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इस्लामी जिहाद की वास्तविकता The Real Jihad- Part 2

Written By Saleem Khan on शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011 | शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011


क़त्ल जब सत्य और न्याय को अपेक्षित हो
तनिक विचार कीजिए, केवल ‘‘मानव-प्राण की, जिसे ईश्वर ने प्रतिष्ठित ठहराया है, हत्या न करो’’ ही नहीं कहा, बल्कि इसके साथ ‘‘किन्तु उस समय जबकि सत्य और न्याय उसकी हत्या की माँग करे’’ भी कहा है। ‘‘जिसने एक व्यक्ति की हत्या की मानो कि उसने समस्त मानवों की हत्या कर दी’’ ही नहीं कहा, बल्कि इसके साथ ‘‘किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के अतिरिक्त’’ का अपवाद भी रखा है। यह नहीं कहा कि किसी जान का किसी स्थिति में भी वध न करो। ऐसा कहा जाता तो यह शिक्षा का दोष होता। न्याय न होता, बल्कि वास्तव में अन्याय होता। संसार को वास्तव में आवश्यकता इस बात की न थी कि मनुष्य को क़ानून की पकड़ से आज़ाद कर दिया जाए और उसे खुली छूट दे दी जाए कि जितना चाहे फ़साद करे, जितनी चाहे अशान्ति फैलाए, जितना चाहे अत्याचार करे, प्रत्येक स्थिति में उसके प्राण का सम्मान किया जाएगा (अर्थात् उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा)। बल्कि वास्तव में आवश्यकता यह थी कि संसार में शान्ति की स्थापना हो, बिगाड़ और उपद्रव का उन्मूलन कर दिया जाए और ऐसा क़ानून बनाया जाए जिसके अंतर्गत हर व्यक्ति अपनी सीमाओं में स्वतंत्र हो और कोई व्यक्ति एक निश्चित सीमा का उल्लंघन करके दूसरों की भौतिक या आध्यात्मिक शान्ति में विघ्न न डाले। इस उद्देश्य के लिए केवल ‘‘जीव-हत्या न करो’’ का समर्थन ही अपेक्षित न था, बल्कि इस रक्षक-शक्ति की भी आवश्यकता थी कि ‘‘यदि सत्य और न्याय को अपेक्षित हो’’ तो (अपराधी को) क़त्ल भी किया जा सकता है, अन्यथा शान्ति की जगह अशान्ति ही होती।

दुनिया का कोई क़ानून, जो कर्म के बदले के नियम से रिक्त हो, सफल नहीं हो सकता। मानव-प्रकृति इतनी आज्ञाकारी नहीं है कि जिस चीज़ का आदेश दिया जाए उसे सदा सहर्ष स्वीकार कर ही ले और जिस चीज़ से रोका जाए, उसे सहर्ष त्याग ही दे। यदि ऐसा होता तो संसार में उपद्रव और बिगाड़ नाममात्रा को न होता। मनुष्य की प्रकृति में तो भलाई के साथ बुराई और आज्ञापालन के साथ अवज्ञा भी पाई जाती है। अतः उसकी उद्दंड प्रकृति को आज्ञापालन पर बाध्य करने के लिए ऐसे क़ानून की आवश्यकता है जिसमें आदेश देने के साथ यह भी हो कि यदि आदेश का पालन न किया गया तो उसका दंड क्या है और वर्जित करने के साथ यह भी हो कि यदि वर्जित कर्म से बचा न गया तो उसका परिणाम क्या भुगतना पड़ेगा। केवल ‘‘धरती के सुधार के बाद उसमें बिगाड़ पैदा न करो’’ या ‘‘जिस प्राणी को ईश्वर ने प्रतिष्ठित किया है उसकी हत्या न करो’’ कहना पर्याप्त नहीं हो सकता, जब तक कि इसके साथ यह भी न बता दिया जाए कि यदि इस महापाप से किसी ने अपने को दूर न रखा और फ़साद फैलाया और रक्तपात किया तो उसे क्या दंड दिया जाएगा। 

मानव-शिक्षा में ऐसी त्रुटि का रह जाना संभव है, किन्तु ईश्वरीय क़ानून इतना दोषपूर्ण (होना तो दूर की बात, तनिक भी दोषपूर्ण) नहीं हो सकता। उसने स्पष्ट रूप से बता दिया कि मानव-रक्त की प्रतिष्ठा केवल उसी समय तक है, जब तक उस पर ‘हक़’ (सत्य और न्याय) न क़ायम हो जाए। (जब तक कि वह अपराध करके स्वयं उस प्रतिष्ठा को भंग न कर दे।) उसे जीवन का अधिकार केवल वैध सीमाओं के भीतर ही दिया जा सकता है, किन्तु जब वह उन सीमाओं का उल्लंघन करके उपद्रव और फ़साद फैलाए या दूसरों के प्राण पर आक्रमण करे तो वह अपने जीवन-अधिकार को स्वयं खो देता है और उसका वध वैध हो जाता है और फिर उसकी मृत्यु ही मानवता का जीवन हो जाती है। अतएव कहा गया है कि, ‘‘हत्या बड़ी बुरी चीज़ है किन्तु उससे अधिक बुरी चीज़ फ़साद एवं उपद्रव है।’’ जब कोई व्यक्ति यह बड़ा अपराध करे तो उसकी बड़ी बुराई का अंत कर देना ही ज़्यादा अच्छा है। इसी प्रकार जो कोई किसी दूसरे निर्दोष व्यक्ति की अन्यायपूर्ण हत्या करे, उसके लिए आदेश हुआ ‘‘ मारे जाने वालों के विषय में हत्या-दंड (क़िसास) तुम पर अनिवार्य किया गया’’ (कु़रआन, 2:178)। इसके साथ उस भेदभाव को भी मिटा दिया गया जिसे गुमराह क़ौमों ने उच्च और निम्न वर्ग के लोगों में क़ायम किया था। अतएव कहा गया ‘‘हमने उस (तौरात) में उनके लिए लिख दिया था कि प्राण प्राण के बराबर है’’ (क़ुरआन, 5:45)। यह नहीं हो सकता कि अमीर ग़रीब को मार डाले या आज़ाद व्यक्ति ग़ुलाम की हत्या कर दे तो वह छोड़ दिया जाए, बल्कि मनुष्य होने की दृष्टि से सब बराबर हैं। प्राण के बदले प्राण ही लिया जाएगा, चाहे धनी का प्राण हो या निर्धन का। फिर इस विचार से कि किसी को इस अवश्यम्भावी रक्तपात में झिझक न हो, कहा गया, ‘‘ऐ बुद्धिमानो! तुम्हारे लिए प्राण-दंड में जीवन है।’’ (2:179); अर्थात् ऐ बुद्धिमानो! इस प्राण-दंड को मृत्यु न समझो, बल्कि यह तो वास्तव में समाज का जीवन है जो उसके शरीर से एक दूषित और घातक फोड़े को काटकर प्राप्त किया जाता है। प्राण-दंड से प्राप्त होने वाले जीवन के इस दर्शन को पैग़म्बर (सल्ल॰) ने एक अवसर पर भली-भाँति समझाया है। आप (सल्ल॰) ने कहा, ‘‘अपने भाई की सहायता करो, चाहे वह अत्याचारी हो या अत्याचार-पीड़ित।’’ सुनने वाले को आश्चर्य हुआ कि अत्याचार-पीड़ित की सहायता तो उचित है, किन्तु अत्याचारी की यह सहायता कैसी? पूछा, ‘‘ऐ ईशदूत! हम अत्याचार-पीड़ित की सहायता तो अवश्य करेंगे, किन्तु अत्याचारी की सहायता किस तरह करें?’’ आप (सल्ल॰) ने कहा, ‘‘इस तरह कि तू उसका हाथ पकड़ ले और उसे अत्याचार करने से रोक दे।’’ अतः वस्तुतः ज़ालिम के जु़ल्म को रोकने में उसके साथ जो सख़्ती भी की जाए, वह सख़्ती नहीं है, बल्कि वह नर्मी ही है और स्वयं उस अत्याचारी की भी सहायता ही है। इसीलिए इस्लाम में ईश्वरीय हद को क़ायम करने (ईश्वर की ओर से निर्धारित दंडों को व्यवहार में लाने) की सख़्ती के साथ ताकीद की गई है और इसे दयालुता और उसके प्रसाद का कारण बताया गया है। ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने कहा है, ‘‘ईश्वर की हदों में से एक हद क़ायम करने की बरकत चालीस दिन की वर्षा से अधिक है।’’ वर्षा की बरकत यह है कि इससे धरती सिंचित होती है, फ़सलें भली-भाँति तैयार होती हैं, ख़ुशहाली में वृद्धि होती है। किन्तु हद के क़ायम करने (अर्थात दंड-विधान को लागू करने) की बरकत और लाभ इससे बढ़कर है क्योंकि इससे उपद्रव, बिगाड़, अत्याचार और अशान्ति का उन्मूलन होता है, ईश्वर के पैदा किए हुए प्राणियों को शान्तिपूर्वक जीवन व्यतीत करने का अवसर प्राप्त होता है और शान्ति-स्थापना से वह परितोष उपलब्ध होता है जो सामाजिकता की आत्मा और उन्नति का प्राण है।

सत्य एवं न्याय को ‘अपेक्षित’ और ‘अनपेक्षित’ क़त्ल में अन्तर
सत्य और न्याय के अनपेक्षित क़त्ल को ऐसी कड़ाई के साथ रोककर और सत्य और न्याय को अपेक्षित क़त्ल की ऐसी ताकीद करके ईश्वरीय धर्म-विधान ने अतिशयता और न्यूनता के दो मार्गों के मध्य न्याय और बीच के सीधे मार्ग की ओर हमारा मार्गदर्शन किया है। एक ओर वह मर्यादाहीन और सीमोल्लंघन करने वाला गिरोह है जो मानव-प्राण का कोई मूल्य नहीं समझता और अपनी तुच्छ इच्छाओं पर उसे बलिदान कर देना वैध समझता है। दूसरी ओर वह विवेकभ्रष्ट और दृष्टिभ्रष्ट गिरोह है जो रक्त की पवित्रता और उसकी शाश्वत अवैधता का मानने वाला है और किसी स्थिति में भी रक्त बहाना वैध नहीं समझता। इस्लामी धर्म-विधान ने इन दोनों ग़लत विचारों का खंडन कर दिया और उसने बताया कि मानव-प्राण की प्रतिष्ठा न तो काबा या माँ-बहन की प्रतिष्ठा की तरह शाश्वत है कि किसी प्रकार उसे क़त्ल करना वैध ही न हो सके और न उसका मूल्य इतना कम है कि अपनी तुच्छ भावनाओं एवं इच्छाओं की तृप्ति के लिए उसका वध कर देना वैध हो। एक ओर उसने बताया कि मानव-प्राण इसलिए नहीं है कि मनोरंजन के लिए घातक दशा में उसके तड़पने का तमाशा देखा जाए, उसको जलाकर या यातनाएँ देकर आनन्द लिया जाए, उसको व्यक्तिगत इच्छाओं की राह में रुकावट समझकर उसका अन्त कर दिया जाए या तथ्यहीन अंधविश्वासों और ग़लत रीतियों की वेदी पर उसकी भेंट चढ़ाई जाए। ऐसे अपवित्रा उद्देश्यों के लिए उसका ख़ून बहाना निश्चय ही अवैध और महापाप है। दूसरी ओर उसने यह भी बताया कि एक चीज़ मानव-प्राण से भी अधिक मूल्यवान है और वह ‘हक़’ (सत्य एवं न्याय) है। वह जब उसके ख़ून की माँग करे तो उसे बहाना न केवल वैध बल्कि अनिवार्य है और उसको न बहाना सबसे बड़ा गुनाह है। मनुष्य जब तक सत्य का आदर करता है उसके ख़ून का आदर करना आवश्यक होता है, किन्तु जब वह उद्दंड होकर सत्य पर हाथ बढ़ाए तो वह अपने ख़ून का मूल्य स्वयं खो देता है। फिर उसके ख़ून का मूल्य इतना भी नहीं रहता, जितना पानी का होता है।
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