World's First Islamic Blog, in Hindi विश्व का प्रथम इस्लामिक ब्लॉग, हिन्दी मेंدنیا کا سبسے پہلا اسلامک بلاگ ،ہندی مے ਦੁਨਿਆ ਨੂ ਪਹਲਾ ਇਸਲਾਮਿਕ ਬਲੋਗ, ਹਿੰਦੀ ਬਾਸ਼ਾ ਵਿਚ
आओ उस बात की तरफ़ जो हममे और तुममे एक जैसी है और वो ये कि हम सिर्फ़ एक रब की इबादत करें- क़ुरआन
Home » , » क्रियेटर और क्रियेशन - 1 (एटम)

क्रियेटर और क्रियेशन - 1 (एटम)

Written By Zeashan Zaidi on रविवार, 15 मई 2011 | रविवार, मई 15, 2011


दोस्तों, पेश है एक नई सीरीज. उम्मीद है पसंद आएगी.

तमाम तारीफें उस अल्लाह के लिये जो तमाम आलमीन का रब है। वही क्रियेटर है पूरी कायनात का। वह किसी मखलूक के मिस्ल नहीं है। उसी ने वक्त और जगह को पैदा किया। खुद उसके लिये कोई जगह और कोई वक्त नहीं। कलामे पाक की सूरे आले इमरान की 190 वीं आयत में कहा गया है, ‘‘आसमान व ज़मीन के बनने और रात व दिन के बदलने में निशानियां हैं अक्लवालों के लिए।’’     
हमारी सोच की गहराईयां उस क्रियेटर तक नहीं पहुंच सकतीं। लेकिन उसकी बनायी कायनात की इण्टेलिजेंट डिजाईन साबित करती है कि क्रियेटर का वजूद है। और वह क्रियेटर एक और सिर्फ एक है। वह कैसे?
हमारी दुनिया में हर तरह के लोग हैं और हर तरह की चीज़ें। अगर यहाँ हाथी और व्हेल जैसे बड़े जानवर हैंं तो मच्छर और पिस्सू जैसे महीन कीड़े भी मौजूद हैं। यहाँ तक कि ऐसे बैक्टीरिया और वायरस भी पाये जाते हैं जिन्हें आँखों से देख पाना मुमकिन नहीं। इस ज़मीन पर कहीं ऐसी हरियाली है कि आँखों को सुकून अता होता है तो कहीं रेगिस्तान की ऐसी वीरानी भी है जहाँ दूर दूर तक न आदमी न आदमज़ात। हाँ अल्लाह की कुछ मखलूक़ात यहाँ भी अपना रिज्क हासिल करती दिख जाती हैं। कहीं लहरें फेंकता समुन्द्र दिखाई देता है तो कहीं आसमान से बातें करते पहाड़। लेकिन आपको यह जानकर हैरत होगी कि इतनी वेराईटीज़ होने के बावजूद सब का बेसिक स्ट्रक्चर एक है।
वह स्ट्रक्चर क्या है? आईए इस राज़ पर से पर्दा उठाते हैं। वह राज़ जिसको इनसान ने हजारों सालों की गौरो फिक्र व एक्सपेरीेन्ट के जरिये डिस्कवर किया। वह राज़ है हॉरमनी का। एक होने का। यह स्ट्रक्चर है एटम का। 
जानने की कोशिश  करते हैं कि एटम क्या है?
एक काग़ज़ का टुकड़ा लीजिए और उसके छोटे छोटे पीस कर दीजिए। फिर उसके और टुकड़े कीजिए। धीरे धीरे पीस इतना छोटा हो जायेगा कि आँखों से दिखाई देना बन्द हो जायेगा। लेकिन उसके बावजूद उसके और छोटे टुकड़े किये जा सकते हैं। आखिर में आपको वह टुकड़ा मिलेगा कि उसे और छोटे टुकड़ों में तोड़ना मुमकिन न होगा।
इस सबसे छोटे टुकड़े में कुछ गोल गेंद की तरह की तरह की शक्लें एक दूसरे से जुड़ी दिखाई देंगी। यह शक्ल एटम की है। हर तरह के मैटर को यही एटम एक दूसरे से जुड़कर बनाते हैं।
अब सवाल एठता है कि वह कौन सी ताकत है जो इन एटम्स को आपस में जोड़ती है? और नतीजे में हम तरह तरह की चीज़ें अपने आसपास देखते हैं? यकीनन वह ताकत है क्रियेटर की जिसने इस दुनिया को क्रियेट किया है।
एटम, जो किसी भी मैटर का सबसे छोटा जर्रा होता है। इतना बारीक कि एक पिन की नोक पर दस करोड़ से ज्यादा एटम समा सकते हैं। लेकिन यही एटम अपने अंदर हज़ारों करिश्मे समेटे हुए हैं। हर रोज़ इंसान इसके किसी न किसी नये करि’मे से रूबरू हो रहा है। जो यकीनन इशारा है इस बात का कि इसे बनाने वाला क्रियेटर लामहदूद अक्ल का मालिक है। जिसने हर चीज की इण्टेलिजेंट डिजाइन बनायी है।
एक छोटा सा एटम अपने में एक पूरी दुनिया को समेटे है? यानि हमारी दुनिया के इस सबसे बारीक ज़र्रे में एक शहर से भी ज्यादा हलचल लगातार होती रहती है। यह हलचल क्रियेटर की कण्ट्रोलिंग पावर में होती है। जिसकी वजह से न तो एटम टूटकर बिखरने पाता है और न ही सिमटकर और छोटा होने पाता है।
कहते हैं कि अगर खालिक को समझना है तो उसकी बनायी तख्लीक को समझो। उसकी बनायी हुई दुनिया को समझो। सच्चाई तो यह है कि अगर हम सिर्फ एटम को जान लें, उसके स्ट्रक्चर को समझ लें तो हम खालिके कायनात के सामने सज्दा करने पर मजबूर हो जायेंगे।
एक पूरी माइक्रो कायनात एटम में मौजूद है। जहाँ निगेटिव चार्ज इलेक्ट्रान मरकज़ी हिस्से न्यूक्लियस के चारों तरफ तेजी से चक्कर लगाते रहते हैं। इलेक्ट्रान की ये स्पीड बहुत ज्यादा होती है। यानि लगभग रोशनी की स्पीड के बराबर।
रोशनी जो एक सेकंड में तीन लाख किलोमीटर का सफर तय कर लेती है? यानि जमीन से चाँद तक पहुंचने में उसे लगते हैं डेढ़ सेकंड जबकि चाँद ज़मीन से साढ़े चार लाख किलोमीटर दूर है।
क्या ये हैरत की बात नहीं कि इतनी हाई स्पीड इलेक्ट्रान लगातार कायम रखता है? और न सिर्फ कायम रखता है बल्कि इतनी ही रफ्तार से घूमते हुए दूसरे इलेक्ट्रानों से टकराता भी नहीं। जबकि दूसरे इलेक्ट्रान उससे बस चन्द ही कदम दूर होते हैं।
सर्कस का एक खेल होता है, जिसका नाम है मौत का कुआँ। इस गेम में एक या दो मोटरसाइकिल सवार तेज रफ्तार के साथ गोल घेरे में चक्कर लगाते हैं। ज़रा सोचिए अगर वहीं पर दस पन्द्रह मोटरसाइकिलें सौ किलोमीटर फी घण्टा की रफ्तार से दौड़ानी हैं। और इसके लिए सिर्फ एक पूरा दिन रख दिया जाये तो यकीनन उनमें से चन्द मोटरसाइकिलें ज़रूर टकरा जायेंगी। लेकिन एटम में पचासों इलेक्ट्रान मोटरसाइकिल से लाखों गुना तेज़ रफ्तार से लगातार घूमते रहते हैं और ज़मीन पर मौजूद अरबों एटम में से एक में भी ऐसा कभी नहीं होता कि कोई एक्सीडेन्ट हो जाये।
जो इस बात का सुबूत है कि कायनात की पैदाइश एक्सीडेन्टल नहीं है बल्कि सब कुछ इनफाईनाइट अक्ल रखने वाले अल्लाह की इण्टेलिजेंट डिज़ाइन है। वह डिजाइन जिसमें कहीं कोई कमी नहीं। और यह क्रियेटर की कण्ट्रोलिंग पावर का भी सुबूत है । वह लोग गलत और झूठे हैं जो इतने सुबूतों के बावजूद कहते हैं कि कायनात में सब कुछ अपने आप बन गया।  
अब सवाल पैदा होता है कि वह कौन सी ताकत है जो इलेक्ट्रानों को न्यूक्लियस के चारों तरफ गर्दिश में रखती है? तो यकीनन वह अल्लाह की ताकत है। इस ताकत को साइंसदानों ने नाम दिया है इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स। यानि बिजली की ताकत। क्या है यह बिजली की ताकत?
सर्दियों में ऊनी कपड़े उतारते वक्त अक्सर जिस्म से चिंगारी निकलती है। साथ ही कपड़े को उतारते वक्त हल्की ताकत भी लगानी पड़ती है। यही है बिजली की ताकत की झलक। जिस्म की रगड़ खाकर कपड़ों में इलेक्ट्रिक चार्ज पैदा होता है, जिससे पैदा होती है बिजली की ताकत।
तो यही ताकत इलेक्ट्रानों को न्यूक्लियस के चारों तरफ गर्दिश कराती रहती है। कैसे? दरअसल जिस तरंह इलेक्ट्रान पर निगेटिव चार्ज होता है उसी तरह न्यूक्लियस में एक पार्टिकिल प्रोटॉन पाया जाता है। और उसपर पाजिटिव चार्ज होता है। इन दोनों के बीच बिजली की ताकत कशिश की होती है। जिससे दोनों यानि इलेक्ट्रान और प्रोटॉन एक दूसरे को खींचते हैं।
प्रोटॉन इलेक्ट्रॉन से दो हजार गुना भारी होता है। अब अगर इस तरह सोचा जाए कि एक हाथी को चिड़िया से बाँध् दिया जाये और दोनों एक दूसरे को खींचें तो यकीनन चिड़िया एक झटके में हाथी की तरफ जाकर गिर जायेगी। मतलब ये हुआ कि अगर कोई रुका हुआ इलेक्ट्रान न्यूक्लियस के पास रखा जाये तो प्रोटॉन उसे अपनी तरफ खींचकर एक झटके में न्यूक्लियस में शामिल कर लेगा। लेकिन यहां पर अल्लाह की कुदरत का एक और करिश्मा नज़र आता है। यानि कशिश के बावजूद इलेक्ट्रॉन न्यूक्लियस में नही समाता। क्यो?
क्योंकि यही कशिश की ताकत एटम में अपनी मिजाज बदल देती है। अल्लाह की कुदरत से यही ताकत इलेक्ट्रॉन को गर्दिश में ला देती है और वह न्यूक्लियस के चारों तरफ रिवाल्व करने लगता है। यह कुछ इस तरह होता है जैसे एक पत्थर को रस्सी से बांधकर हवा में नचा दिया जाये।
तसव्वुर कीजिए फिजा में नाचते पचासों गोले, जो एक मरकज़ी गोले के चारों तरफ तेज़ रफ्तार से चक्कर लगा रहे हैं। और आज से नहीं बल्कि लाखों सालों से। क्या ये इस बात का सुबूत नहीं कि कायनात को बनाने वाली कोई अज़ीम हस्ती मौजूद है? अल्लाह की बनायी इस महीन कारीगरी में कुछ और भी बातें हैं हैरत में डालने वाली। दो इलेक्ट्रानों के बीच भी बिजली की ताकत का कानून काम करता है। जिसके नतीजे में इलेक्ट्रान एक दूसरे से दूर भागते हैं। यह अल्लाह का करि’मा नहीं तो और क्या है कि इस कानून के बाद भी पचासों इलेक्ट्रान एटम में एक दूसरे के आसपास घूमते रहते हैं। कोई भी इलेक्ट्रान पास के इलेक्ट्रानों की ताकत के दायरे में आकर कभी अपने रास्ते को नहीं छोड़ता।
आईए अब कुछ और गहराई में चलते हैं। अब सवाल पैदा होता है कि इलेक्ट्रॉन न्यूक्लियस के चारों तरफ किस तरह के दायरे बनाता है? इनकी स्टडी भी अपने आप में काफी इण्टरेस्टिंग है। इसकी साइंटिफिक गहराईयों में बहुत ज्यादा न जाते हुए आसान ज़बान में इसे समझने की कोशिश करते हैं।
एक पीतल का पतला कड़ा अगर उसे बीच से दबाया जाये तो एक शेप मिलता है जिसको मैथेमैटिकल जबान में इलिप्स कहते हैं। इलेक्ट्रॉन इसी शेप के रास्ते में न्यूक्लियस के चारों तरफ चक्कर लगाता है। और साथ ही उस रास्ते के दोनों तरफ हिचकोले भी लेता है। यानि वाइब्रेशन करता है ठीक किसी वेव की तरह।
यह वाइब्रेशन भी इलेक्ट्रान को उसके खास रास्ते से भटकने नहीं देता। यानि अल्लाह ने उसके चलने की जो मुनासिब सूरत करार दे दी है उसमें वह खूबसूरती के साथ लगातार चक्कर लगाता रहता है। कभी कभी बाहरी एनर्जी पाकर वह अपना रास्ता छोड़कर अपने ऊपर के किसी रास्ते में पहुंच जाता है। लेकिन खालिके कायनात उसे वहाँ देर तक रहने की इजाजत नहीं देता। और इलेक्ट्रान फिर से वापस अपनी पुरानी डगर पर लौट आता है। इस दौरान वह ली गयी एनर्जी को रोशनी की शक्ल में बाहर फेंक देता है। यही वह रोशनी है जो इंसानों और दूसरे जानदारों को देखने की ताकत देती है। और अल्लाह के बारे में हमारी फिक्र को मजबूत करती है।
अब हम बताते हैं बिजली की ताकत की फाइन ट्‌यूनिंग के बारे में। जिसका हम रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल तो करते हैं लेकिन महसूस नहीं करते। आपने देखा कि एटम में इलेक्ट्रान तेज़ रफ्तार के साथ लगातार एक दायरे में चक्कर लगाता रहता है। और उसका यह मिजाज़ कभी नहीं बदलता। लेकिन क्रियेटर खालिके कायनात ने फलाहे इंसानी के लिए उसके इस मिजाज़ में भी लचीलापन छोड़ रखा है।
आज के दौर में बिजली के बगैर हम दुनिया का तसव्वुर ही नहीं करते। बिजली न हो तो घर की रौशनी और कारखानों का प्रोडक्शन सब कुछ ठप। क्या आप जानते है कि यह बिजली हमें अल्लाह की पैदाकर्दा एक बहुत ही फाइन ट्‌यूनिंग की वजह से मिलती है? वह ट्‌यूनिंग जो उसने एटम के अंदर कर रखी है।
जैसा कि हमें मालूम हुआ कि किसी भी नेचुरल कंडीशन में दुनिया में मौजूद अरबों एटम में से एक में भी ऐसा कभी नहीं होता कि कोई इलेक्ट्रान न्यूक्लियस का चक्कर लगाना अपने आप छोड़ दे। लेकिन दूसरी तरफ अगर एटम को खास तरह की बाहरी ताकत दी जाये तो यही इलेक्ट्रान अपना आर्बिट यानि कि दायरा छोड़कर तेजी से आगे बढ़ जाता है। वह अपना एटम छोड़ देता है और नतीजे में पैदा होती है बिजली। यह वही बिजली है जो हम अपने रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल करते हैं। तो इस तरह बिजली क्रियेटर की इण्टेलिजेन्ट डिजाइन का ही करिश्मा है। साइंसदानों ने मालूम किया है कि अगर इलेक्ट्रान और न्यूक्लियस के बीच मौजूद इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स मौजूदा वैल्यू से ज्यादा होता तो इलेक्ट्रान कभी अपना आर्बिट छोड़कर बाहर नहीं निकल सकता था। और हमें बिजली की ताकत कभी नसीब न होती।
दूसरी तरफ अगर इलेक्ट्रान और न्यूक्लियस के बीच मौजूद इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स मौजूदा वैल्यू से कम होता तो सारे इलेक्ट्रान अपने आर्बिट छोड़कर बाहर निकल जाते। और एटम का वजूद बाकी न रहता। तो इस तरह दुनिया को बनाने वाले माबूद की फाइन ट्‌यूनिंग एक तरफ तो एटम के जरिये मैटर को बना रही है और दूसरी तरफ बिजली की ताकत की शक्ल में फायदा भी पहुंचा रही है। 
एक खास बात और। हर तरह के मैटर में बिजली पैदा भी नहीं होती। तांबे के तार में तो बिजली आसानी से रवाँ हो जाती है। लेकिन प्लास्टिक या रबर में लाख कोशिश के बावजूद कोई बिजली नहीं बनती। ये भी क्रियेटर की ही हैरतअंगेज डिजाइन है। जरा सोचिए, अगर हर तरह के मैटर में बिजली पैदा हो जाती तो फिर ये हमारे किसी काम की न रह जाती। क्योंकि जब तक बिजली के तार पर रबर का कवर नहीं होता, यही बिजली हमारे लिए एक खतरा भी होती है।
आईए एटम के इन करिश्मों को देखने के बाद माबूद की बारगाह में एक शुक्र का सज्दा करें और फिर कुर्रान हकीम की सूरे सबा की 34 वीं आयत की तिलावत करें जिसका मफहूम है, ‘‘उस से जर्रा बराबर कोई चीज़ न आसमानों में छुपी हुई है, न जमीन में। न जर्रे से बड़ी, न उससे छोटी ऐसी कोई चीज़ है जो इस नुमायां किताब में दर्ज नहीं है।’’
अगर यहां हम जर्रे को एटम से तदबीर करें तो यकीनन जर्रे से छोटी चीज़ों से मुराद इलेक्ट्रान और न्यूक्लियस के पार्टिकिल ही हैं। तो इस तरह कुरआन हकीम में इन चीजों की तरफ इशारा मौजूद है जिसको कि साइंस ने आखिरकार तलाश कर के दुनिया के सामने पेश कर दिया है।
ये तो माइक्रो कायनात की एक शुरुआत है। सितारों के आगे जहां और भी है। यानि न्यूक्लियस के अंदर भी क्रियेटर के बहुत से करिश्मे छुपे हुए हैं।
Share this article :
"हमारी अन्जुमन" को ज़यादा से ज़यादा लाइक करें !

Read All Articles, Monthwise

Blogroll

Interview PART 1/PART 2

Popular Posts

Followers

Blogger templates

Google+ Followers

Labels

 
Support : Creating Website | Johny Template | Mas Template
Proudly powered by Blogger
Copyright © 2011. हमारी अन्‍जुमन - All Rights Reserved
Template Design by Creating Website Published by Mas Template