mandsaur ने कहा…

Bhut khub

Ajay Dohray ने कहा…

toh allah ne suyar ka meet bhi khane ke liye kaha hoga ....kio ki meet toh meet hi hain, aur old age main suyar ko bhi dikkat na ho isliye uska bhi meet khana chahiye , allah bahut dayawan hain

Ajay Dohray ने कहा…

toh allah ne suyar ka meet bhi khane ke liye kaha hoga ....kio ki meet toh meet hi hain, aur old age main suyar ko bhi dikkat na ho isliye uska bhi meet khana chahiye , allah bahut dayawan hain

Anand Baisoya ने कहा…

हिंदू शब्द भारतीय विद्दवानो के

अनुसार कम से कम ४००० वर्ष पुराना है. शब्द कल्पद्रुम : जो कि लगभग दूसरी

शताब्दी में रचित है, में मन्त्र है.............

"हीनं दुष्यति इतिहिंदू जाती विशेष:" (अर्थात हीन कर्म का त्याग करने वाले को हिंदू कहते है.)

इसी प्रकार अदभुत कोष में मन्त्र आता है ......

"हिंदू:

हिन्दुश्च प्रसिद्धौ दुशतानाम च विघर्षने". (अर्थात हिंदू और हिंदु दोनों

शब्द दुष्टों को नष्ट करने वाले अर्थ में प्रसिद्द है.)

वृद्ध स्म्रति (छठी शताब्दी)में मन्त्र है,...........................

"हिंसया दूयते यश्च सदाचरण तत्पर:

वेद्.........हिंदु मुख शब्द भाक्। "

अर्थात जो सदाचारी वैदिक मार्ग पर चलने वाला, हिंसा से दुख मानने वाला है, वह हिंदु है।

ब्रहस्पति आगम (समय ज्ञात नही) में श्लोक है,................................

"हिमालय समारभ्य यवाद इंदु सरोवं, तं देव निर्वितं देशम हिंदुस्थानम प्रच्क्षेत."

(अर्थात हिमालय पर्वत से लेकर इंदु(हिंद) महासागर तक देव पुरुषों द्बारा निर्मित इस छेत्र को हिन्दुस्थान कहते है.)

पारसी

समाज के एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ में लिखा है कि, "अक्नुम बिरह्मने

व्यास नाम आज हिंद आमद बस दाना कि काल चुना नस्त" (अर्थात व्यास नमक एक

ब्र्हामन हिंद से आया जिसके बराबर कोई अक्लमंद नही था.)

इस्लाम के

पैगेम्बर मोहम्मद साहब से भी १७०० वर्ष पुर्व लबि बिन अख्ताब बिना तुर्फा

नाम के एक कवि अरब में पैदा हुए, उन्होंने अपने एक ग्रन्थ में लिखा

है,............................

"अया मुबार्केल अरज यू शैये नोहा मिलन हिन्दे.

व अरादाक्ल्लाह मन्योंज्जेल जिकर्तुं..

(अर्थात हे हिंद कि पुन्य भूमि! तू धन्य है,क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना है.)

१० वीं शताब्दी के महाकवि वेन .....अटल नगर अजमेर,अटल हिंदव अस्थानं.

महाकवि चन्द्र बरदाई....................जब हिंदू दल जोर छुए छूती मेरे धार भ्रम.

जैसे

हजारो तथ्य चीख-चीख कर कहते है की हिंदू शब्द हजारों-हजारों वर्ष पुराना

है. इन हजारों तथ्यों के अलावा भी लाखों तथ्य इस्लाम के लूटेरों ने

तक्षशिला व नालंदा जैसे विश्व -विद्यालयों को नष्ट करके समाप्त कर दिए.

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