World's First Islamic Blog, in Hindi विश्व का प्रथम इस्लामिक ब्लॉग, हिन्दी मेंدنیا کا سبسے پہلا اسلامک بلاگ ،ہندی مے ਦੁਨਿਆ ਨੂ ਪਹਲਾ ਇਸਲਾਮਿਕ ਬਲੋਗ, ਹਿੰਦੀ ਬਾਸ਼ਾ ਵਿਚ
आओ उस बात की तरफ़ जो हममे और तुममे एक जैसी है और वो ये कि हम सिर्फ़ एक रब की इबादत करें- क़ुरआन
Home » , , , » इस्लाम धर्म में दाम्पत्य व्यवस्था का आलोचनात्मक एवं संक्षिप्त अवलोकन !!!

इस्लाम धर्म में दाम्पत्य व्यवस्था का आलोचनात्मक एवं संक्षिप्त अवलोकन !!!

Written By Saleem Khan on शुक्रवार, 24 सितंबर 2010 | शुक्रवार, सितंबर 24, 2010


इस्लामी दाम्पत्य व्यवस्था के मूल में यह विचारधारा काम करती है कि यह परिवार और समाज के सृजन की आधारशिला है। अर्थात् दाम्पत्य-संबंध के अच्छे या बुरे होने पर परिवार और समाज का; यहाँ तक कि सामूहिक व्यवस्था और सभ्यता व संस्कृति का भी; अच्छा या बुरा बनना निर्भर करता है। अतः इस बुनियाद को मज़बूत बनाने और मज़बूत रखने के काफ़ी यत्न इस्लाम ने किए हैं। मिसाल के तौर पर सबसे पहली बात, इस संबंध में पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने यह बताई कि आमतौर पर, रिश्ते तय करने में धन-सम्पत्ति, सुन्दरता और बिरादरी व नस्ल को ही सारा महत्व दिया जाता है, लेकिन अच्छी बात यह है कि धार्मिकता (अर्थात् नेकी, अच्छे चरित्र, शील, सद्व्यवहार, ईश्वर से व्यावहारिक संबंध, सदाचार आदि) को महत्व दिया जाए।
दाम्पत्य व्यवस्था
इस तरह इस्लाम आरंभ में ही दाम्पत्य जीवन को एक नैतिक दिशा दे देता है। फिर विवाह (निकाह) के अवसर पर कु़रआन की जो आयतें अनिवार्यतः पढ़ी जाती है उनके द्वारा नव-दम्पत्ति को यह शिक्षा याद दिलाई जाती है कि इस तरह जीवन बिताना कि अल्लाह (और उसके पैग़म्बर) की अवज्ञा (नाफ़रमानी) से बचते रहना। अर्थात्  इस्लाम ने दाम्पत्य जीवन से संबंधित ‘कु़रआन’ में, और ‘हदीस’ में जो मार्गदर्शन किया है, जो आदेश दिए हैं उनकी अवहेलना मत करना।

इस्लाम ने बिना निकाह के स्त्री-पुरुष मिलाप को नैतिक, सामाजिक व क़ानूनी अपराध क़रार देकर ऐसे संबंध को अवैध (हराम) ठहराया और इहलोक तथा परलोक में बड़ी भीषण सज़ा तथा प्रताड़ना व प्रकोप की चेतावनी दी है। इसके बाद इस्लाम ने बताया कि जिस ‘अल्लाह’ के नाम पर दोनों एक-दूसरे के लिए (निकाह द्वारा) वैध (हलाल) हुए हैं उसने एक के, दूसरे के प्रति बहुत से कर्तव्य, (Duties) और बहुत से अधिकार (Rights) निर्धारित किए हैं। इनमें कमी करना, इनकी अनदेखी करना, इन्हें अच्छी तरह से न निभाना, मात्र एक-दूसरे के प्रति ही अनुचित व अपराध न होगा बल्कि अल्लाह की नज़र में भी पाप व अपराध होगा। इसका, सिर्फ़ पति-पत्नी संबंध और परिवार की मान-मर्यादा पर ही बुरा प्रभाव पड़ कर रह जाए, ऐसा नहीं है; बल्कि इसकी सज़ा परलोक जीवन में भी मिल कर रहेगी। वहाँ की सज़ा बड़ी सख़्त होगी और उससे बचने का, वहाँ कोई उपाय न होगा, कोई सोर्स-सिफ़ारिश न चलेगी। इस प्रकार इस्लाम दाम्पत्य जीवन को प्रारंभिक चरण में ही एक ऐसा दृढ़ नैतिक व आध्यात्मिक आधार प्रदान कर देता है जो शायद अन्य समाजों में दुर्लभ हो

स्त्री और पुरुष, मानव-रूप में बिल्कुल बराबर हैं, साथ ही प्रजनन (Reproduction) और नस्ल को आगे बढ़ाने में ‘माँ’ की जो भूमिका स्त्री को निभानी पड़ती है और बच्चों के पालन-पोषण में- विशेषतः बच्चों की दो-ढाई साल की उम्र तक -उसे जिस प्रकार की कठिन परिस्थितियों से गुज़रना पड़ता है, और जो पुरुष से सर्वथा भिन्न होती हैं, उनके अनुकूल स्त्री की शारीरिक संरचना एवं मानसिक (Mental and Temperamental) और मनौवैज्ञानिक (Psychological) अवस्था पुरुष से, कुछ पहलुओं से बिल्कुल ही भिन्न और कुछ पहलुओं से काफ़ी भिन्न होती है। इस भिन्नता के ही परिप्रेक्ष्य में इस्लाम जीविकोपार्जन की ज़िम्मेदारी पुरुष पर रखता है। अर्थात् पुष्ट शरीर और अधिक शारीरिक शक्ति व बल के अनुकूल घर के बाहर का काम जिस में काफ़ी परिश्रम करना होता है, पति के ज़िम्मे; और हल्की मेहनत के काम, घर के अन्दर; जहाँ औरत के शरीर व शील की सुरक्षा यक़ीनी होती है, बच्चों और घर की देख-रेख व रख-रखाव तथा परिवार और पति के मान-मर्यादा की सुरक्षा का काम सरलता, सुख व सुधड़ता-संन्दरता से करना आसान होता है, पत्नी के ज़िम्मे। इस प्रकार इस्लामी दाम्पत्य व्यवस्था में ‘नारी’ और ‘पुरुष’ की शारीरिक संरचना और प्राकृतिक अवस्था के ठीक अनुकूल कार्य का निर्धारण व विभाजन तथा उसी के मुताबिक़ कार्य-क्षेत्र का भी निर्धारण कर दिया गया है ताकि दोनों के सहयोग से घर के अन्दर के और बाहर के काम बिना विघ्न-बाधा के सुचारू रूप से चलते रहें।

वर्तमान युग में नारी-पुरुष समानता की विचारधारा पश्चिमी देशों से बहुत तेज़ी के साथ प्रभावित होती जा रही है और पश्चिम में ही उपजे तथाकथित नारी-उद्धार आन्दोलन (या नारी स्वतंत्रता आन्दोलन) के नाम पर चलने वाले ‘फेमिनिस्ट मूवमेंट’ ने पति व पत्नी दोनों को समान कार्य करने के लिए, समान कार्य क्षेत्र में परिश्रम व संघर्ष करने को नारी की स्वतंत्रता तथा नारी-पुरुष समानता का आयाम दे दिया है। इस कारणवश, एक-दूसरे पर आश्रित रहने का नाज़ुक व भावुक संबंध कमज़ोर होता जाता है। ‘तुम भी कमाओ हम भी कमाएँ’, या ‘तुम कमाते हो तो हम भी तो कमाते हैं’ की मानसिकता से आपसी सहयोग-सहानुभूति की अवस्था कमज़ोर होती जा रही है। यह पूंजीवादी व्यवस्था की विचारधारा भावुक और नाज़ुक रिश्ते पर कुठाराघात कर रही है और हम समझ नहीं पा रहे हैं. पत्नी पर कार्य-स्थल पर ऐसा शारीरिक व मानसिक बोझ पड़ता है जिसके लिए उसका व्यक्तित्व, अपनी प्रकृति तथा स्वभाव में, अनुकूल नहीं होता। परिणामस्वरूप प्रायः पति-पत्नी एक-दूसरे को ‘सुकून’ पहुँचाने की अवस्था में नहीं रह पाते। एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यों को भली-भाँति पूरा करने, एक-दूसरे के अधिकार अदा करने के लिए जिस सहयोग व सहानुभूति की आवश्यकता होती है वह प्रभावित होते-होते कभी-कभी बिल्कुल ही समाप्त हो जाती है। दाम्पत्य जीवन नकारात्मक प्रभावों से बोझिल और बुरे परिणामों से ग्रस्त होने लगता है।

इस्लाम का दृष्टिकोण यह है कि पति-पत्नी को बुनियादी और प्राथमिक स्तर पर एक-दूसरे से ‘सुकून’ प्राप्त करने के उद्देश्य से निकाह (विवाह) के बाद मिलन होते ही, एक-दूसरे के लिए प्रेम, सहानुभूति, शुभचिन्ता व सहयोग की भावनाएँ अल्लाह की ओर से वरदान-स्वरूप प्रदान कर दी जाती हैं (कु़रआन, 30:21) अतः ऐसा कोई कारक बीच में नहीं आना चाहिए जो अल्लाह की ओर से दिए गए इस प्राकृतिक देन को प्रभावित कर दे। इस्लाम कहता है कि पति-पत्नी आपस में एक-दूसरे का लिबास हैं (कु़रआन, 2:187)। अर्थात् वे लिबास ही की तरह एक-दूसरे की शोभा बढ़ाने, एक-दूसरे को शारीरिक सुख पहुँचाने और एक दूसरे के शील (Chastity) की रक्षा करने के लिए हैं। लेकिन आधुनिक संस्कृति में, दोनों को एक-दूसरे पर भौतिक व भावनात्मक निर्भरता से स्वतंत्र होते जाने का तेज़ी से बढ़ता रुजहान, दाम्पत्य जीवन में मिठास और सुकून को कमज़ोर और ख़त्म करता जा रहा है। भौतिक संपन्नता की चाह और ललक पति-पत्नी के बीच आध्यात्मिक, नैतिक व भावनात्मक संबंध को ख़ामोशी के साथ आघात पहुँचा-पहुँचा कर कमज़ोर करती जा रही है

इस्लाम ने शिक्षा दी है कि पति, हलाल कमाई से अर्जित रोज़ी का एक कौर (लुक़मा) जो प्रेम के साथ पत्नी के मुँह में डालता है वह सदक़ा और इबादत का स्थान रखता है। इसमें दोनों के बीच प्रेम-संबंध के साथ-साथ इस बात की शिक्षा भी निहित है कि कमाने-धमाने का काम पति करे, कमाई करने के लिए पत्नी को घर के शांतिपूर्ण, सुखमय व सुरक्षित वातावरण से बाहर मेहनत-मशक्क़त और मानसिक तनाव के वातावरण में, तथा ऐसे वातावरण में जाने से बचाए जहाँ उसके नारीत्व, गरिमा व शील को ख़तरा हो।

पारिवारिक व्यवस्था
परिवार, पति-पत्नी और बच्चों से बनता है। इसमें माता-पिता और भाई-बहन के संबंध भी होते हैं। इस्लाम एक दृढ़ व उत्कृष्ट दाम्पत्य-व्यवस्था देने के बाद एक अच्छे से अच्छे परिवार की सृजन की ओर ध्यान देता है। वह परिवारजनों में, कर्तव्य-अधिकार संहिता (Code of Duties and Rights) के द्वारा एक-दूसरे के प्रति अच्छे संबंध स्थापित रखने का प्रावधान करता है।
पति-पत्नी के बीच अधिकारों-कर्तव्यों की नैतिक शिक्षाएँ देने के साथ इस्लाम ने एक विशाल व विस्तृत क़ानूनी प्रावधान भी किया है। इसमें पत्नी के अधिकारों का और पति के कर्तव्यों का बाहुल्य है। पति के अधिकार पत्नी के मुक़ाबले में कम और कर्तव्य ज़्यादा हैं। इसी प्रकार पत्नी के कर्तव्य पति के मुक़ाबले में कम और अधिकार ज़्यादा हैं। जैसा कि पहले लिखा जा चुका, पत्नी के भरण-पोषण की पूरी (100 प्रतिशत) ज़िम्मेदारी पति पर और आश्रित बच्चों के भरण-पोषण की पूरी ज़िम्मेदारी पिता पर है। पत्नी (और माँ) को इस ज़िम्मेदारी से पूर्णतः आज़ाद रखा गया है। पति के धन-दौलत में पत्नी का पूरा हक़ है लेकिन पत्नी के व्यक्तिगत धन-दौलत-संपत्ति में पति का कुछ भी हक़ नहीं। पति की मृत्यु के बाद उसकी छोड़ी हुई धन-सम्पत्ति में बेटों, बेटियों के साथ-साथ विधवा पत्नी का भी निश्चित हक़ है

माता-पिता का कर्तव्य इस्लाम ने सिर्फ़ यह नहीं बताया है कि वे अपनी संतान की केवल भौतिक आवश्यकताएँ पूरी करें; बल्कि आदेश दिया गया है कि उनकी शिक्षा-दीक्षा व प्रशिक्षण भी इस प्रकार करें कि संतान नेक, ईमानदार, सज्जन, सभ्य, ईशपरायण और चरित्रवान बने। उन्हें नैतिक गुणों से सुसज्जित किया जाए और दुर्गुणों व दुष्कर्मों से बचाया जाए। इसी तरह संतान के लिए माता-पिता का आदर-सम्मान और सेवा-सुश्रूषा करने के साथ-साथ उनका पूर्ण आज्ञापालन भी करने का हुक्म दिया गया है (अलबत्ता माता-पिता का कोई भी ऐसा हुक्म मानने से मना कर दिया गया है जिसमें अल्लाह की नाफ़रमानी होती, यानी गुनाह व पाप होता हो)।

माता-पिता, जीवन के किसी भी चरण में अगर आर्थिक रूप से स्वावलंबित न रहकर असहाय हो जाएँ ख़ास तौर से बुढ़ापे में, तो इस्लाम ने नैतिक स्तर के साथ-साथ क़ानूनी स्तर पर भी, उनके भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी बेटों पर डाली है। बहुओं को इसमें रुकावट डालने की कुचेष्टा हरगिज़ नहीं करनी चाहिए। कु़रआन में (17:23) हुक्म दिया गया है कि माँ-बाप को (डाँटना, झिड़कना तो बहुत दूर की बात है) कभी ‘उँह’ तक भी मत कहो। माता-पिता की नाफ़रमानी व अवज्ञा करने को, उन्हें मानसिक या भावनात्मक दुख देने को, उन्हें शारीरिक कष्ट देने को, और उनका अनादर व अपमान करने को ‘हराम’ क़रार दिया गया है और कहा गया है कि माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करने वाली संतान चाहे कितनी ही नेकियाँ, पुण्य कार्य और इबादत-पूजा-पाठ करके दुनिया से जाए, परलोक में वह नरक की भागी होगी। माता-पिता के जीवित रहते बेटों की मृत्यु हो जाए तो इस्लाम ने बेटों की धन-सम्पत्ति में माँ-बाप का हिस्सा रखा है।

इस्लाम में ‘संयुक्त परिवार’ को पसन्द नहीं किया गया है क्योंकि इसमें प्रायः बड़ी ख़राबियाँ पैदा हो जाती है। अक्सर भाइयों और जेठानियों, देवरानियों में संबंध बहुत बिगड़ जाते हैं, दुश्मनी भी हो जाती है। अलबत्ता रिश्तों को जोड़े रखने का हुक्म दिया गया है। ख़ून के रिश्तों को कमज़ोर करने से सख़्ती से रोका गया है और इन्हें तोड़ने, ख़त्म करने को वर्जित कर दिया गया है। आदेश है कि परिवार और ख़ून के रिश्तों के लोग तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार भी करें तो भी तुम बदले में दुर्व्यवहार नहीं, सद्व्यवहार, उपकार और सहयोग व सहायता की नीति पर चलो। एक अच्छे परिवार, एक अच्छे ख़ानदान के सृजन व स्थापन के लिए सहानुभूति, आदर, प्रेम, सहयोग, क्षमाशीलता, उदारता, संयम, सहिष्णुता, उत्सर्ग, त्याग, शुभेच्छा, उत्सर्ग आदि नैतिक गुणों के साथ-साथ इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने यह शिक्षा भी दी है कि ‘‘कमाल यह नहीं है कि तुम्हारे रिश्तेदार और परिजन तुम्हारे साथ सद्व्यवहार करें तब तुम (बदले में) उनके साथ सद्व्यवहार करो। कमाल इस में है कि यदि वे तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करें तब भी तुम बदले में दुर्व्यवहार नहीं, सद्व्यवहार और परोपकार करो।’’

सामाजिक व्यवस्था
अच्छे समाज में अच्छे परिवार पनपते हैं, अच्छे परिवार में अच्छे इन्सान बनते हैं। इसी तरह अच्छे व्यक्तियों से अच्छे परिवार बनते हैं और अच्छे परिवारों से अच्छा समाज बनता है। यानी व्यक्ति, परिवार और समाज एक-दूसरे के पूरक-संपूरक और परस्पर सहयोगी व सहायक होते हैं किसी अच्छी सामूहिक व्यवस्था और सभ्यता-संस्कृति के बनने में।
इस्लाम व्यक्ति और परिवार की उत्तम सृजन-व्यवस्था करके समाज-सृजन की ओर ध्यान देता है। वह अपने अनुयायियों को शिक्षा देता है कि समाज में नेकियों, भलाइयों को फैलाना व स्थापित करना तथा बुराइयों को रोकना तथा उनका उन्मूलन करना तुम्हारा प्रमुख उत्तरदायित्व है (कु़रआन, 3:104, 7:157, 9:67,71, 22:41, 31:17)। कोई भी व्यक्ति यह सोचने का औचित्य नहीं रखता कि ‘‘कुछ भी हो रहा है, हम से क्या मतलब!’’ समाज में शराफ़त, नेकी, अच्छाई, भलाई का प्रचलन हो; नाइन्साफ़ी, बुराई, बदी, अत्याचार, अनाचार, अन्याय; बेहयाई, अश्लीलता, नग्नता और बेशर्मी आदि का उन्मूलन हो, इसके लिए इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने आदेश दिया है कि ‘‘बुराई को देखो तो उसे हाथ से (अर्थात् बलपूर्वक) रोक दो; अगर इसकी क्षमता न हो तो ज़बान से (अर्थात्, बोलकर) रोको; अगर इसकी क्षमता भी न हो तो कम से कम, उस बुराई को दिल से तो बुरा जानो......लेकिन (सुन लो कि) यह अन्तिम स्थिति ईमान की सबसे अन्तिम, न्यूनतम श्रेणी है।’’

इस्लाम एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था देता है जिसमें समाज का हर व्यक्ति, हर परिवार, हर घर आपसी मेल-मिलाप द्वारा एक-दूसरे से निरंतर जुड़ा रहे। लोग अलग-थलग, अपनी खाल में मस्त, अपनी व्यक्तिगत दुनिया में मग्न, अपने व्यक्तित्व या अपने परिवार के अन्दर सीमित, और अपने ही लाभ व स्वार्थ के चारों ओर कोल्हू के बैल की तरह घूमते न रहें

इस्लाम ने पाँच वक्त की नमाज़ें, प्रतिदिन, सामूहिक रूप से अदा करने का आदेश दिया है। इससे समाज के लोग रोज़ाना पाँच बार अनिवार्य रूप से एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं। एक-दूसरे के दुख-सुख से सहज-रूप से अवगत होते, एक-दूसरे के काम आते और यथाअवसर, आवश्यकतानुसार एक-दूसरे की सहायता व सहयोग करने का वातावरण बनता है। इसी तरह रमज़ान के रोज़ों के महीने में आपसी मेल-जोल और ज़रूरतमन्दों की मदद का वातावरण बनाया जाता है, सामाजिक संबंध घनिष्ट होते हैं।

पड़ोसियों में ख़राब तअल्लुक़ अक्सर एक सामाजिक अभिशाप बनकर उभरता है। इस्लाम ने आदेश दिया है कि पड़ोसी को कष्ट मत दो, उसे सताओ मत, वह कमज़ोर हो तो उसे दबाओ मत। उसे कभी हल्की-सी आशंका भी न हो कि तुम से उसके मान-सम्मान को या उसके धन-सम्पत्ति को कभी कोई क्षति हो सकती है, नुक़सान पहुँच सकता है। पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने चेतावनी दी कि तुममें से कोई भी व्यक्ति सही मायने में, सच्चा मुस्लिम नहीं है जो पेट भरकर सोए और उसका पड़ोसी (निर्धनता या किसी और कारणवश) भूखा सोए। इसी तरह आप (सल्ल॰) ने यह भी फ़रमाया कि वह व्यक्ति मुस्लिम नहीं है जिसकी शरारतों और उद्दंडता से उसका पड़ोसी सुरक्षित और अमान में न हो। इस्लाम अपनी सामाजिक व्यवस्था में ‘पड़ोसी से संबंध’ के बारे में इतना ज़्यादा संवेदनशील (Sensitive) है कि पैग़म्बर (सल्ल॰) ने आदेश दिया है कि  फल खाकर छिलके घर के बाहर मत डाल दो ताकि तुम्हारे (ग़रीब) पड़ोसी के बच्चे छिलके देखकर महरूमी महसूस करके उदास और दुखी न हो उठें
  
किसी की मृत्यु हो जाए तो उसे दफ़न करने से पहले, इस्लाम ने उसकी सामूहिक नमाज़े जनाज़ा पढ़ने का हुक्म दिया है, और जनाज़े के साथ क़ब्रिस्तान तक जाने और दफ़न-क्रिया में शरीक होने का। फिर यह आदेश भी दिया गया है कि समाज के लोग, उसके परिजनों को तीन दिन तक खाना बनाकर, घर ले जाकर खिलाने का बन्दोबस्त करें। इससे दुखी परिवार को आभास व एहसास होता है कि पूरा समाज उसके दुख में शरीक है। लोग उसे अपना समझते हैं।

इस्लाम ने आदेश दिया है कि समाज में कोई बीमार पड़ जाए तो उसके पास लोगों को जाते रहना चाहिए। सहयोग करना चाहिए और उसके स्वास्थ्य के लिए दुआ करनी चाहिए।

इस्लाम की सामाजिक व्यवस्था में, ग़रीबों, निर्धनों, असहायों, अनाथों, बीमारों, पीड़ितों, असहाय विधवाओं आदि की हर प्रकार की, संभव सहायता करने के आदेश हैं। इस्लाम ने कहा है कि तुम ऐसा करोगे तो यह उन पर तुम्हारा कोई उपकार या एहसान न होगा, बल्कि अल्लाह ने (जिसने तुम्हें धन आदि दिया है) तुम्हारे धन व संसाधनों में उन ज़रूरतमन्दों का हिस्सा रखा है। इस भ्रम में मत पड़ो कि जो कुछ तुम्हारे पास है वह कुल का कुल तुम्हारा है। और देखो, उन पर ख़र्च करो तो उन पर एहसान जताकर उनको कष्ट मत पहुँचाना, उनका अपमान मत करना, उनसे कोई प्रतिदान, कोई बदला मत चाहना। प्रतिदान तो तुम्हें अल्लाह देगा; इस जीवन में भी, और परलोक जीवन में तो पुरस्कार व प्रतिदान की मात्र अत्यधिक, चिरस्थाई होगी। इसीलिए मुस्लिम समाज (अपनी बहुत सारी कमज़ोरियों, ख़राबियों और त्रुटियों के बावजूद) एक बंधा हुआ, गठा हुआ, कल्याणकारी व परोपकारी समाज है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि इस्लाम ने मानवजाति को एक उत्तम व उत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था प्रदान की है। बहुत से बाहरी कारणों से और बहुत से आन्तरिक कारकों से वर्तमान का मुस्लिम समाज, सही मायने में ‘इस्लामी समाज’ के मानदंड पर पूरा नहीं उतरता, फिर भी अन्य समाजों की तुलना में इसमें अच्छाइयाँ बहुत ज़्यादा, बुराइयाँ काफ़ी कम हैं। निस्सन्देह इस स्थिति का श्रेय इस्लाम को जाता है।

स्रोत-इस्लामधर्म.ओर्ग 
Share this article :
"हमारी अन्जुमन" को ज़यादा से ज़यादा लाइक करें !

Read All Articles, Monthwise

Blogroll

Interview PART 1/PART 2

Popular Posts

Followers

Blogger templates

Google+ Followers

Labels

 
Support : Creating Website | Johny Template | Mas Template
Proudly powered by Blogger
Copyright © 2011. हमारी अन्‍जुमन - All Rights Reserved
Template Design by Creating Website Published by Mas Template