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किसने दिया साइंटिफिक लॉजिक (scientific logic) का आधार ?

Written By Zeashan Zaidi on सोमवार, 18 अक्तूबर 2010 | सोमवार, अक्तूबर 18, 2010

न्यूटन का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। कोई बच्चा जब साइंस की दुनिया में कदम रखता है तो जिस साइंसदां से सबसे पहले परिचित होता है, वह न्यूटन है। सत्रहवीं सदी में पैदा हुआ ब्रिटिश साइंसदान आइजक न्यूटन भौतिकविद, फिलास्फर, गणितज्ञ, खगोलशास्त्री सभी कुछ था। उसने गुरुत्वाकर्षण की खोज की थी। साथ ही यह भी माना जाता है कि उसी ने सबसे पहले साइंटिफिक लॉजिक या साइंटिफिक सोच को परिभाषित किया।

वैज्ञानिक तर्कशास्त्र की आधारशिला उसने चार नियमों के द्वारा रखी जो इस तरह हैं, 1- किसी प्राकृतिक घटना के पीछे एक और केवल एक पूर्ण सत्य कारण होता है। 2- एक तरह की घटनाओं के लिये एक ही तरह के कारण होते हैं। 3- वस्तुओं के गुण सार्वत्रिक रूप से हर जगह समान होते हैं। 4- किसी घटना से निकाले गये निष्कर्ष तब तक सत्य मानने चाहिए जब तक कि कोई अन्य घटना उन्हें गलत न सिद्ध कर दे।

न्यूटन के बताये हुए ये उसूल आज भी साइंटिफिक रिसर्च में रौशनी की हैसियत रखते हैं। और साइंस अपनी तरक्की में जब भी दो कदम आगे बढ़ती है तो ये रौशनी हमेशा उसे रास्ता दिखाती है। हालांकि इनमें से उसूल नं- तीन को आज की साइंस कुछ हद तक नहीं मान रही है क्योंकि आज की साइंस के मुताबिक हम एक मल्टीवर्स में हैं जिनमें बहुत से यूनिवर्स हैं और दूसरे यूनिवर्सेस में फिजिक्स के नियम बदल जाते हैं तो जाहिर है चीज़ों के गुण भी बदल जायेंगे। इसी तरह उसूल नं- चार भी चूंकि अंदाज़े पर आधारित है इसलिए इसे भी पूरी तरह सही नहीं मानना चाहिए। अब बाकी बचते हैं उसूल एक और उसूल दो। यानि किसी भी प्राकृतिक घटना के पीछे एक और सिर्फ एक वजह होती है। पहले हम समझते हैं कि इस उसूल का मतलब क्या है। 

किसी प्रिज्म से अगर सफेद रौशनी गुज़ारी जाये तो वह कई रंगों में बदल जाती है। इस घटना के पीछे असली वजह ये है कि सफेद रौशनी कई रंगों का मिक्सचर होती है और हर रंग के लिये प्रिज्म की रौशनी को मोड़ने की पावर अलग अलग होती है। इसी वजह से सफेद रौशनी प्रिज्म से गुज़रने के बाद अलग अलग रंगों में दिखाई पड़ने लगती है। आज हम इसका साइंस में हर जगह इस्तेमाल करते हैं। अब प्रिज्म का साइज़ चाहे जैसा हो या प्रिज्म कहीं भी इस्तेमाल किया जाये, इस घटना के पीछे यही कारण हमेशा मौजूद होता है।

इसी तरह आसमान में नीले रंग का दिखना या सुबह और शाम के वक्त लाल रंग का दिखना एक सबब की वजह से होता है और उस सबब का नाम है प्रकाश का प्रकीर्णन (scattering of light)। ऐसा कभी नहीं होता कि आसमान का नीला रंग एक दिन किसी और वजह से हो और दूसरे दिन किसी और वजह से।

इस तरह अगर हमने साइंटिफिक तरीके से एक बार किसी घटना की वजह मालूम कर ली तो ये वजह हमेशा के लिये उस घटना को एक्सप्लेन कर सकती है। 

लेकिन सवाल ये उठता है क्या वाकई न्यूटन ने ही साइंटिफिक लॉजिक के उसूलों की बुनियाद डाली या उससे पहले कोई और महान हस्ती इन उसूलों को दुनिया को बता चुकी थी? जहां तक यूरोपियन किताबों की बात है वे इससे पहले इस सन्दर्भ में अरस्तू और रेने डिस्कार्टस का नाम बताते हैं। जहां तक अरस्तू की बात है तो वो अन्त:प्रेरणा से सच्चाई या साइंटिफिक ज्ञान तक पहुंचने की बात करता था। आज के दौर में यह बात गलत सिद्ध हो चुकी है। जबकि सोलहवीं सदी में जन्मे डिस्कार्टस के अनुसार, ‘सही ज्ञान को हमेशा उसके मूल स्रोत (ज़रिये) से हासिल करना चाहिए। हमें कोशिश करनी चाहिए उन कारणों से उस ज्ञान को प्राप्त करने की जो उनपर कारणों पर निर्भर है। क्योंकि कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं है इस प्रक्रिया से पूरी तरह हासिल न किया जा सके।’ कुछ हद तक उसकी बात न्यूटन के उसूलों से मिलती है।

लेकिन अगर हम कुछ पुरानी इस्लामी किताबों को खंगालें तो सच्चाई ये सामने आती है कि डिस्कार्टस और न्यूटन से बहुत पहले इस्लामी विद्वान साइंटिफिक उसूलों की बुनियाद निहायत मज़बूती से रख चुके थे। 

आईए हम नज़र करते हैं हज़रत याकूब कुलैनी (अ.र.) की किताब उसूले काफी के वोल्यूम दो पर। जैसा कि हम जानते हैं उसूले काफी आज से ग्यारह सौ साल पहले लिखी गई किताब है यानि न्यूटन से छह सौ साल पहले की।     

उसूले काफी में दर्ज एक हदीस के मुताबिक इमाम जाफर सादिक (अ.स.) ने फरमाया, ‘खुदा ने तमाम अशिया को असबाब से जारी किया है और हर शय का एक सबब (reason) करार दिया है। और हर सबब की एक शरह (explanation) है और हर तशरीह के लिये एक इल्म है और हर इल्म के लिये एक बाबे नातिक है जिसने उनको जाना उसने मआरफत हासिल कर ली और जो जाहिल रहा वह जाहिल रहा, और ये इल्म वाले रसूल अल्लाह (स.) हैं और हम।

इस तरह इमाम जाफर सादिक (अ.स.) साफ साफ यह उसूल बता रहे हैं कि दुनिया में हर घटना (जिनमें कुदरती घटनाएं भी शामिल हैं।) और हर चीज़ की पैदाइश के पीछे एक सबब यानि कि वजह है। और वजह की एक व्याख्या (explanation) है। और उस व्याख्या को करने के लिये एक ज्ञान है। उस ज्ञान तक पहुंचने के लिये एक दरवाज़ा है (आज के दौर में यही साइंस है।) उस ज्ञान तक पहुंचने के लिये उस दरवाजे की मदद लेनी पड़ती है। 

इसके आगे इमाम कह रहे हैं कि मोहम्मद (स.) और आले मोहम्मद इन उलूम के दरवाजे हैं। और यह सच्चाई भी है क्योंकि हम देख रहे हैं कि जिस ज्ञान को यूरोप वाले अपनी खोज बता रहे हैं उनका सिलसिला कहीं न कहीं मोहम्मद (स.) व आले मोहम्मद (अ.) से जुड़ा हुआ है। यहां तक कि साइंस के बुनियादी उसूल भी यहीं पर पहली बार मिलते हुए दिखाई दे रहे हैं। जिसको न्यूटन और डिस्कार्टस से जोड़कर देखा जा रहा है।  

लोग लाख न्यूटन का नाम लें लेकिन सच्चाई यही है कि इस्लाम न होता तो विज्ञान भी न होता।
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