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क्या बायोलॉजिकल सेल (कोशिका) की खोज राबर्ट हुक ने की थी?

Written By Zeashan Zaidi on सोमवार, 13 सितंबर 2010 | सोमवार, सितंबर 13, 2010

सेल या कोशिका को जिंदगी की यूनिट कहते हैं। इंसान हो या जानवर, पेड़ हो या छोटा सा पौधा, हर एक का जिस्म निहायत छोटी छोटी संरचनाओं से मिलकर बना होता है जिन्हें सेल कहते हैं। ये जिस्म के बिल्डिंग ब्लाक्स होते हैं। यानि जिस तरह कोई बिल्डिंग ईंटों को जोड़कर बनायी जाती है उसी तरह प्राणियों के जिस्म बहुत सारे सेल्स के जुड़ने से बनते हैं। ये सेल्स निहायत महीन होते हैं। इतने कि नंगी आँखों से इन्हें देखना नामुमकिन है। इंसानी जिस्म में तीन सौ ट्रिलियन बायोसेल पाये जाते हैं। 

जिस्म में कई तरह के सेल पाये जाते हैं जो अलग अलग कामों को अंजाम देते हैं। जैसे कि इंसानी जिस्म में कुछ सेल फेफड़ों को बनाते हैं तो कुछ दिल को। न्यूरॉन नामी सेल हाथ, पैरों, आँखों वगैरा से आने वाले मैसेज दिमाग तक पहुंचाते हैं वहीं खून के लाल सेल (आरबीसी) आक्सीजन को लाने ले जाने का काम करते हैं।  

हर सेल अपने में एक कम्प्लीट मशीन होता है जो किसी खास काम को करने के बनी होती है। इस मशीन में माइटोकाण्ड्रिया नामक पावर प्लांट होता है जिससे सेल को एनर्जी मिलती है, एक न्यूक्लियस नामक कण्ट्रोल रूम होता है। पूरा सेल झिल्लीनुमा पैकेट में बन्द रहता है। गॉल्गी बॉडीज़ प्रोटीन्स को स्टोर करती हैं, वेसिकल्स चीज़ों को एक जगह से दूसरी जगह चीज़ों को ट्रांस्पोर्ट करते हैं। पौधों के सेल में फोटोसिंथेसिस का सिस्टम भी मौजूद होता है। इस तरह सेल एक ऐसी परफेक्ट मशीन होता है जिसमें हर वह पुर्जा मौजूद होता है जिसकी उसे ज़रूरत है।   

सेल के बारे में सदियों तक इंसान कुछ नहीं जानता था। सत्रहवीं सदी में जब माइक्रोस्कोप का आविष्कार हुआ और उससे इंग्लिश साइंसदां राबर्ट हुक ने जीवों को बड़ा करके देखा तो पहली बार उसने जिंदगी की यूनिट यानि सेल का दीदार किया। इस तरह बायोसेल की खोज के सेहरा राबर्ट हुक के सर है।

सवाल पैदा होता है कि क्या राबर्ट हुक से पहले कोई बायोसेल के बारे में जानता था? पुरानी किताबों को खंगालने पर इसका जवाब सकारात्मक मिलता है।    

नहजुल बलागा तेरह सौ साल पुरानी किताब है। यह एक संग्रह है इमाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम के खुत्बों (उपदेशों) का। इसी में शामिल है खुत्बा नम्बर 81 जिसे खुत्बये ग़र्रा भी कहते हैं। इसे इमाम हज़रत अली (अ.स.) का एक अजीबोगरीब खुत्बा कहा जाता है क्योंकि इसमें शामिल बहुत सी बातों को आज भी इंसानी अक्ल समझ नहीं पायी है। और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के जमाने में तो इसे कोई भी समझ नहीं पाया था। लोगों ने इसे जस का तस लिख लिया था। लेकिन आज जब साइंस ने काफी तरक्की कर ली है तो हम इसकी कुछ बातों को समझ सकते हैं। इनमें शामिल है बायोसेल का कांसेप्ट। खुत्बये गर्रा का एक हिस्सा कुछ इस तरह है :

‘‘----उसने तुम्हारे लिये कान बनाये ताकि ज़रूरी और अहम चीज़ों को सुनकर महफूज़ रखें और उसने तुम्हें आँखें दी हैं ताकि वह कोरी व बे बसरी से निकल कर रोशन व ज़ियाबार हों और जिस्म के मुखतलिफ हिस्से जिनमें से हर एक में बहुत से अआज़ा हैं जिनके पेचो ख़म उनकी मुनासिबत से हैं अपनी सूरतों की तरकीब और उम्र की मुद्दतों के तनासुब के साथ साथ ऐसे बदनों के साथ जो अपनी जरूरियात को पूरा कर रहे हैं और ऐसे दिलों के साथ हैं जो अपनी गिजाए रूहानी की तलाश में लगे रहते हैं।-----’’

यहां हज़रत अली (अ.स.) कह रहे हैं कि जिस्म के मुख्तलिफ हिस्सों में बहुत से अआज़ा हैं। जिनमें से हर एक की अपनी एक उम्र है और हर एक का अपना दिल है जो गिज़ाए रूहानी हासिल करते हैं दूसरे अलफाज़ में हर एक के दिल अल्लाह के हुक्म से कण्ट्रोल होते हैं। 

जब लोगों ने इस खुत्बे को सुना तो यही समझा कि हज़रत अली (अ.) का ‘अआज़ा’ से मतलब है जिस्म के अंग यानि हाथ, पैर, आँख, कान वगैरा। लेकिन अगर ये मतलब लिया जाये तो यहाँ पर अआज़ा की जो खासियतें बतायी गयी हैं वह पूरी नहीं होतीं। जैसे कि ‘जिस्म के मुख्तलिफ हिस्सों में बहुत सारे ‘अआज़ा’ हैं। अगर हम हाथ पैरों वगैरा की बात करें तो ये ‘बहुत सारे’ नहीं होते। जिस्म के एक हिस्से में एक या दो से ज्यादा अंग नहीं होते। 

दूसरी बात ‘अआज़ा’ के बारे में कही जा रही है वह ये कि ‘उम्र की मुद्दतों के तनासुब के साथ और अपने अपने बदनों के साथ’ मौजूद हैं। यानि हर ‘अआज़ा’ की अपनी एक उम्र है और अपना एक जिस्म है। अगर ‘अआज़ा’ से मतलब हाथ पैर वगैरा लिया जाये तो इनकी अलग से कोई उम्र नहीं होती बल्कि जो इंसान की उम्र होती है वही इन सब की होती है। और न ही इनका मुकम्मल जिस्म होता है क्योंकि हाथ पैर नाक कान सभी का एक हिस्सा इंसानी दिमाग में होता है और बाकी हिस्से भी जिस्म के दूसरे हिस्सों से जुड़े रहते हैं और हम ये नहीं कह सकते कि हाथ या पैर अपने में मुकम्मल जिस्म है। 

तीसरी बात ‘अआज़ा’ के बारे में हज़रत अली (अ.) ने कही कि ‘ये ऐसे दिलों के साथ हैं जो अपनी गिजाए रूहानी की तलाश में लगे रहते हैं।’ अब हम जानते हैं कि जिस्म के किसी अंग में कोई दिल नहीं होता, चाहे वह हाथ, पैर हों या आँख, कान, नाक वगैरा।

इस तरह साफ ज़ाहिर है कि खुत्बे में हज़रत अली (अ.) का ‘अआज़ा’ से मतलब हाथ, पैर, आँख, कान वगैरा हरगिज नहीं था। बल्कि कुछ और ही मतलब था। 

अगर ‘अआज़ा’ से मतलब बायोसेल (कोशिका) लिया जाये तो हज़रत अली (अ.) की बताई हुई सारी बातें उसपर पूरी उतरती हैं। इसलिये क्योंकि ये जिस्म में अरबों की तादाद में होते हैं। जैसा कि खुत्बे में ‘जिस्म के मुख्तलिफ हिस्सों में बहुत सारे’ कहा गया है। हर बायोसेल का अपना एक मुकम्मल जिस्म होता है और किसी परफेक्ट मशीन की तरह ये अपना काम करता रहता है। साथ ही हर बायोसेल की अपनी एक उम्र होती है जो दूसरे से अलग होती है। कुछ बायोसेल जैसे कि रेड ब्लड सेल्स की उम्र लगभग दो महीने होती है तो न्यूरान्स जैसे कुछ सेल्स की उम्र आदमी की उम्र के बराबर होती है। इस तरह हज़रत अली (अ.स.) का ‘अआज़ा’ के बारे में कहा गया जुमला ‘इनकी अपनी एक उम्र है और अपना एक जिस्म है।’ बायोसेल पर पूरी तरह खरा उतरता है।

हर बायोसेल का एक मरकज़ या न्यूक्लियस होता है जो उस सेल को कण्ट्रोल करता है। इसके अन्दर मौजद डी.एन.ए. में उपलब्ध् प्रोग्रामिंग के अनुसार सेल अपना काम करता रहता है। तो अआज़ा के बारे में कहा गया हज़रत अली (अ.स.) का जुमला ‘ये ऐसे दिलों के साथ हैं जो अपनी गिजाए रूहानी की तलाश में लगे रहते हैं।’ इसके न्यूक्लियस के लिये फिट हो रहा है क्योंकि हर सेल की ‘रूह’ या ‘आत्मा’ इसके न्यूक्लियस में होती है। यहीं पर डी.एन.ए. कोडिंग की शक्ल में इन्हें अल्लाह का हुक्म यानी गिजाए रूहानी मिलती है सेल को अपना काम करने के लिए. 

तो इस तरह से साफ हो जाता है कि खुत्बे में हज़रत अली (अ.स.) का ‘अआज़ा’ से मतलब ‘बायोसेल’ यानि ‘कोशिका’ ही था। लेकिन उस ज़माने की साइंस इतनी डेवलप नहीं थी कि उनकी बात समझ पाती इसलिये एक अर्से तक लोग इस खुतबे को समझने में असमर्थ रहे। लेकिन आज हम देखकर हैरतज़दा हैं कि चौदह सौ साल पहले के हमारे इमामों का इल्म किन बुलंदियों पर था।
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