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वुजू में छिपा है तंदुरुस्ती का राज

Written By इस्लामिक वेबदुनिया on रविवार, 24 मार्च 2013 | रविवार, मार्च 24, 2013

नमाज से पहले बनाए जाने वाला वुजू इंसानी स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। हाल ही सालों में हुई खोजों से यह जाहिर हुआ है कि वुजू ना केवल कई बड़ी-बड़ी बीमारियों से हमारी हिफाजत करता है बल्कि स्वास्थ्य के मोर्चे पर हमें फिट और एक्टिव बनाए रखता है।

ऐ ईमान वालो! जब तुम नमाज के लिए तैयार हो तो अपने मुंह और कोहनियों तक हाथ धो लिया करो और अपने सिर पर मस्ह कर (गीला हाथ फेर) लिया करो और अपने पैरों को टखनों तक धो लिया करो। और अगर नापाक हो तो (नहाकर) पाक हो लिया करो, और अगर तुम बीमार हो या सफर में हो या तुममें से कोई शौच करके आया हो या तुमने औरतों से सोहबत (सहवास) की हो और तुमको पानी न मिल सके तो साफ मिट्टी से काम लो। उस पर हाथ मारकर अपने मुंह और हाथों पर फेर लो। अल्लाह तुमको किसी तरह की तंगी में नहीं डालना चाहता बल्कि वह चाहता है कि तुम्हें पवित्र करे और अपनी नेमत तुम पर पूरी कर दे ताकि तुम शुक्रगुजार बनो।     (कुरआन-5:6)
वुजू कुरआन के कई चमत्कारों में से एक बेहतरीन और उपयोगी नुस्खा है। जीव वैज्ञानिकों की मुश्किल से चालीस साल पहले हुई खोजों से ही हम यह जान पाए हैं कि वुजू में इंसानी सेहत के लिहाज से कितने चमत्कारिक फायदे छिपे हुए हैं।
 इंसानी सेहत के लिए मुख्य रूप  से तीन तरह के फायदे हैं जो उसकी बॉडी को धोने से जुड़े हैं। शरीर धोने के ये फायदे इनसे जुड़े हैं-
संचार प्रणाली, प्रतिरक्षा प्रणाली और  शरीर का इलेक्ट्रोस्टेटिक बेलेंस।
संचार प्रणाली- इंसानी बॉडी में संचार प्रणाली दोतरफा होती है। पहले दिल शरीर के हर हिस्से की उत्तक कोशिकाओं को खून सप्लाई करता है। फिर यह जैविक इस्तेमाल किया गया खून एकत्र करता है। अगर यह रिवर्स संचालन (दूसरा संचार) गड़बड़ा जाता है तो ब्लड प्रेशर  बढ़ जाता है और ऐसे हालात में इंसान की मौत तक हो जाती है। बेहतर सेहत और दोहरी संचार प्रणाली के लिए जरूरी है कि रक्त वाहिकाएं सही तरीके  से अपना काम अंजाम देती रहें। रक्त वाहिकाएं लचीले ट्यूब की तरह होती हैं जो दिल से दूर पतली शाखाओं के रूप में फैली रहती हैं। अगर ये पतले ट्यूब कठोर हो जाते हैं और अपना लचीलापन खो देते हैं तो दिल पर दबाव बढ़ जाता है। मेडिकल लैंग्वेज में इसे arteriosclerosis ( धमनी कठिनता) के रूप में जाना जाता है।
रक्त वाहिकाहों के लचीलापन खोने और कठोर होने के कई कारण होते हैं। उम्र बढऩे और शारीरिक  गिरावट, कुपोषण, नर्वस रिएक्शन्स आदि के चलते रक्त वाहिकाहों पर ऐसा बुरा असर पड़ता है।
रक्त वाहिकाओं का सिकुडऩा और कठोर होना एकदम से ही नहीं हो जाता बल्कि यह विकृति एक लंबा समय लेती है। ये वाहिकाएं जो दिल से दूर दिमाग, हाथ और पैरों तक फैली रहती है, इन रक्त वाहिकाओं में धीरे-धीरे यह शुरू होता है और लगातार ऐसा होने पर एक लंबे टाइम बाद इन रक्त वाहिकाओं में यह विकृति पैदा होती है।

हालांकि हमारे रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसा तरीका है जो इन रक्त वाहिकाओं को  लचीला और फिट बनाए रखने में कारगर है। इसमें अहम भूमिका अदा करता है पानी जो तापमान के मुताबिक पूरे बदन की इन रक्त वाहिकाओं के इस लचीलेपन को बेहतर और दुरुस्त बनाए रखता है। पानी तापमान के मुताबिक उत्तकों (टिश्यूज) पर दबाव बनाकर सुस्त संचालन के कारण हुए जमाव को दूर कर इन टिश्यूज को पोषकता प्रदान करता है और रक्त संचरण को फिर से पटरी पर लाता है।
उपर्युक्त तथ्यों के मद्देनजर हम देखें तो हम आसानी से समझ लेते हैं कि वुजू की हिदायत देने वाली कुरआन की ऊपर लिखी आयत कितनी चमत्कारिक है।
जैसा कि आयत में निष्कर्ष के तौर पर कहा गया है....'बल्कि वह चाहता है कि तुम्हें पवित्र करे और अपनी नेमत तुम पर पूरी कर दे।'  हमें पैदा करने वाले का हमें वुजू बनाने का यह आदेश देना हमारे हित में है। यह पूरी तरह साफ है कि रक्त का बेहतर संचरण बने रहना हमारे लिए नेमत ही है क्योंकि  बेहतर स्वास्थ्य के लिए दुरुस्त रक्त वाहिकाएं  और अच्छी संचार प्रणाली जरूरी है। यह तो वुजू के कई फायदों में से एक फायदा है।
यह एकदम साफ है कि बदन पर पानी का इस्तेमाल हमें जल्द बुढ़ापे की ओर जाने से हमारी हिफाजत करता है। इस तरह हम देखते हैं कि अगर कोई शख्स बचपन से ही नियमित वुजू कर रहा हो तो आखिर उसके मस्तिष्क में बेहतर रक्त परिसंचरण क्यों नहीं होगा?
प्रतिरक्षा प्रणाली
बॉडी में लाल रक्त कोशिकाओं के अलावा श्वेत रक्त कोशिकाओं का संचरण भी होता है। इन श्वेत कोशिकाओं के संचरण को अंजाम देने वाली वाहिकाएं लाल रक्त कोशिकाओं की वाहिकाओं की तुलना में दस गुना कम पतली होती है। कई बार हम घाव या खरोंच आने पर त्वचा की दीवार पर सफेद से रिसने वाले द्रव्य को  देखते हैं। इसे कहते है लिम्फैटिक सर्कूलेशन (लसिका का परिसंचरण) जो हमारे बदन की प्रतिरक्षा प्रणाली की मजबूत तरीके से हिफाजत करता है। जब कभी हमारे बदन पर किसी जीवाणु, बाहरी ऑब्जेक्ट या कैंसर कोशिका (जिसका कारण अभी जाना नहीं गया है) का हमला होता है तो लसिका परिसंचरण के चलते श्वेत कोशिका इन्हें नष्ट कर हमारी इनसे हिफाजत करती है। बॉडी की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होने से संक्रामक रोग या कैंसर जैसे रोग अचानक हम पर हमला बोल देते हैं।
हालाकि इन कोशिकाओं की गतिविधि पूरी तरह सामने नहीं आई है लेकिन सर्दी और गर्मी का असर इस प्रणाली पर देखा गया है यानी आम सर्दी में होने वाले संक्रामक रोग के लिए सफेद रक्त वाहिकाओं की यह कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली ही जिम्मेदार है। इस प्रतिरक्षा प्रणाली और इसकी बारीक वाहिकाओं का बेहतर संचालन होता है अगर बॉडी को धोया जाए।
आसान शब्दों में  यह कहा जा सकता है कि जिस तरीके से  पानी के इस्तेमाल से संचार प्रणाली मजबूत बनती है ठीक उसी तरह बॉडी पर पानी के इस्तेमाल से प्रतिरक्षा प्रणाली को भी मजबूती मिलती है। इस तरह हम जान सकते हैं कि कई तरह के रोगों से हमारी हिफाजत करने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली वुजू किए जाने से मजबूत होती है और इस तरह अल्लाह वुजू के मामले में अपनी आयत में जो बयान करता है, सही साबित होता है।
हालांकि कोई शख्स यह दावा कर सकता है कि लसिका का बेहतर परिसंचरण और प्रतिरक्षा प्रणाली का मजबूत होना मुख्य रूप से बॉडी धोने से जुड़ा है और यह मात्र संयोग ही है कि वुजू में भी शरीर के अंग धोए जाते है। लेकिन जिस तरह वुजू करने का तरीका बताया गया है उस तरीके  पर गौर करें तो यह दावा गलत साबित होता है और यह साफ हो जाता है कि यह फायदा वुजू से ही हासिल किया जा सकता है। आखिर वुजू में ही ये फायदे क्यों छिपे हैं, इसकी मुख्य वजह हैं-
१ लसिका प्रणाली के बेहतर संचालन या कहें मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए यह जरूरी है कि बदन का कोई भी हिस्सा पानी से अछूता नहीं रहना चाहिए और ऐसा वूजू या गुस्ल से ही संभव है।
२ लसिका प्रणाली को मजबूती देने में नाक के अंदर की कोमल हड्डी तक का हिस्सा और टोंसिल सबसे महत्वपूर्ण है और इन हिस्सों को वुजू के दौरान धोना शामिल है।
३ गर्दन के दोनों तरफ के हिस्से भी लसिका प्रणाली बेहतर संचालन में काफी मददगार हैं और वुजू में इन हिस्सों को धोना भी शामिल है।
बॉडी की दुर्जेय योद्धा मानी जाने वाली लिम्फोसाइट कोशिकाएं शरीर के दूर तक के हिस्सों से गहन जैविक प्रशिक्षण के तहत गुजरती है और दिन में कई बार बॉडी के हर हिस्से पर गश्त करती है। इसे आसान जबान में यूं समझा जा सकता है कि बॉडी की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूती देने वाली लिम्फोसाइट कोशिकाएं पूरे बदन में एक सिस्टम के तहत एक दिलेर फौजी की तरह शरीर के हर हिस्सों पर गश्त कर हमारी हिफाजत में जुटी रहती हैं। ऐसे में जीवाणु और कैंसर कोशिका से इनका मुकाबला होने पर वे इन्हें नष्ट कर हमारी हिफाजत करती है। गौर करने वाली बात यह है कि  क्या यह हमारे लिए पहले दर्जे की ईश्वरीय नेमत नहीं है? मान लीजिए एक समय में एक बार सर्कूलेटरी डिसऑर्डर (संचार विकार) हो जाता है और हमारी नियमित वुजू बनाने की आदत से हम इससे निजात पा जाते हैं तो क्या यह हमारे लिए बेशकीमती ईश्वरीय वरदान नहीं हुआ जो वह वुजू बनाने पर अपनी नियामत पूरी करने का वादा करता है। क्या यह इंसानियत पर ईश्वर का एहसान नहीं हुआ जिसका शुक्र इंसानों को अदा करना चाहिए।
स्टेटिक इलेक्ट्रिसिटी (स्थिर विद्युत)
साधारणत हमारी बॉडी की स्टेटिक इलेक्ट्रिसिटी (स्थिर विद्युत) संतुलित अवस्था में रहती है और यह संतुलित स्थिर विद्युत हमें स्वस्थ और तंदुरुस्त बनाए रखने में अहम रोल अदा करती है। शरीर में होने वाले दर्द, चिड़चिड़ापन और चेहरे पर होने वाले मुंहासे बॉडी की इसी स्थिर विद्युत का संतुलन गड़बड़ाने का ही नतीजा है। हम इस इलेक्ट्रिसिटी का एहसास कार से नीचे उतरने पर या फिर प्लास्टिक की कुर्सी से उठने के बाद कर सकते हैं। एक्यूपंक्चर और फिजियोथेरेपी के जरिए बॉडी की इस स्टेटिक इलेक्ट्रिसिटी को संतुलित किया जा सकता है लेकिन हम दिन में कई बार वुजू बनाकर स्टेटिक इलेक्ट्रिसिटी को संतुलित बनाए रख सकते हैं। कई ऐसी परेशानियां हैं जो इसके असंतुलन से पैदा होती हैं लेकिन मैं यहां सिर्फ त्वचा संबंधी देखभाल पर बात करूंगा जो आज के जमाने में एक फैशनेबल सब्जेक्ट है। स्थिर इलेक्ट्रिसिटी के असंतुलन का सबसे बुरा असर चेहरे पर झुर्रियों  के रूप में शुरू होता है और पूरे बदन की त्वचा इससे प्रभावित होती है। लेकिन वे खुशकिस्मत लोग जो अपनी जिंदगी में वुजू को अपनाए रहते हैं, अल्लाह की नेमत का फायदा उठाते हैं और इस परेशानी से बचे रहते हैं। हम कह सकते हैं कि जो कोई शख्स नियमित रूप से धोने की अपनी आदत को बरकरार रखता है तो वह अधिक सेहतमंद और खूबसूरत त्वचा का धनी होता है। गौरतलब है कि हमारे इस दौर में जब लाखों रुपए  सौदंर्य प्रसाधनों के रूप में खर्च किए जा रहे हैं, क्या ऐसे में यह साधारण तरीके से पानी से धोने की आदत हमारे लिए अच्छा विकल्प नहीं हो सकती?
किसी नास्तिक का सवाल हो सकता है कि क्या वुजू बदन की स्टेटिक इलेक्ट्रिसिटी को बेहतर बनाए रखता है? जवाब है-बेशक यह ऐसा ही करता है। कुरआन की वुजू संबंधी आयत जो हमें बताती है कि पानी ना होने के हालात में तयम्मुम (साफ मिट्टी पर हाथ मारकर शरीर के हिस्सों को पाक करना) करना चाहिए, यह भी गौर करने लायक है। वुजू का विकल्प तयम्मुम भी शरीर की स्टेटिक इलेक्ट्रिसिटी को संतुलित बनाए रखने में अहम रोल अदा करता है। दरअसल कोई भी इसे समझा नहीं पाया कि आखिर जरूरत होने पर वुजू का विकल्प तयम्मुम ही क्यों बनता है, इस तथ्य से हमारे सामने इसका खुलासा होता है कि क्यों पानी ना होने पर वुजू की जगह तयम्मुम विकल्प बनता है।
 जैसा कि कुरआन ने वुजू को हमें पाक-साफ बनाने का जरिया और ईश्वरीय नेमत करार दिया है, इस बात को हम आंशिक रूप से मेडिकल संदर्भ मे समझा सकते हैं कि वुजू हमारे स्वास्थ्य के लिए कितना फायदेमंद है और यह ईश्वर की इंसानों को दी हुई कितनी बेशकीमती नेमत है।
यहां कोई शख्स दावा कर सकता है कि उसकी भी हाथ-मुंह आदि धोने की आदत है। चलिए ठीक है, पर जरा आप गौर करें क्या अक्सर लोगों के बीच  ऐसी ही आदत है या फिर आम लोगों की यह आदत क्या बरसों बरस पुरानी है। आम लोगों के बीच की इस आदत का इतिहास मुश्किल से सत्तर साल पुराना होगा। बल्कि इस तरह साफ-स्वच्छ रहने की यह व्यापक आदत उन देशों में भी इन सालों से पहले नहीं पाई जाती थी जो आज के वक्त में सबसे ज्यादा सभ्य और विकसित देश होने का दावा करते हैं।
साफ-सुथरा रहने की अन्य आदतें वुजू का मुकाबला नहीं कर सकतीं क्योंकि इस्लाम ने वुजू करने को इबादत का एक जरूरी हिस्सा करार देकर इसे मुसलमानों की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ दिया है और यह मुसलमानों की आदतों में शुमार हो गया है।
यकीन मानिए वुजू के फायदे सिर्फ यही नहीं है जिनका मैंने जिक्र किया है बल्कि अमल करने वाले मुस्लिम की सामान्य हैल्थ में भी वुजू का योगदान होता है।
                                                                  - डॉ.एच नूरबकी
 (यह आलेख अमरीका की मशहूर  मैगजीन 'दी फाउंटेन' से लिया गया है। फाउंटेन मैगजीन के जनवरी-मार्च-1993 के अंक में यह प्रकाशित हुआ था।)

                                                चीनी चिकित्सा पद्धति और वुजू
अपने एक लेख 'मुस्लिम्स रिचुअल्स एण्ड दिअर इफेक्ट ऑन पर्सन्स हैल्थ'(मुसलमानों के रिवाज और उनके स्वास्थ्य पर इसका असर) में दागेस्तान स्टेट मेडिकल एकेडमी के मेन्स जनरल हाइजीन और इकोलोजी डिपार्टमेंट के सहायक डॉ. मेगोमेड मेगोमेडोव ने बताया कि  वुजू बॉडी की बायोलोजिकल रिद्म्स (जैविक लय) को, खास तौर पर बायोलोजिकल एक्टिव स्पॉट्स (जैविक सक्रिय बिन्दुओं) को उत्तेजित और प्रेरित करता है, जैसा कि चीनी चिकित्सा पद्धति रिफ्लेक्सो थैरेपी के जरिए बॉयोलोजिकल एक्टिव स्पॉट्स को प्रेरित किया जाता है। इंसान के आंतरिक अंग त्वचा से अपना जुड़ाव रखते हैं और त्वचा से जुड़े यह खास बिंदू एक तरह से बॉडी के अलग-अलग अंगों को नियंत्रित और रिचार्ज करने का काम करते हैं। इन बिंदुओं को बायोलोजिकल एक्टिव स्पॉट्स (जैविक सक्रिय बिंदु) कहा जाता है।
अपने इस दिलचस्प लेख में मेगोमेडोव ने वुजू और चीनी रिफ्लेक्सोलॉजी में समानता बताते हुए कहा कि जहां रिफ्लेक्सोलॉजी में डॉक्टर बनने के लिए तकरीबन 15-20 साल का पाठ्यक्रम पढऩा पड़ता है, दूसरी तरफ वुजू का सीधा-सादा तरीका  है जो बेहतरीन अंदाज में अपना असर छोड़ता है। इसके अलावा जहां रिफ्लेक्सोथैरेपी बीमारी की शुरुआती स्टेज पर ही अपना असर छोड़ती है और यह मुश्किल से ही बीमारी बढऩे पर उसकी रोकथाम कर पाती है, वहीं वुजू बीमारी की रोकथाम में कारगर साबित होता है।
डॉ. मेगोमेडोव बताते हैं कि चीनी चिकित्सा पद्धति के अनुसार हमारे शरीर में सात सौ से ज्यादा बायोलॉजिकल एक्टिव स्पॉट्स हैं और उनमें से 66 पर रिफ्लेक्स थैरेपी अपना त्वरित असर छोड़ती है। इन स्पॉट्स को शक्तिशाली या प्रभावी बिंदू माना जाता है। इन 66 में से 61 स्पॉट्स वुजू में धुलने वाले हिस्से में शामिल हैं जबकि बाकी पांच टखने और घुटनों के बीच में हैं।
चेहरा
वुजू के दौरान जब चेहरा धोया जाता है तो इससे आंतें, पेट और मूत्राशय जैसे अंग रिचार्ज होते हैं यानी इन अंगों और नर्वस सिस्टम और रिप्रोडक्टिव सिस्टम (प्रजनन प्रणाली) पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। डॉ. मेगोमेडोव ने अपने रिसर्च में पाया कि यही अंग नहीं बल्कि वुजू से बायोलोजिकल एक्टिव स्पॉट्स आंतें, तंत्रिका तंत्र, पेट, अग्राशय, पित्ताशय, थायराइड ग्रंथि, स्नायु तंत्र और दाएं पैर में स्थित अंगों पर पॉजिटिव इफेक्ट डालते है।
पैर- जब वुजू के दौरान बायां पैर धोया जाता है तो बायोलोजिकल एक्टिव स्पॉट पीटूएटरी ग्लैंड (पीयूष ग्रंथि) को उर्जस्वित बनाते हैं और उस पर अपना सकारात्मक असर छोड़ते हैं। पीयूष ग्रंथि मस्तिष्क में होती है और यह एंडोक्र ाइन ग्लैंड्स (अंत स्त्रावी ग्रंथियों) के  संचालन को नियमित बनाए रखती है और इन्हें बढऩे से रोकती है।
कान- कान के आवृत्त मे यानी कान की संरचना में कई बायोलोजिकल एक्टिव स्पॉट्स होते हैं जो बॉडी के तकरीबन सभी अंगों को अनुकूल और बेहतर बनाए रखते हैं। ये स्पॉट्स हाई ब्लड प्रेशर को कम करते हैं, गले और दांतों के दर्द में राहत पहुंचाते हैं। वुजू में कानों की सफाई करते रहने से इनमें मैल जमा नहीं होता। मैल कान में इन्फेक्शन की वजह बनता है और इससे कानों के अंदर का हिस्सा प्रभावित होता है जिसकी वजह से पूरे बदन में बेचैनी हो जाती है।
डॉ. मेगोमेडोव कहते हैं कि उनकी स्टडी से यह एकदम  क्लियर हो जाता है कि मुसलमानों द्वारा पढ़ी जाने वाली पांच वक्त की नमाज का ताल्लुक सिर्फ आध्यात्मिकता से ही नहीं है बल्कि यह नमाज पूरी तरह विशुद्ध भौतिक चिकित्सा के रूप में भी अपना प्रभाव छोड़ती है।
                                                     मुख्तार सलेम की किताब से
मुख्तार सलेम की किताब 'प्रेयर्स: ए स्पॉर्ट फोर दी बॉडी एण्ड सोल' में वुजू में धोए जाने वाले हर हिस्से से होने वाले सेहत संबंधी फायदे बताती है। इस किताब में वुजू जिन बीमारियों से हमें बचाता है, इसका जिक्र भी किया गया है।
स्किन (त्वचा)- सलेम अपनी किताब में बताते हैं कि वुजू त्वचा कैंसर से हमारी हिफाजत करता है। वे स्पष्ट करते हैं कि वुजू में हमारी बॉडी के वे हिस्से धोए जाते हैं जो आमतौर पर खुले रहते हैं और यह हिस्से विभिन्न तरह के प्रदूषण से प्रभावित होते हैं। चाहे यह प्रदूषण शरीर के आंतरिक स्राव से त्वचा पर पसीने के रूप में हो या फिर बाहरी प्रदूषण।
वुजू दिन में पांच बार इस तरह के प्रदूषण को हमारी बॉडी से दूर करता है। इस वजह से हमारे शरीर की त्वचा की बाहरी परत साफ सुथरी बनी रहती है और साफ-सुथरी बनी रहने से यह अंदर की कोशिकाओं को बेहतर तरीके से काम करने में मदद करती है। यही नहीं पानी से अंगों को धोए जाने से त्वचा की सतह के नजदीक की ब्लड सेल्स (रक्त वाहिकाओं), नसों और ग्रंथियों को मजबूती मिलती है और यह अपने काम को बेहतर अंदाज में करती हैं।
सलेम कहते हैं कि रिसर्च में यह बात पूरी तरह साबित हो चुकी है कि त्वचा कैंसर की मुख्य वजहों में से एक वजह त्वचा का रसायनों खासतौर पर पेट्रो रसायनों के संपर्क  में आना है यानी चमड़ी पर ये रसायन बुरा असर छोड़ते हैं और इन रसायनों के दुष्प्रभाव से हिफाजत का बेहतर तरीका वुजू है जिसके जरिए दिन में पांच बार अपनी त्वचा को पानी से धोकर इन रासायानिक तत्वों को लगातार हटाया जा सकता है। साफ है कि वुजू किस तरह त्वचा कैंसर से हमारी हिफाजत करता है।
मुंह- सलेम बताते हैं कि वुजू में मुंह साफ करने से हमारे मुंह में फंसे खाद्य कण साफ हो जाते हैं क्योंकि यह खाद्य कण दांत और मंसूडों में दर्द की वजह बन जाते हैं। यही वजह है कि नमाज से पहले वुजू में मिसवाक (दांत साफ करना) करने की भी हिदायत दी गई है।
नाक- जब कोई वुजू में अपनी नाक धोता है तो यह भी उसकी सेहत के लिए फायदेमंद रहता है क्योंकि ऐसा करके वह नाक के कीटाणुओं को दूर करके उन्हें अपनी श्वसन प्रणाली में जाने से बचाता है। यानी साफ-सुथरी नाक और शरीर को साफ-सुथरा सांस। अलेक्जेंडेरिया यूनिवर्सिटी की डॉक्टरों की एक टीम के द्वारा कि ए गए एक अध्ययन के मुताबिक वुजू में नाक धोते वक्त नाक की नरम हड्डी तक पानी डालकर नाक से बाहर बहाने से नाक के आंतरिक हिस्से को मजबूती मिलती है और इस पर पॉजीटिव प्रभाव पड़ता है। अध्ययन में पाया गया कि जो लोग सही तरीके से वुजू बनाते थे उनके नथुने का अंदर का हिस्सा पूरी तरह साफ था और अंदर के किसी छोटे से बाल पर भी धूल का कोई कण ना था जबकि वुजू न बनाने वालों के नाक का अंदर का हिस्सा हल्का कलर और चिकनाई लिए हुए था, साथ ही नाक के बाल भी उनके  जल्दी टूटते पाए गए।
आंखें- सलेम अपनी किताब में बताते हैं कि बार-बार चेहरा धोने से चेहरे की त्चचा की कोशिकाएं मजबूत होती हैं जिससे चेहरे पर होने वाले कील-मुंहासों से हिफाजत होती है। साथ ही आंखों की अंदर से सफाई होने से आंखों के संक्रमण से बचाव होता है। आंखों की रोशनी सही बनी रहती है।
पैर- वुजू के दौरान पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. पैर धोते वक्त उंगलियों के बीच का हिस्सा भी अच्छी तरह धोते थे। पैर धोने में उनका यह तरीका बहुत अहम है। सलेम कहते हैं कि आज के मॉडर्न वक्त में जब हमारे पैर अक्सर जूतों में बंधे रहते हैं, ऐसे में पैरों को धोना खास तौर पर उंगलियों के  बीच से धोना पैरों के लिए काफी फायदेमंद होता है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि दिन में पांच बार किया जाने वाला वुजू मांसपेशियों पर एक तरह से व्यायाम का सा असर छोड़ता है यानी यह मांसपेशियों के लिए एक तरह का व्यायाम है जिससे मांसपेशियां बेहतर तरीके से अपने काम को अंजाम देती हैं।
वुजू गुस्से को ठंडा करता है-  हमें यह भी बताया गया है कि गुस्सा आने पर वुजू बना लेना चाहिए क्योंकि पानी का प्रभाव गुस्से को दूर कर हमें तरोताजा और शांत बनाता है। जैसा कि मुसलमानों को पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने बताया कि गुस्सा शैतानी प्रेरणा है और शैतान आग से बना है और आग को पानी से ही बुझाया जाता है।
                                          कुछ और शोध वुजू के बारे में
- प्यारे पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने रात को सोने से पहले वुजू बनाकर सोने के लिए प्रोत्साहित किया। इस जमाने में देखें तो योगा एक्सपर्ट भी सोने से पहले हाथ-पैर, मुंह, आंखें आदि धोने की सलाह देते हैं ताकि बॉडी को आराम मिले और गहरी और सुकून की नींद आए।
प्रोफेसर जॉर्ज ऐल कहते हैं-
जब कोई अपना मुंह धोता है तो उसकी दाढ़ी में मौजूद कीटाणु साफ हो जाते हैं और पानी से गीली होने पर दाढ़ी के बालों की जड़ें मजबूत होती हैं। यही नहीं दाढ़ी के बाल पानी से तर होने से गर्दन की कोशिकाओं, थाइराइड ग्लैंड्स और गले संबंधी बीमारियों से हमारा बचाव होता है।
कोहनियां धोने के फायदे-
कोहनी में तीन ऐसी नसें हैं जो दिल, दिमाग और लीवर से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। देखा गया है कि कोहनियां अक्सर ढकी रहती हैं। कोहनियों को हवा नहीं लगने और उन्हें पानी से नहीं धोते रहने से कई तरह की मानसिक और मस्तिष्क संबंधी जटिलताएं पैदा हो जाती हैं। इस तरह हम देखते हैं कि वुजू में कोहनियों सहित हाथ धोने से ना केवल हमारे दिल, दिमाग और लीवर को मजबूती मिलती है बल्कि इनसे संबंधित होने वाली परेशानियों से निजात मिलती है।
एक अमरीकी वैज्ञानिक के अनुसार-
पानी तनाव दूर करने, राहत और  सुकून हासिल करने का बेहतरीन जरिया है।
                                          (रिफोर्मेशन मेगजीन नं.296, 1994)
हाथ धोना
संक्रमण को रोकने का महत्वपूर्ण और बेहतरीन उपाय है हाथों को धोना।
                                (यू एस सेन्टर ऑफ डिजीज कंट्रोल एण्ड प्रीवेन्सन)
गरारे करना-
हमारे अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण खोज यह है कि रोज सादा पानी से गरारे करके सर्दी लगने के मामलों को तीस फीसदी तक रोका जा सकता है। स्वच्छ बने रहने की यह सरल और साधारण आदत आम आदमी की सेहत और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद फायदेमंद है।
                 (कॉजूनेरीसेटोमुरा, एम.डी.,पीएच.डी., जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी में मेडिसन के प्रोफेसर)
गौरतलब है कि वुजू में कुल्ली के दौरान गरारे करना सुन्नत है।
यह भी देखा गया है कि रोज नमाज अदा करने वाले वे नमाजी जो हर वुजू में गरारे करते हैं, उनमें सिर्फ कुल्ली ही करने वाले नमाजियों की तुलना में  वायरल, बैक्टिरिया पनपने और गले और सांस संक्रमण और फ्लू आदि के मामले पचास फीसदी कम होने के चांस होते हैं।
जब गरारे किए जाते हैं तब पानी गले की परत के संपर्क में आने से पानी गले की परत से बाहरी कणों और रोगाणुओं को साफ कर देता है।
कान-वुजू बनाते वक्त कानों को अंदर और बाहर दोनों तरफ से साफ किया जाता है। अंदर की तरफ से साफ करने के लिए गीली उंगली अंदर की तरफ फिराई जाती है। कान को अंदर से साफ करने का यह तरीका कितना कारगर और बेहतर है, इसका अंदाजा अमेरिकन हेयरिंग रिसर्च  फाउंडेशन की इस बात से हो जाता है-
कॉटन लगी स्टिक से कानों की अंदर से सफाई करने की आदत से कान का पर्दा फटने का खतरा रहता है। देखा गया है कि ज्यादातर लोग इसी तरीके से अपने कानों की सफाई करते हैं। हमारा मानना है कि कॉटन स्टिक, हेयर पिन आदि चीजों के इस्तेमाल के बजाय कान साफ करने का सबसे बेहतर तरीका है गीली उंगलियों को कान के अंदर फिरा लेना।
गर्दन और सिर-वुजू के दौरान गर्दन और सिर का मसा किया जाता है यानी दोनों हाथों को गीला करके सिर के ऊपर और गर्दन के दाएं-बाएं और पीछे की तरफ से फैरा जाता है। ऐसा करने से ना केवल गर्दन से धूल आदि दूर होती है बल्कि तनाव दूर भी दूर होता है और इंसान राहत महसूस करता है। कई स्ट्रेस थेरेपिस्ट तनाव दूर करने के लिए इसी नुस्खे को बताते हैं। इसी प्रकार गीले हाथ सिर पर फेरने से ना केवल तनाव दूर होता है बल्कि गंजेपन में भी फायदा होता है।
पैर- आजकल हर वक्त जूते और मौजे पहने रहने से पैरों में इन्फैक्शन आदि होने का डर रहता है। वुजू में दिन में पांच बार अच्छी तरह पैर धोए जाते हैं। हाथों की उंगलियों से पैरों की उंगलियों का बीच का हिस्सा भी अच्छी तरह धोया जाता है। इससे ना केवल पैरों पर गांठें आदि नहीं होती बल्कि बॉडी का रक्त प्रवाह भी इससे बढ़ता है। इस तरह पैर धोने से शुगर के मरीजों को भी रोग में राहत मिलती है।
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