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इस्लामी जिहाद की वास्तविकता The Real Jihad- Part 1

Written By Saleem Khan on बुधवार, 13 अप्रैल 2011 | बुधवार, अप्रैल 13, 2011

मानव-सभ्यता एवं नागरिकता की आधारशिला जिस क़ानून पर स्थित है उसकी सबसे पहली धारा यह है कि मानव का प्राण और उसका रक्त सम्माननीय है। मानव के नागरिक अधिकारों में सर्वप्रथम अधिकार जीवित रहने का अधिकार है और नागरिक कर्तव्यों में सर्वप्रथम कर्तव्य जीवित रहने देने का कर्तव्य है। संसार के जितने धर्म-विधान और सभ्य विधि-विधान हैं, उन सब में प्राण-सम्मान का यह नैतिक नियम अवश्य पाया जाता है। जिस क़ानून और धर्म में इसे स्वीकार न किया गया हो, वह न तो सभ्य मानवों का धर्म और क़ानून बन सकता है, न उसके अन्तर्गत कोई मानव-दल शान्तिमय जीवन व्यतीत कर सकता है और न ही उसे कोई उन्नति प्राप्त हो सकती है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं समझ सकता है कि यदि मानव-प्राण का कोई मूल्य न हो, उसका कोई सम्मान न हो, उसकी सुरक्षा का कोई प्रबंध न हो तो चार आदमी कैसे मिलकर रह सकते हैं, उनमें किस तरह परस्पर कारोबार हो सकता है, उन्हें वह शान्ति एवं परितोष और वह निश्चिन्तता तथा चित्त की स्थिरता कैसे प्राप्त हो सकती है, जिसकी मनुष्य को व्यापार, कला और कृषि-कार्य, धनार्जन, गृह-निर्माण, यात्र एवं पर्यटन और सभ्य जीवन व्यतीत करने के लिए आवश्यकता होती है। फिर यदि आवश्यकताओं से हटकर मात्र मानवता की दृष्टि से देखा जाए तो इस दृष्टि से भी किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए या किसी व्यक्तिगत शत्रुता के कारण अपने एक भाई की हत्या करना निकृष्टतम निर्दयता और अत्यंत पाषाण हृदयता है। ऐसा अपराध करके मानव में किसी नैतिक उच्चता का पैदा होना तो अलग रहा, उसका मानवता के स्तर पर स्थित रहना भी असंभव है।


संसार के राजनैतिक क़ानून तो मानव-जीवन के सम्मान को केवल दंड के भय और शक्ति के बल पर स्थापित करते हैं किन्तु एक सत्यधर्म का काम दिलों में उसका वास्तविक मान-सम्मान पैदा कर देना है, ताकि जहाँ मानव द्वारा दिए जाने वाले दंड का भय न हो और जहाँ मनुष्य को पुलिस रोकने के लिए न हो वहाँ भी लोग एक-दूसरे की अकारण हत्या करने से बचते रहें। इस दृष्टिकोण से प्राण-सम्मान की जैसी यथोचित और प्रभावकारी शिक्षा इस्लाम में दी गई है वह किसी दूसरे धर्म में मिलनी कठिन है। क़ुरआन में जगह-जगह विभिन्न ढंग से इस शिक्षा को दिलों में बिठाने की कोशिश की गई है। क़ुरआन सूरा-5 अल-माइदा में आदम (अलैहि॰) के दो बेटों का क़िस्सा बयान करके, जिनमें से एक ने दूसरे की हत्या की थी और यह हत्या मात्र अत्याचार था, कहा गया है :


‘‘इसी कारण इसराईल की संतान के लिए हमने यह आदेश लिख दिया था कि जिसने किसी इन्सान को क़त्ल के बदले या ज़मीन में बिगाड़ फैलाने के सिवा किसी और वजह से क़त्ल कर डाला उसने मानो सारे ही इन्सानों को क़त्ल कर दिया, और जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो सारे इन्सानों को जीवन दान किया। मगर उनका हाल यह है कि हमारे रसूल निरंतर उनके पास खुले-खुले निर्देश लेकर आये, फिर भी उनमें अधिकतर लोग धरती में ज़्यादतियाँ करने वाले हैं।’’ (कु़रआन, 5:32)


एक दूसरी जगह ईश्वर ने अपने नेक बन्दों के गुण बयान करते हुए कहा है :
‘‘ईश्वर के वर्जित किए हुए किसी जीव का नाहक़ क़त्ल नहीं करते, और न व्यभिचार करते हैं—ये काम जो कोई करेगा वह अपने गुनाह का बदला पाएगा।’’ (कु़रआन, 25:68)


एक और जगह कहा है:
‘‘ऐ नबी, उनसे कहो कि आओ मैं तुम्हें बताऊँ, तुम्हारे रब ने तुम पर क्या-क्या पाबन्दियाँ लगाई हैं: यह कि उसके साथ किसी को साझीदार न बनाओ, और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो और अपनी औलाद को निर्धनता के भय से क़त्ल न करो। हम तुमको भी रोज़ी देते हैं और उनको भी देंगे, और अश्लील बातों के क़रीब भी न जाओ चाहे वे खुली हुई हों या छिपी। और किसी जीव की, जिसे ईश्वर ने आदरणीय ठहराया है, हत्या न करो, सिवाय इस स्थिति के कि ऐसा करना सत्य को अपेक्षित हो। ये बातें हैं जिनका आदेश उसने तुम्हें दिया है, ताकि तुम समझ-बूझ से काम लो।’’ (कु़रआन, 6:151)

इस शिक्षा का संबोधन सर्वप्रथम उन लोगों से था जिनकी दृष्टि में मानव-प्राण का कोई मूल्य नहीं था और जो अपने व्यक्तिगत हित के लिए संतान तक की हत्या कर दिया करते थे। इसलिए इस्लाम की ओर बुलाने वाले पैग़म्बर (उन पर हज़ारों-हज़ार सलाम हों) उनकी मनोवृत्तियों के सुधार के लिए स्वयं भी सदैव प्राण-सम्मान का उपदेश दिया करते थे और यह उपदेश सदैव अत्यंत प्रभावकारी शैली में हुआ करता था। हदीसों में अधिकतर इस प्रकार के कथन पाए जाते हैं जिनमें निर्दोष की हत्या को निकृष्टतम पाप बताया गया है। उदाहरणस्वरूप कुछ हदीसें हम यहाँ उद्धृत करते हैं:

हज़रत अनस बिन मालिक (रज़ि॰) से उल्लिखित है कि ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने कहा:
‘‘बड़े गुनाहों में सबसे बड़ा गुनाह ईश्वर का सहभागी ठहराना है और जीव-हत्या तथा माता-पिता की अवज्ञा एवं झूठ बोलना है।’’

हज़रत इब्ने-उमर (रज़ि॰) से उल्लिखित है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने कहा:
‘‘ईमान वाला अपने धर्म की विस्तीर्णता में उस समय तक निरंतर रहता है जब तक वह कोई अवैध रक्त-पात नहीं करता।’’

हदीसशास्त्र ‘नसई’ में एक ‘मुतवातिर’1 (वह हदीस जिसके उल्लेखकर्ता हर ज़माने में इतने अधिक रहे हों कि उनका किसी झूठ पर सहमत हो जाना संभव न हो।) हदीस है कि ‘‘क़ियामत (प्रलय-दिवस) के दिन बन्दे से सबसे पहले जिस चीज़ का हिसाब लिया जाएगा, वह नमाज़ है और पहली चीज़ जिसका निर्णय लोगों के मध्य किया जाएगा, वे ख़ून के दावे हैं।’’

एक बार एक व्यक्ति हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की सेवा में उपस्थित हुआ और उसने पूछा, ‘‘सबसे बड़ा गुनाह कौन-सा है?’’ हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने जवाब दिया, ‘‘यह कि तू किसी को ईश्वर का समकक्ष एवं प्रतिद्वंद्वी ठहराए, जबकि उसने तुझे पैदा किया।’’

उसने फिर पूछा कि, ‘‘इसके बाद कौन-सा गुनाह बड़ा है?’’ पैग़म्बर (सल्ल॰) ने उत्तर दिया, ‘‘यह कि तू अपने बच्चे की हत्या कर दे, इस विचार से कि वह तेरे खाने में साझीदार होगा।’’

उसने कहा, ‘‘इसके बाद कौन-सा गुनाह है?’’ पैग़म्बर (सल्ल॰) ने कहा, ‘‘यह कि तू अपने पड़ोसी की पत्नी से व्यभिचार करे।’’

संसार पर इस्लामी शिक्षा का नैतिक प्रभाव

प्राण-सम्मान की यह शिक्षा किसी दार्शनिक या नैतिक शिक्षक के चिंतन का परिणाम न थी कि इसका प्रभाव केवल पुस्तकों और पाठशालाओं तक सीमित रहता, बल्कि वास्तव में वह ईश्वर और उसके पैग़म्बर की शिक्षा थी जिसका एक-एक शब्द प्रत्येक मुसलमान के ईमान का अंश था, जिसका पालन करना, उपदेश देना और जिसे क्रियान्वित करना हर व्यक्ति का कर्तव्य था जो इस्लाम के कलिमे (महावाक्य और इस्लामी धारणा) को स्वीकार करता हो। अतः एक चैथाई शताब्दी के अल्प समयम ही में इसके कारण अरब जैसी हिंसक जाति में प्राण-सम्मान और शान्तिप्रियता का ऐस गुण पैदा हो गया कि ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की भविष्यवाणी के अनुसार क़ादसिया से सनआ तक एक महिला अकेली सफ़र करती थी और कोई उसकी जान और माल पर हमला न करता था, जबकि यही वह देश था जहाँ 25 वर्ष पूर्व बड़े-बड़े क़ाफ़िले भी निश्चिन्त होकर नहीं गुज़र सकते थे। फिर जब सभ्य संसार का आधे से अधिक भाग इस्लामी राज्य के अधीन हो गया और इस्लाम के नैतिक प्रभाव संसार में चारों ओर फैल गए तो इस्लामी शिक्षा ने मनुष्य के बहुत-से भ्रष्टाचारों और गुमराहियों की तरह मानव-प्राण के उस निरादर का भी उन्मूलन कर दिया जो संसार में फैला हुआ था। आज संसार के सभ्य क़ानूनों में प्राण-सम्मान को जो स्थान प्राप्त हुआ है वह उस क्रान्ति के परिणामों में से एक शानदार परिणाम है जो क्रान्ति इस्लामी शिक्षा के फलस्वरूप संसार के नैतिक वातावरण में आई थी। अन्यथा जिस अंधकारमय काल में यह शिक्षा अवतरित हुई थी उसमें मानव-प्राण का वास्तव में कोई मूल्य न था। अरब की हिंसक प्रवृत्तियों का नाम तो इस सिलसिले में दुनिया ने बहुत सुना है, किन्तु उन देशों की स्थिति भी कुछ अच्छी न थी जो उस समय संसार की सभ्यता, सुसंस्कृति और ज्ञान तथा दर्शन के केन्द्र बने हुए थे। रूम के कोलोसियम (Colosseum) की कहानियाँ अब तक इतिहास के पृष्ठों में मौजूद हैं, जिनमें हज़ारों मनुष्य तलवार चलाने की कला (Gladiatory) की कुशलताओं और रोम के सरदारों के मनोरंजन की भेंट चढ़ गए। अतिथियों के मनोरंजन के लिए या मित्रों के सत्कार के लिए ग़ुलामों को हिंसक पशुओं से फड़वा देना या पशुओं की तरह ज़बह (वध) करा देना या उनके जलने का तमाशा देखना यूरोप और एशिया के अक्सर देशों में कोई बुरा काम न था। क़ैदियों और ग़ुलामों को विभिन्न ढंग से यातना दे-देकर मार डालना उस युग की सामान्य रीति थी। जाहिल और हिंसक प्रवृत्ति के सरदारों ही में नहीं यूनान और रोम के बड़े-बड़े चिंतकों और दार्शनिकों तक के अनुशीलनों और निरूपणों में मनुष्य के निर्दोष वध करने की बहुत-सी असभ्य रीतियाँ वैध थीं। अरस्तू और प्लेटो जैसे नैतिक शिक्षक माता को यह अधिकार देने में कोई दोष नहीं समझते थे कि वह अपने शरीर के एक अंश (गर्भाशय में पलते हुए बच्चे) को अलग कर दे। अतएव यूनान और रोम में गर्भपात कराना कोई अवैध कर्म न था। पिता को अपनी संतान के वध का पूरा अधिकार था और रोम के क़ानूनविदों को अपने क़ानून की इस विशेषता पर गर्व था कि उसमें संतान पर पिता के अधिकार इतने अधिक असीम हैं। स्टोइक (Stoics) दार्शनिक की दृष्टि में मनुष्य का स्वयं अपने आपका वध करना कोई बुरा काम न था, बल्कि ऐसा श्रेष्ठ कार्य था कि लोग सभाएँ आयोजित करके उनमें आत्महत्याएँ किया करते थे। यहाँ तक कि प्लेटो जैसा दार्शनिक भी इसे कोई बहुत बड़ा पाप न समझता था। पति के लिए अपनी पत्नी का वध बिल्कुल ऐसा था जैसे वह अपने किसी पालतू पशु का वध कर दे। इसलिए यूनान के क़ानून में इसका कोई दंड न था। जीव-रक्षा का गहवारा भारत इन सबसे बढ़ा हुआ था। यहाँ पुरुष के शव पर जीवित स्त्री को जला देना एक वैध कर्म था और धर्म में इसकी ताकीद थी। शूद्र के प्राण का कोई मूल्य न था और केवल इस कारण कि वह बेचारा शूद्र ब्रह्मा के पाँव से पैदा हुआ है, उसकी हत्या ब्राह्मण के लिए वैध थी। वेद की आवाज़ सुन लेना शूद्र के लिए इतना बड़ा पाप था कि उसके कान में पिघला हुआ सीसा डालकर उसे मार डालना न केवल वैध, बल्कि आवश्यक था। ‘जलबरदा’ की प्रथा सामान्य रूप से प्रचलित थी जिसके अनुसार माता-पिता अपने पहले बच्चे को गंगा नदी की भेंट चढ़ा देते थे और इस कठोर हृदयता को अपने लिए सौभाग्य समझते थे।

ऐसे अंधकारमय युग में इस्लाम ने आवाज़ बुलन्द की कि, ‘‘मानव-प्राण को ईश्वर ने प्रतिष्ठित ठहराया है, उसकी हत्या न करो, किन्तु उस समय जबकि सत्य और न्याय उसकी हत्या की माँ करे।’’ (कु़रआन, 6:151) इस आवाज़ में एक शक्ति थी और शक्ति के साथ वह ‘अहिंसा परमो धर्मः’ (अहिंसा परम धर्म है) की आवाज़ की तरह बुद्धि और प्रकृति के प्रतिवू$ल न थी, इसलिए वह संसार के कोने-कोने में पहुँची और उसने मानव को अपने प्राण के यथोचित मूल्य से अवगत कराया। चाहे किसी जाति या किसी देश ने इस्लाम स्वीकार किया हो या न किया हो, उसका नैतिक जीवन किसी न किसी हद तक इस आवाज़ से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। सामाजिक इतिहास का कोई न्यायप्रिय विद्वान इससे इन्कार नहीं कर सकता कि संसार के नैतिक क़ानूनों में मानव-प्राण के सम्मान को प्रतिष्ठित रखने का गौरव जितना इस आवाज़ को प्राप्त है उतना ‘पहाड़ी के उपदेश’ या ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की आवाज़ को प्राप्त नहीं है।

-क्रमशः
प्रस्तुतकर्ता- सलीम ख़ान
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